मंगलवार, 20 मार्च 2012

गीता ने बर्बाद किया भारत को:ओरिसन :

आज सुबह सुबह मैं कुछ खोज रहा था गूगल में की कुछ दिन उपरांत ही माँ दुर्गा के नव रात्रि का आगमन होने वाला है तो कुछ पूजा की विधि अपने देश में किन किन प्रकार से की जाती है ये ही खोज ने का मन बना के गूगल खोला और कुछ लिखा और देखा की नव भारत times के पेपर में २१/१२/२०११ के दिन कोई एक ओरिसन नामक लेखक के विचार गीता के उपर कुछ इस तरह से है मेने ध्यान पूरवक पढ़ा तो पहले तो सोचा की इस लेखक ने या तो गीता को कभी देखा और पढ़ा भी नहीं होगा फिर उन के लेख से आगे बड़ा तो पाया की उस ने पढ़ा तो जरुर है वर्ना उस के पास इतना गीता के विरुद्ध इतने कड़े विचार धरा बनती केसे
पर कुछ बातो का तो समर्थन मेरा दिल भी कर रहा है की
दुर्योधन ने असा क्या पाप और अधर्म किया जिसे से वो अपने भाइयो के हाथो से ही मारा गया उसका ये पाप था क्या की उसे भगवान ने पांडव पुत्र से पहले जन्म ने ही नहीं दिया दुर्योधन को गांधारी के गर्भ में ९ महीनो की जगह ११ महीनो तक रखा ये अन्याय नहीं तो क्या था भगवान का
शायद उसे ये कहानी ही लिखनी थी दुर्योधन जिसने कुछ भी नहीं किया वह अधर्म है ?
दुर्योधन ने ऐसा क्या किया जो अधर्म था

१ पिछले एक हज़ार साल से तो गुलाम हैं,
कोई धर्म वाला कृष्ण अवतार लेने नहीं आया,
अभी तक,
गीता में भगवान् प्राप्ति के साधन हैं,
तो आज तक किसी को गीता से भगवान् क्यूँ नहीं मिला ?

गीता के बाद यहाँ पर किसी ग्रन्थ को टिकने ही नहीं दिया गया, गीता को ही हर चीज़ का हल माना गया की गीता से हर समस्या का हल निकल सकता है, और किसी के ग्रन्थ को जगह ही नहीं मिली, तो बर्बादी का जो नाम है वह गीता के ही नाम है, और अगर आबाद की बात है तो आबादी के लिए किसी ग्रन्थ की जरूरत नहीं है, क्यूंकि फिर आदमी किताबों से नहीं अपने हृदय से जीवन व्यतीत करता है, हृदय की बात को हृदय सुनता, फिर गीता के दिमाग की जरूरत नहीं होती, आबादी के लिए दिमाग की जरूरत नहीं, हृदय की जरूरत है,

दिनेश पारीक

गीता ने बरबाद किया भारत को, भारत में भावनाओं के अथाह समंदर को गीता ने बरबाद कर दिया, लोग ने लोगों पर विश्वास करना छोड़ दिया, और लोग आपस में नातें-रिश्ते भूलकर, जमीन-जायदाद और धन के लिए अपने ही अपनों के गले काटने लगे, क्यूंकि गीता में ऐसा लिखा है, जिसमे इंसानी भावनाओं से ऊपर जमीन-जायदाद और धन-संम्पत्ति को बड़ा माना गया, और उसके पीछे यह मिसाल दी गयी की जो अपना है, वह अगर किसी के पास भी है तो छीन लो, भले ही वह भाई-हो, नातेदार हो, रिश्तेदार हो, उस भावना को दबा दो, और जमीन और धन के लिए अपने से बड़ों से भी लड़ पड़ो, यह गीता ने सिखाया, जिससे भारत बरबाद हो गया, और भारत में जमीन-जायदाद और धन संम्पति को ज्यादा महत्त्व दिया गया, जबकि भावनाओं और हृदय की बातों को कमजोरी समझा गया, और इसका फायदा उठाया गया, तो इस तरह तो गीता ने एक तरफ कहाँ की जो तुम्हारा है अर्जुन वह किसी भी प्रकार लड़कर छीन लो, फिर दूसरी तरफ गीता ने कहा की तुम क्या लाये तो जो तुम्हारा है, तुम क्या ले जाओगे, इस तरह की विरोधाभाषी वक्तव्य ने भारत के लोगों को भ्रमित कर दिया, तो जो लोग, ताकतवर थे, चालाक थे, उन्होंने दूसरों की भावनाओं का फायदा उठाकर, उन्हें उसी में उलझाये रखा और अपने पास धन-दौलत और जमीन-जायदाद अपने पास रखी, बस यही पारी पाटि भारत में चलती रही, और उसने कमजोर को वैरागी बना दिया, और ताकतवर को अय्याश बना दिया, कमजोर होकर वह वैराग का बाना ओढ़ लिया की अब उसे तो यह जामीन मिलने से रही तो उसने कहाँ की संसार मिथ्या है, और जो ताकतवर था उसने अय्याशी अपना ली | इस तरह से गीता ने पूरे भारत को दो भागों में बाँट दिया, एक जो उस जमीन-जायदाद के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे, उसके लिए किसी के साथ भी लड़ सकते थे, कोई भी पैंतरा अपना सकते थे, और अपने हाथ में दौलत काबू में रखते थे, और दूसरे वो जों भावनाओं के आगे जमीन-जायदाद को भी ठोकर मार देते थे, और अपने ईमान को कभी गन्दा नहीं करते थे, और अपने नाते-रिश्तों और बड़ों का सम्मान करते थे, आज भी भारत इसी ढर्रे पर चल रहा है, जों लोग पैसे वाले होते हैं वह भावुक नहीं होते हैं, और जों गरीब होते हैं वह भावुक होते हैं, और पैसे वाले किसी के सामने दिखावा तो करते हैं की हम सम्मान करते हैं, पर पीठ पीछे छुरा भी घोंप देते हैं, और उनकी भावना झूठी होती है, उस भावना में भी वह उससे गरीब के पास जों होता है, वह हथियाना चाहते हैं, और उसे और गरीब ही रहने देना चाहते हैं, बात तो बड़ी-बड़ी करते हैं की सब माया है, पर भारत वाले जितनी माया इक्कठी करते हैं उतना संसार का कोई आदमी नहीं करता है |


तो आज भी यह गीता किसी भी नाते और रिश्ते को तोड़कर जमीन और जायदाद को महत्त्व देने को कहती है, और गीता के बल पर वह किसी की परवाह नहीं करता है, और बड़े-बूढें की भावनाओं को देखता तक नहीं है, उसके लिए अपना अहंकार ही सबसे बड़ा होता है, और उसका अहंकार किसी भी प्रकार से जमीन और जायदाद हथियाना चाहता है | चाहे उसके लिए किसी को भी मारना पड़े, चाहे वह कोई भी हो, नाते में रिश्ते में।
ओरिसन :
इस लेख को सिर्फ कॉपी किया गह है नवभारत times न्यूज़ पेपर से ये विचार एक ओरिसन नामक लेखक के है

6 टिप्‍पणियां:

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

गीता एक आध्यात्मिक ग्रन्थ है.जिसे समझने और ग्रहण करने के लिए शुद्ध सदाचारी मानसिकता चाहिए.

veerubhai ने कहा…

चलिए इस बहाने गीता की समीक्षा तो हुई .लेखक की अपनी दृष्टि है .गीता का मुख्य सन्देश तो निष्काम कर्म ही है .फल प्रेरित कर्म नहीं .यहाँ तो लेखक को स्थूलता के अलावा कुछ सूझता ही नहीं .दुर्योधन का महिमा मंडन करना है शौक से करें ,आगे का रास्ता खुद बन जाएगा ,नियति आपका इंतज़ार कर रही है .

Kewal Joshi ने कहा…

दिनेश जी, मैं श्री पुरुषोतम पाण्डे जी के कथन से सहमत हूँ ,लेखक ने जो 'कृत्य' विनाशकारी बताये हैं उसके पीछे कौन सी महत्वाकांक्षा थी - जिसके फलस्वरूप विनाश हुआ , उसकी व्याख्या न कर, अपनी सोच प्रदर्शित की है.

दिनेश पारीक ने कहा…

केवल जी और श्री पुरुषोतम पाण्डे जी में लेखक की गीता के प्रति भावना को नहीं कह रहा हु
बल्कि उसने हिंदुस्तान की तार- तार जिन्दगिया और रिस्तो के उपर प्रकाश डाला है आप एक बार गीता को अलग छोड़ के देखिये
की हिंदुस्तान के हालत लेखक के कहे अनुसार नहीं है क्या मैं आप के जवाब का इंतजार करूँगा

दिनेश पारीक ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
दिनेश पारीक ने कहा…

this reply recived by maill
दिनेश जी नमस्कार,
गीता एक महान आध्यात्मिक ग्रन्थ है, इस पर अनेक मनीषियों ने टीकाएं भी लिखी हैं, मेरा गीता का ज्ञान अधूरा जैसा ही है, इसलिए मैं इस बारे में कोई बहस में शामिल होना उचित नहीं समझता हूँ.अब लिखने वाले तो कुछ भी लिख सकते हैं उनके अपने तर्क भी हो सकते हैं, बेहतर होगा कि किसी ऐसे महात्मा से इस बारे में चर्चा करें जो नास्तिकों को ज्ञान दे सके. धन्यवाद.
पुरुषोत्तम पाण्डेय