बुधवार, 27 जुलाई 2011

एक स्त्री के बारे में....?

क्या तुम जानते हो

क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत?

घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी
जमीन के बारे में बता सकते हो तुम?

बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता?

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में किस तरह एक ही समय में
स्वयं को स्थापित और निर्वासित करती है एक स्त्री?

सपनों में भागती एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में अपने-आपसे लड़ते?

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के मन की गाँठ खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने उसके भीतर का खेलता इतिहास?
पढ़ा है कभी उसकी चुप्पी की दहलीज पर बैठ
शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को?

उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर?

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण?

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

अगर नहीं!
तो फिर क्या जानते हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में....?

32 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

स्त्री के बारे में भी पता है, पह्ले आप अपने ब्लाग का समय ठीक कर दो भाई ये १५ अगस्त दिखा रहा है,

nilesh mathur ने कहा…

बेहतरीन रचना!

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

बेहद खूबसूरत

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहरी बात..उम्दा रचना.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बहुत सुंदर ...लाजवाब प्रस्तुति.......

Richa P Madhwani ने कहा…

http://shayaridays.blogspot.com

anand ने कहा…

umda dinesh....bahut behtareen. kafi kamyaab investigation....likhte rahiye.

Surender Dalal . ने कहा…

AZAB_GAZAB!!!

Rakesh Kumar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति.
अच्छे प्रश्न किये हैं आपने.
सार्थक लेखन के लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर आप आये इसके लिए भी आपका आभारी हूँ.यूँ ही आना जाना बनाये रखियेगा.

सागर ने कहा…

behtreen rachna... bhaut sukriya mere blog par aa kar mera hausla badhane ke liye.... thank u....

Dr_JOGA SINGH KAIT "JOGI " ने कहा…

khoob rachana badhayi

ज्योति सिंह ने कहा…

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

अगर नहीं!
तो फिर क्या जानते हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में....?
waah naari ki manosthiti ko kitni sundarata se likha hai ,har aurat ko ise padhna chahiye taki samjh aaye ki uski bhavnao ko is duniya me samjhne wale kai hai .main do mahine se nahi net par aai rahi is karan chuk ho gayi ,dil se mafi chahti hoon ,ab khyaal rakkhoongi .

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

औरत की हक़ीक़त

नारी तन है
नारी मन है
नारी अनुपम है

सागर से गहरा
उसका मन है
संगमरमर सा
उसका बदन है

बाल घने हैं उसके
बोल भले हैं उसके
मन हारे पहले
तन हारे पीछे

वफ़ा के पानी में
गूंथकर
प्यार की मिट्टी
सूरत बने जो
औरत उसका नाम है

हां, मैंने पढ़ा है
नारी मन को
आराम से
साए में
उसी के तन के

वह एक शजर है
फलदार
हमेशा कुछ देता ही है
पत्थर खाकर भी

क़ुर्बानी इसी का नाम है
यही औरत का काम है

....

आप बताएं पढ़ने से कुछ शेष बचा हो तो...

बेनामी ने कहा…

Good blog. Keep it up :)

Lopamudra

veerubhai ने कहा…

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

अगर नहीं!
तो फिर क्या जानते हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में....?बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति पुरुष को लताडती सी .
बुधवार, १० अगस्त २०११
सरकारी चिंता
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
Thursday, August 11, 2011
Music soothes anxiety, pain in cancer "पेशेंट्स "
http://sb.samwaad.com/
ऑटिज्‍म और वातावरणीय प्रभाव। Environment plays a larger role in autism.
Posted by veerubhai on Wednesday, August 10
Labels: -वीरेंद्र शर्मा(वीरुभाई), Otizm, आटिज्‍म, स्वास्थ्य चेतना

sm ने कहा…

beautiful poem thoughtful one

Babli ने कहा…

गहरे भाव के साथ बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! शानदार प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत गहरी बात....एक अति उम्दा रचना. धन्यवाद

mahendra srivastava ने कहा…

बहुत अच्छी रचना

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" ने कहा…

dinesh bhaai mujhe yad kiya iske liyen shukriya apaka blog dekhaa man khush ho gyaa bhtrin lekhan samagri ke liyen badhaai .akhtar khan akela kota rajsthan

दिगम्बर नासवा ने कहा…

उफ़ ... बहुत ही गहरी छाप छोडती है ये रचना .... स्त्री मन को जानना रसोई और बिस्तर से परे .... गज़ब की संवेदना है ... बहुत प्रभावशाली रचना ...

Arvind Mishra ने कहा…

बड़ी सशक्त रचना है -आज १५ अगस्त को ही पढी!

ज्योति सिंह ने कहा…

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?
is blog ki khabar hi nahi hui ,sundar post aur saath hi swatantrata divas ki badhai .

Ankur jain ने कहा…

bahut sundar...blog padh ke achcha lga........

देवेश प्रताप ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना ..

G.N.SHAW ने कहा…

अनु जी -अत्यंत झकझोरती कवीता !औरत नाम ही इज्जत और पूजा का दूसरा रूप है ! बधाई !

सुधीर ने कहा…

एक महान रचना। बधाई।

Rahul Paliwal ने कहा…

समाज के बंधे बंधाये प्रतिबिम्बों की चिर फाड़ करती रचना...बहुत खूब प्रश्न उठाये हैं आपने. वस्तुतः एक नए समाज के जरुरत हैं और नए पोधो को एक अलग तरह से परवरिश की.

boletobindas ने कहा…

ये व्यंग्य नहीं है.....मैं समझा कोई व्यंग्य ब्लाग है....पर ये तो गहराई है....सच्चाई है...अपनी, अपने परिवेश की...

NEELKAMAL VAISHNAW ने कहा…

नमस्कार....
बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें
मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में पलकें बिछाए........
आपका ब्लागर मित्र
नीलकमल वैष्णव "अनिश"

इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्

1- MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......

2- BINDAAS_BAATEN: रक्तदान ...... नीलकमल वैष्णव

3- http://neelkamal5545.blogspot.com

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..नारी के गहन भावो को छू लिया है आप ने ...धन्यवाद..

पंछी ने कहा…

bahut sundar