रविवार, 1 जनवरी 2012

मेरी धड़कन

मेरी धड़कन

मॉं
लौट रही थी खाली घड़ा लेकर
मैं पलट रही थी भूगोल के पृष्ट... और
खोज रही थी
देश के मानचित्र पर
नदियों का बहाव
मॉं
सामना कर रही थी भूखमरी से
वे चखना चाहते
अनाज के बदले उसकी देह
मैं उसकी कोख में
तलाश रही थी भट्टी
हथियार बनाने के लिए
मॉं
जर्जर कमरे में , हाथ की फटी साड़ी में
ढ़ॉंप रही थी देह और दुविधा
मैं उसकी कोख में
बुन रही थी वस्त्र आकार के क्षेत्रफल-सा
मॉं
दंगे में भीड़ से घिरी चीख रही है
संभाल नहीं पा रही है अपने कटे हुए पेट को
एक अकेले हाथ से
दूसरा हाथ कटकर दूर जा गिरा है
मैं, गर्भस्थ शिशु
पेट से बाहर टुकड़े-टुकड़े बिखरी हूँ
मैं ठीक उसी समय हलाल हुई
जब कोख में लिख रहा था धर्म का अर्थ ।

3 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मार्मिक ... ह्रदय विदारक दृश्य खींचा है आपने ..

Udan Tashtari ने कहा…

अति मार्मिक!!

vidya ने कहा…

दिल में कुछ दर्द सा हुआ...
मगर काबिले तारीफ लेखन.