शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

महँगाई से मोहब्बत

आज हर तरफ है छाई महँगाई,
हर एक के उपर आज आफत है आई,
महँगाई में ही सर्वोच्चता का दीदार हो गया,
ये सोच के महँगाई से मुझे प्यार हो गया ।

हर किसी के होठों पे बस इसका नाम है,
महँगाई खाश है बाकि सब आम है,
महँगाई के बिना चल पाना दुस्वार हो गया,
ये देख के महँगाई से मुझे प्यार हो गया ।

सरकार के नीति का ही कुछ गोलमाल है,
लफड़ा करुँ तो ये अपने ईज्जत का सवाल है,
हाथ खड़े करके ही अपना जीवन साकार हो गया,
इसलिए तो महँगाई से मुझे प्यार हो गया ।

परेशान तो हैं क्योंकि सबके बढ़ते दाम हैं,
पर क्या करें हम तो एक इंसान आम हैं,
सी नहीं सकता इसलिए जख्मों पे निसार हो गया,
ये सोच के महँगाई से मुझे प्यार हो गया ।

सबके लिए मेरे पास एक राय है,
अगर आपके खर्च है ज्यादा और कम आय है,
आप भी कहो महँगाई का सबको खुमार हो गया,
आज से महँगाई से मुझे प्यार हो गया ।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

बेटी है गर्भ में, गिरायें क्या?

अँधेरे का जश्न मनाएँ क्या
उजालों में मिल जाएँ क्या

अनगिनत पेड़ कट रहे हैं
कहीं एक पौधा लगाएं क्या

आज बेचना है ज़मीर हमें
तो खादी खरीद लाएं क्या

बामुश्किल है पीने को पानी
धोएँ तो बताओ नहाएं क्या

बहु के गर्भ में बेटी है आई
पेट पर छुरी चलवायें क्या

बेबस हैं बिकती मजबूरियाँ
भूखे बदन ज़हर खाएं क्या

अंधा है क़ानून परख लिया
कोई तिजोरी लूट लाएं क्या

रोने को रो लिए बहुत हम
पल दो पल मुस्कराएं क्या

यारों ने दिल की लगी दी है
यारों से दिल लगाएं क्या

सायों का क़द नापेगा कौन
हम भी घट-बढ़ जाएँ क्या

चुप की बात समझ आलम
और हम हाल सुनाएँ क्या

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

लो क सं घ र्ष !: हिंदी के महान साहित्यकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा के कार्यालय में भ्रष्टाचार नहीं होता ?

ऐसे महान साहित्यकार को लोकसंघर्ष का शत् !-शत् ! नमन ?

हिंदी के महान साहित्यकार श्री सुभाष चन्द्र कुशवाहा बाराबंकी जनपद में सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (ए.आर.टी.ओ ) के पद पर कार्यरत हैं। ए.आर.टी.ओ कार्यालय में कोई भी दलाल नहीं है। गाडी स्वामी सीधे जाते हैं और उनके कार्य नियमानुसार हो जाते हैं ? विभाग में किसी गाडी स्वामी का उत्पीडन नहीं होता है ? ड्राइविंग लाइसेंस बगैर किसी रिश्वत दिए बन जाते हैं। अंतर्गत धारा 207 एम.बी एक्ट के तहत कागज होने पर लागू नहीं किया जाता है ?
श्री कुशवाहा साहब के बाराबंकी में ए.आर.टी.ओ पद पर तैनाती के बाद उनके कार्यालय के कर्मचारियों ने रिश्वत खानी बंद कर दी है ? श्री कुशवाहा साहब भी रिश्वत नहीं खाते हैं ? लखनऊ में साधारण मकान में आप निवास करते हैं लेकिन जनपद स्तर के अधिकारी होने के नाते वह कभी मुख्यालय नहीं छोड़ते हैं ? आम आदमी की तरह श्री कुशवाहा साहब अपनी तनख्वाह में जीने के आदी हैं ? श्री कुशवाहा साहब सत्तारूढ़ दल की रैलियों के लिये कभी वाहन पकड़ कर रैली में जाने के लिये बाध्य नहीं किया है ? इस तरह से हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार अन्य साहित्यकारों के लिये प्रेरणा स्रोत्र हैं और हर हिंदी के साहित्यकार को उनसे प्रेरणा लें, यदि उपरोक्त नियम-उपनियम के विरुद्ध कार्य कर रहे हों या कभी-कभी रिश्वत खा रहे हों तो बंद कर देना चाहिए ?
अगर आपको मेरी बात पर विश्वास हो तो बाराबंकी जनपद कर ऐसे ऐतिहासिक महापुरुष का दर्शन करें तथा कार्यालय में उक्त बिन्दुओं पर ध्यान देकर अन्य सरकारी कार्यालयों में उसको लागू करवाने की नसीहत ले सके

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

बसंत ऋतू की शुभकामनाएं...


आइये कुछ झलकियां तो देख लीजिए मित्र मेरे ब्लाग में बसंत पंचमी की...
"आप सभी को हार्दिक दिल से शुभकामनाएं बसंत पंचमी की"

साभार: गूगल वेब को चित्रों के लिए.

रविवार, 22 जनवरी 2012

मेरा दर्द....,


आप सभी मित्रों के लिए पेश है नए साल(2012) का मेरा पहला पोस्ट
जिसमें तो दो अलग-अलग लाइने हैं पर दोनों कविता का अर्थ और दर्द एक ही है,


(१)
मुझे उदास देख कर उसने कहा ;
मेरे होते हुए तुम्हें कोई 
दुःख नहीं दे सकता,


"फिर ऐसा ही हुआ"
ज़िन्दगी में जितने भी दुःख मिले, 
सब उसी ने दिए.....
(२)
वो अक्सर हमसे एक वादा करते हैं कि;
"आपको तो हम अपना बना कर 
ही छोड़ेंगे"
और फिर एक दिन उन्होंने अपना
वादा पूरा कर दिया,


"हमें अपना बनाकर छोड़ दिया..."


नीलकमल वैष्णव"अनिश"

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

अनोखी बेटी

अनोखी बेटी 
Disha Verma
दिशा  वर्मा
आज मैं आप सबको एक ऐसी बेटी के त्याग और अपने माता पिता के लिए कुछ भी करने का जज्बा रखने वाली बहुत बहादुर और बेमिसाल बिटिया की सच्ची कहानी बताने आई हूँ /आप पदिये और अपनी राय जरुर दीजिये की आज भी जब हमारे देश में कन्याओं को गर्भ में ही मारने की घटनाओं  में दिन पर दिन बढोतरी हो रही है और लड़कियों को बोझ समझा जाता है /वहां ऐसी बेटी ने एक मिसाल कायम की है /


ये प्यारी सी बेटी दिशा वर्मा  हमारे बहुत ही करीबी और अजीज पारिवारिक दोस्त श्री मनोज वर्मा और श्रीमती माधुरी वर्मा की है /इनकी दो बेटियाँ हैं /श्री मनोजजी की तबियत बहुत ख़राब थी ,उनका लीवर ७५% ख़राब हो गया था /उनको लीवर ट्रांसप्लांट की जरुरत थी .उनकी हालत इतनी ख़राब थी की वो कोमा में जा रहे थे /मेरी दोस्त माधुरी को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो किससे बोले की कोई उसके पति को अपना लीवर दे दे /क्योंकि उसका ब्लूड ग्रुप  तो लीवर देने के लिए मैच ही नहीं कर रहा था / ऐसी हालत में मैं उनकी बहन श्रीमती नीलू श्रीवास्तव जी को भी नमन करना चाहूंगी जो अपने भाई की खातिर आगे आईं और उसका जीवन बचाने के लिए अपना जीवन जोखिम में डालकर लीवर देने के लिए तैयार हो गईं /फिर उनके सारे मेडिकल टेस्ट हुए परन्तु दुर्भाग्यबस वह मैच नहीं हो पाए जिस कारण वो अपना लीवर नहीं दे पायीं /फिर सवाल उठ पडा की अब क्या होगा सारा परिवार चिंता में डूब गया की  अब श्री मनोज जी का क्या होगा/ ऐसे समय में जब सारा परिवार दुःख के अन्धकार में  डूबा था ये बेटी दिशा जिसको अभी १८ वेर्ष की होने में भी कुछ समय था एक उजली किरण के रूप में आगे आई उसने कहा की मैं दूँगी अपने पापा को लीवर /उसने अकेले

 ही जा कर डॉ. से बात चीत की /डॉ. उसके जज्बात और हिम्मत देखकर हैरान रह गए फिर उन्होंने उसे समझाया भी की बहुत बड़ा operation होगा जो १६ घंटे चलेगा और operation के बाद जो काफी risky भी है और तुम्हारे पेट को काटने से उस पर एक हमेशा के लिए बड़ा सा निशान भी बन जाएगा /उसे तरह तरह से समझाया की उस की जान भी जोखिम में पड़ सकती है परन्तु वो बहादुर बेटी बिलकुल नहीं घबराई ना डरी और अपने पापा के लिए उसने ना अपनी जान की और ना इतने बड़े operation की परवाह की और  वो अपने 
निर्णय पर अडिग रही /फिर उसने इंटर-नेट  और अपने चाचा जो एक डॉ.हैं से लीवर ट्रांसप्लांट के बारे में सब कुछ समझ लिया और अपने को इस operation के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह तैय्यार कर लिया और बड़ी हिम्मत से  इतने बड़े operation का सामना किया /भगवान् भी उस बेटी की त्याग की भावना और हिम्मत के सामने हार गए  और operation  सफल हुआ और उसके पिता को दूसरा जीवन मिला /भगवान् ऐसी बेटी हर घर में दे जिसने अपने पिता के लिए इतना बड़ा त्याग किया जो शायद  दस बेटे मिलकर भी नहीं कर सकते थे /और वो हमारे देश की सबसे कम उम्र की लीवर डोनर भी बन गई /   यह हम सबके जीवन की अविस्मरनीय घटना है जिसको याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं /आज वो बेटी इंजिनियर बन गई है और Infosys जैसी multi-national कंपनी में काम कर रही है /उसके पापा बिलकुल ठीक हैं और एक सामान्य जीवन जी रहे हैं /


 ऐसी प्यारी बेटी को में नमन करती हूँ और आप सभी का भी उसकी आने वाली जिंदगी के लिए आशीर्वाद चाहती हूँ /और यह कहना चाहती हूँ की बेटे की चाह में बेटी को गर्भ में मत मारो क्योंकि दिशा जैसी  बेटियां अपने माता पिता के लिए अपनी जान की भी परवाह नहीं करतीं /उनमे से कौन   सी बेटी दिशा बन जाए क्या पता /उसके बाद  उसे अपने पापा की हालत से प्रेरणा मिली और दूसरों की परिस्थिति समझने का जज्बा मिला जिसके कारण उसने eye donation  कैंप में जा कर अपनी आंखें दान करने का फार्म भरा /दिशा को तथा उसके माता पिता को भगवान् हमेशा खुश ,स्वस्थ एवं सुखी रखे बस यही कामना है / 

ऐसी करोड़ों में एक अनोखी बेटी को ,मेरा शत शत नमन आशीर्वाद /










दिशा अपने  मम्मी  पापा (श्री मनोज  वर्मा)और बहन के साथ   
operation के एक साल बाद 
happy family

सोमवार, 2 जनवरी 2012

एक चर्चा राम नाम पर "Happy New Year 2012"


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"ब्लॉगर्स मीट वीकली (24) Happy New Year 2012":  में आयें .
आपको यहाँ रूमाल और चादर दोनों मिलेंगे . देख कर  फ़र्क आसानी से समझ में आ जायेगा .
भारतीय नागरिक जी से एक चर्चा राम नाम पर यहाँ देखें :

भ्रष्टाचार पर अरण्य रोदन के विषय में

शर्म क्यों मगर हमें नहीं आती!

शर्म क्यों मगर हमें नहीं आती!

शर्म क्यों मगर हमें नहीं आती!

‘सच का सामना’ में एक प्रत्याशी राजीव खंडेलवाल के सामने हॉट सीट पर बैठा है। उससे सवाल पूछा जाता है- ‘क्या आपने विवाह से पहले अपनी प्रेमिका का अबॉर्शन कराया था?’ जवाब सुनने के लिए प्रत्याशी की मां भी सामने बैठी हैं। प्रत्याशी जवाब देता है-‘हां।’ कैमरा मां के चेहरे को फोकस में लेता है। राजीव प्रत्याशी की मां से पूछते हैं-‘जवाब सुन कर कैसा लगा?’ मां का जवाब है-‘यह सब तो आजकल चलता है।’ कल्पना कीजिये, यदि यही सवाल उस वृद्ध महिला की बेटी या बहू से पूछा होता तो भी क्या उनकी यही प्रतिक्रिया होती? शायद नहीं। यही हमारे समाज का असली सच है-लड़कियों के लिए और तथा लड़कों के लिए कुछ और। यानी लड़कों के सच लड़कियों के सच से नितांत अलग हैं। यूं भी निजी सच कोई बहुत ज्यादा अहमियत नहीं रखते। लेकिन जिस समाज में रह रहे लोगों के निजी सच इस तरह के हैं तो सोचिये उस समाज के अपने सच, सामूहिक सच किस तरह के होंगे? ‘सच का सामना’ ने और कुछ किया हो या न किया हो, लेकिन हमारे भीतर सोये हुए सत्यों को उद्घाटित करने के लिए हमें प्रेरित जरूर किया है। आज हम आपको रूबरू करवा रहे हैं, समाज के कुछ ऐसे सत्यों से, जिनसे हम वाकिफ तो हो सकते हैं, लेकिन हम इस बात पर सामूहिक रूप से शर्मिंदा कतई नहीं दिखाई पड़ते। और ये ऐसे सच हैं, जो किसी भी समाज की प्रगतिशीलता, समानता और उदारता पर बड़ा सवालिया निशान लगा देते हैं?
कुंआरेपन की परीक्षा
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में पिछले दिनों एक बेहद शर्मनाक कांड सामने आया। पता चला कि मध्य प्रदेश में सामूहिक विवाह का एक आयोजन किया जाना है। इसमें बड़ी संख्या में दलित और आदिवासी महिलाओं ने शिरकत की। विवाह के लिए जो महिलाएं आई थीं, उनका सामूहिक स्तर पर कौमार्य परीक्षण किया गया यानी उनके कुंआरेपन की परीक्षा ली गई। बाद में इस कांड पर लीपापोती की गयी। सवाल यह उठता है कि क्या हम अभी भी आदिम युग में जी रहे हैं? कौमार्य परीक्षण जैसी चीजें क्या आज के इस आधुनिक युग को बर्बर युग साबित नहीं करतीं? और क्या कौमार्य परीक्षण पुरुषों का नहीं होना चाहिए था? इस कौमार्य परीक्षण ने भारतीय समाज की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की स्त्री जाति को अपमानित किया। और इस परीक्षण ने एक और बात यह साबित की कि जब कौमार्य परीक्षण सामूहिक स्तर पर हो सकता है तो निजी स्तर पर पुरुष न जाने कितनी लड़कियों का कौमार्य परीक्षण क

रविवार, 1 जनवरी 2012

कुछ तुम कहो कुछ मैं कहु |: एक वर्ष ने और विदा ली एक वर्ष आया फिर द्वार।

कुछ तुम कहो कुछ मैं कहु |: एक वर्ष ने और विदा ली एक वर्ष आया फिर द्वार।: एक वर्ष ने और विदा ली एक वर्ष आया फिर द्वार। गए वर्ष को अंक लगाकर नए वर्ष की कर मनुहार।आता है कुछ लेकर प्रतिदिन जाता है कुछ देकर बोध। मैं बै...

शोक संदेश

हमें अत्यंत दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि

मेरे प्रिय मित्र लोपोमुदारा जो कोलकाता से है उनके पिताजी का देह वाश ( सवर्गवाश) होगया है दिनाक ०१.०१.२०१२ को ये जानकारी मुझे बड़े दुःख के साथ आप सब बंधुओ को बतानी पड़ रही है क्यूँ की १ तो नए साल की सरुवत और १ किसी अपने को खोना बड़ा ही विचिता खेल है उपर वाले का
आप सब मित्रो से निवेदन है की मेरे मित्र के पिताजी की अत्मा की शांति के लिए २ मिनट प्राथना करे
जय श्री कृष्णा
आपका मित्र
दिनेश पारीक

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

हिंदी की स्थिति

जैसे ही सितंबर का महीना आता है¸ हिंदी की याद में हर हिंदुस्तान का दिल धड़कने लगता है। हम जो शुद्ध हिंदुस्तानी ठहरे¸ हमारा जी और भी व्याकुल हो उठता है¸ सावन के महीने में जिस तरह महिलाओं को पीहर की याद आती है ठीक वैसे ही। मन में हूक सी उठती है कि सब जग हिंदीमय हो जाए। इसी तड़फ़ को बनाए रखने के लिए हर साल चौदह सितंबर को हिंदी दिवस मनाने की परंपरा चल पड़ी हैं। हर साल सितंबर का महीना हाहाकारी भावुकता में बीतता है। कुछ कविता पंक्तियों को तो इतनी अपावन क्रूरता से रगड़ा जाता है कि वो पानी पी-पीकर अपने रचयिताओं को कोसती होंगी। उनमें से कुछ बेचारी हैं:-
निज भाषा उन्नति अहै¸ सब उन्नति को मूल¸
बिनु निज भाषाज्ञान के मिटै न हिय को सूल।

या फिर

मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती¸
भगवान भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती।

या फिर

कौन कहता है आसमान में छेद नहीं हो सकता.¸
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।

कहना न होगा कि दिल के दर्द के बहाने से बात पत्थरबाजी तक पहुंचने के लिए अपराधबोध¸ निराशा¸ हीनताबोध¸ कर्तव्यविमुखता¸ गौरवस्मरण की इतनी संकरी गलियों से गुज़रती है कि असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है कि वास्तव में हिंदी की स्थिति क्या है?

ऐसे में श्रीलाल शुक्ल जी का लिखा उपन्यास 'राग दरबारी' याद आता है जिसका यह वर्णन हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं पर लागू होता है:-

एक लड़के ने कहा¸ "मास्टर साहब¸ आपेक्षिक घनत्व किसे कहते हैं?"
वे बोल¸ ."आपेक्षिक घनत्व माने रिलेटिव डेंसिटी।"
एक दूसरे लड़के ने कहा¸ "अब आप देखिए¸ साइंस नहीं अंग्रेज़ी पढ़ा रहे हैं।"
वे बोले¸ ."साइंस साला बिना अंग्रेज़ी के कैसे आ सकता है?"

हमें लगा कि हिंदी की आज की स्थिति के बारे में मास्टर साहब से बेहतर कोई नहीं बता सकता। सो लपके और गुरु को पकड़ लिया। उनके पास कोई काम नहीं था लिहाज़ा बहुत व्यस्त थे। हमने भी बिना भूमिका के सवाल दागना शुरु कर दिया।

सवाल:- हिंदी दिवस किस लिए मनाया जाता है?
जवाब:- देश में तमाम दिवस मनाए जाते हैं। स्वतंत्रता दिवस¸ गणतंत्र दिवस¸ गांधी दिवस¸ बाल दिवस¸ झंडा दिवस वगैरह।
ऐसे ही हिंदी दिवस मना लिया जाता है। जैसे आज़ादी की¸ संविधान की¸ नेहरू–गांधी जी की याद कर ली जाती हैं वैसे ही हिंदी को भी याद रखने के लिए हिंदी दिवस मना लिया जाता है। राजभाषा होने के नाते इतना तो ज़रूरी ही है मेरे ख्याल से।

सवाल:- लेकिन केवल एक दिन हिंदी दिवस मनाए जाने का क्या औचित्य है?
जवाब:- अब अगर रोज़ हिंदी दिवस ही मनाएंगे तो बाकी दिवस एतराज़ करेंगे न! सबको बराबर मौका मिलना चाहिए। एक फ़ायदा इसका यह भी होता है कि लोगों के मन में जितनी हिंदी होती है वह सारी एक दिन में निकाल कर साल भर मस्त
रहते हैं। हिंदी दिवस पर सारी हिंदी उडे.लकर बाकी सारा साल बिना हिंदी के तनाव के निकल जाता है। साल में हिंदी की एक बढ़िया खुराक ले लेने से पूरे साल देशभक्ति का और कोई बुखार नहीं चढ़ता। बड़ा आराम रहता है।

सवाल:- हिंदी की वर्तमान स्थिति कैसी है आपकी नज़र में?
जवाब:- हिंदी की हालत तो टनाटन है। हिंदी को किसकी नज़र लगनी है?

सवाल:- किस आधार पर कहते हैं आप ऐसा?
जवाब:- कौनौ एक हो तो बताएं। कहां तक गिनाएं?

सवाल:- कोई एक बता दीजिए।
जबाव:- हम सारा काम बुराई-भलाई छोड़कर टीवी पर हिंदी सीरियल देखते हैं। घटिया से घटिया¸ इतने घटिया कि देखकर रोना आता है¸ सिर्फ़ इसीलिए कि वो हिंदी में बने है। यही सीरियल अगर अंग्रेज़ी में दिखाया जाए तो चैनेल बंद हो जाए। करोड़ों घंटे हम रोज़ होम कर देते हैं हिंदी के लिए। ये कम बड़ा प्रमाण/आधार है हिंदी की टनाटन स्थिति का?

सवाल:- अक्सर बात उठती है कि हिंदी को अंग्रेज़ी से ख़तरा है। आपका क्या कहना है?
जवाब:- कौनौ ख़तरा नहीं है। हिंदी कोई बताशा है क्या जो अंग्रेज़ी की बारिश में घुल जायेगी? न ही हिंदी कोई छुई-मुई का फूल है जो अंग्रेज़ी की उंगली देख के मुरझा जाएगी।

सवाल:- हिंदी भाषा में अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रदूषण हिंगलिश के बारे में आपका क्या कहना है?
जवाब:- ये रगड़-घसड़ तो चलती ही रहती है। जिसके कल्ले में बूता होगा वो टिकेगा। जो बचेगा सो रचेगा। समय की मांग को जो भाषा पूरा करती रहेगी उसकी पूछ होगी वर्ना आदरणीय¸ वंदनीय¸ पूजनीय बताकर अप्रासंगिक बन जाएगी।

सवाल:- लोग कहते हैं कि अगर कंप्यूटर के विकास की भाषा हिंदी जैसी वैज्ञानिक भाषा होती तो वो आज के मुकाबले बीस वर्ष अधिक विकसित होता।
जवाब:- ये बात तो हम पिछले बीस साल से सुन रहे हैं। तो क्या वहां कोई सुप्रीम कोर्ट का स्टे है हिंदी में कंप्यूटर के विकास पर? बनाओ। निकलो आगे। झुट्‌ठै स्यापा करने रहने क्या मिलेगा?

सवाल:- बॉलीवुड वाले जो हिंदी की रोटी खाते हैं¸ हिंदी बोलने से क्यों कतराते हैं? रोटी खाते हैं¸ हिंदी बोलने से क्यों कतराते हैं? इसका जवाब ज़रा विस्तार से दें काहे से कि यह सिनेमा वालों से जुड़ा है और इसलिए जवाब में ये दिल मांगे मोर की ख़ास फ़रमाइस है लोगों की।
जवाब:- इसके पीछे आर्थिक मजबूरी मूल कारण हैं। असल में तीन घंटे के सिनेमा में काम करने के लिए हीरो-हीरोइनों को कुछेक करोड़ रुपये मात्र मिलते हैं। हिंदी फ़िल्मों में काम करते समय तो डायलाग लिखने वाला डायलाग लिख देता है वो डायलाग इन्हें मुफ्.त में मिल जाते हैं सो ये बोल लेते हैं। एक बार जहां सिनेमा पूरा हुआ नहीं कि लेखक लोग हीरो-हीरोइन को घास डालना बंद कर देते हैं। इनके लिए डायलाग लिखना भी बंद कर देते हैं। अब इतने पैसे तो हर कलाकार के पास तो होते नहीं कि पैसे देकर ज़िंदगी भर के लिए डायलाग लिखा ले। पचास खर्चे होते हैं उनके। माफ़िया को उगाही देना होता है¸ पहली बीबी को हर्जाना देना होता है¸ एक फ्लैट बेच कर दूसरा ख़रीदना होता है। हालात यह कि तमाम खर्चों के बीच वह इत्ते पैसे नहीं बचा पाता कि किसी कायदे के लेखक से डायलाग लिखा सके। मजबूरी में वह न चाहते हुए भी अपने हालात की तरह टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेज़ी बोलने पर मजबूर होता है।

अब हिंदी चूंकि वह थोड़ी बहुत समझ लेता है लिहाज़ा उसे पता लग जाता है कि कितनी वाहियात बोल रहा है। फिर वह घबराकर अंग्रेज़ी बोलना शुरू कर देता है। अंग्रेज़ी में यह सुविधा होती है चाहे जैसे बोलो¸ असर करती है। आत्मविश्वास के साथ कुछ ग़लत बोलो तो कुछ ज़्यादा ही असर करती है। बोलचाल में जो कुछ चूक हो जाती है उसे ये लोग अपने शरीर की भाषा (बाडी लैन्गुयेज) से पूरा करते हैं। बेहतर अभिव्यक्ति के प्रयास में कोई-कोई हीरोइने तो अपने पूरे शरीर को ही लैंग्वेज में झोंक देती हैं। जिह्वा मूक रहती है¸ जिस्म बोलने लगता है। अब हिंदी लाख वैज्ञानिक भाषा हो लेकिन इतनी सक्षम नहीं कि ज़बान के बदले शरीर से निकलने लगे। तो यह अभिनेता हिंदी बोलने से कतराते नहीं। उनके पास समुचित डायलाग का अभाव होता है जिसके कारण वे चाहते हुए भी हिंदी में नहीं बोल पाते हैं।

सवाल:- चलिए वालीवुड का तो समझ में आया कुछ मामला और मजबूरी लेकिन अच्छी तरह हिंदी जानने वाले बीच-बीच में
अंग्रेज़ी के वाक्य क्यों बोलते रहते हैं?
जवाब:- आमतौर पर यह बेवकू.फ़ी लोग इसलिए करते हैं ताकि लोग उनको मात्र हिंदी का जानकार समझकर बेवकूफ़समझने की बेवकूफ़ी न कर बैठे। हिंदी के बीच-बीच में अंग्रेज़ी बोलने से व्यक्तित्व में उसी निखार आता है जिस क्रीम पोतने से चेहरे पर चमक आ जाती है और जीवन साथी तुरंत पट/फिदा हो जाता है। वास्तव में ऐसे लोगों के लिए अंग्रेज़ी एक जैक की तरह काम करता है जिसके सहारे वे अपने विश्वास का पहिया ऊपर उचकाकर व्यक्तित्व का पंचर बनाते हैं। लेकिन देखा गया है ऐसे लोगों का हिंदी और अंग्रेज़ी पर समान अधिकार होता है यानी दोनों भाषाओं का ज्ञान चौपट होता है उनका।

सवाल:- हिंदी दिवस पर आपके विचार?
जवाब:- हमें तो भइया ये खिजाब लगाकर जवान दिखने की कोशिश लगती है। शिलाजीत खाकर मर्दानगी हासिल करने
का प्रयास। जो करना हो करो¸ नहीं तो किनारे हटो। अरण्यरोदन मत करो। जी घबराता है।

सवाल:- हिंदी की प्रगति के बारे में आपके सुझाव?
जवाब:- देखो भइया¸ जबर की बात सब सुनते है। मज़बूत बनो-हर तरह से। देखो तुम्हारा रोना-गाना तक लोग नकल करेंगे। तुम्हारी बेवकूफ़ियों तक का तार्किक महिमामंडन होगा। पीछे रहोगे तो रोते रहोगे-ऐसे ही। हिंदी दिवस की तरह। इसलिए समर्थ बनो। वो क्या कहते हैं:- इतना ऊंचे उठो कि जितना उठा गगन है।

सवाल:- आप क्या ख़ास करने वाले हैं इस अवसर पर?
जवाब:- हम का करेंगे? विचार करेंगे। खा-पी के थोड़ा चिंता करेंगे हिंदी के बारे में। चिट्‌ठा/लेख लिखेंगे। लिखके थक जाएंगे। फिर सो जाएंगे। और कितना त्याग किया जा सकता है-- बताओ?


गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

शिक्षा मंत्री परमार ने सच क्या बोला, हंगामा हो गया

राजनीति भी अजीबोगरीब चीज है। नेता झूठ बोले तो बवाल और सच बोल जाए तो हंगामा। इधर कुआं, उधर खाई। नेता बेचारा जाए कहां? तभी तो बुजुर्गों ने कहा है कि बोलने से पहले तोलना चाहिए, मगर जुबान है कि दातों से बचने-बचाने के चक्कर में फिसल ही जाती है। और जुबान फिसल जाए तो राजनीति भी पसर जाती है। अपने पूरे रंग दिखाती है। हाल ही उच्चा शिक्षा मंत्री बने दयाराम परमार के साथ ऐसा ही हुआ। उन्होंने इतना भर कहा कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अच्छे नेता तो हैं ही, अच्छे जादूगर भी हैं। नेता लोगों की मति भ्रमित करने में माहिर होता है तो जादूगर नजरों को। गहलोत में दोनों ही गुण हैं। इसी कारण चालीस साल से राजनीति में जमे हुए हैं और दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए हैं। अब भला इसमें परमार ने गलत क्या कह दिया। वे खुद भी यही सवाल कर रहे हैं कि उन्होंने कुछ गलत कहा क्या?  सब जानते हैं कि गहलोत जादूगर घराने से हैं और कांग्रेस हाईकमान पर जादू किए हुए हैं, वरना दुनियाभर के विवादों के बाद भी मुख्यमंत्री पद पर कैसे बने रह सकते थे? कदाचित ऐसा भी हो कि कुछ तुतला कर बोलने के कारण हाईकमान उनमें बच्चे जैसी मासूमियत और सच्चाई समझ कर माफ करता रहा हो। वे पूरे दो-ढ़ाई साल तक शातिर और खांटी नेता सी. पी. जोशी के हर वार को खारिज करते रहे, तो जरूर में उनमें कोई कला ही होगी। और कोई होता तो कब का धराशायी हो जाता।
खैर, बात चल रही थी परमार की। असल में वे बूंदी में कन्या महाविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष के शपथ ग्रहण समारोह में नेताओं के अच्छे गुण बता रहे थे। लगे हाथ गहलोत के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने को उनको भी आदर्श नेता बताने के चक्कर में ऐसा कह बैठे, मगर उनके इस बयान को लेकर हंगामा हो गया। इसे इस अर्थ में लिया गया कि गहलोत धोखा देने में माहिर हैं। हालांकि दयाराम परमार दिल के बड़े साफ आदमी हैं और उन्होंने नेताओं के सर्वोपरि गुण मति भ्रमित करने को ही गिनाया था, मगर यदि उनका मतलब धोखा देने में माहिर होना भी निकाला जाए तो इसमें गलत क्या है? वैसे भी मति भ्रमित करने और धोखा देने में फर्क ही क्या है? मति भ्रमित करने के मतलब भी यही है कि जो है, उससे ध्यान हटा कर कुछ और दिखाना और धोखा देने का मतलब भी यही है। फर्क सिर्फ इतना है कि मति भ्रमित करना कुछ साफ-सुथरा तो धोखा देना कुछ घटिया शब्द है। यानि मूल तत्व वही है, मगर चेहरा अलग-अलग है। कॉलेज की छात्राओं को वे यही सिखा रहे थे कि यदि अच्छा नेता बनना है तो गहलोत की तरह लोगों की मति भ्रमित करना सीख लें। इसमें उन्होंने गलत क्या कह दिया? यह एक सच्चाई ही है। नेता वही कामयाब है जो जनता को वैसा ही दृश्य दिखाए जो उसके अनुकूल होता हो। क्या यह कम बात है कि गहलोत ने पूरे तीन साल तक कांग्रेसियों की मति भ्रमित करके रखी और राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर लॉलीपोप देते रहे। और मजे की बात है कि कोई चूं तक नहीं बोला। भले ही परमार का मकसद गहलोत को धोखेबाज कहना न हो, मगर चूंकि इन दिनों नेताओं पर शनि की महादशा है, इस कारण अर्थ का अनर्थ निकाला जाता है। अल्पसंख्यक विभाग और वक्फ राज्य मंत्री अमीन खान के साथ भी तो यही हुआ था। उन्होंने राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटील की तारीफ करने के चक्कर में वह सब कह दिया जो संभांत समाज में नहीं कहा जाता। नतीजतन उन्हें पद गंवाना पड़ा था। माफी भी मांगनी पड़ी। वो तो उनकी शराफत देखते हुए और मुसलमानों की नाराजगी को दूर करने के लिए उन्हें फिर से मौका मिला गया।
वैसे एक बात है, राजनीति में बड़बोलापन तकलीफ ही देता है। पूर्व शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल को भी यही बीमारी थी। बड़बोलेपन के कारण उन्हें कई बार विवाद से गुजरना पड़ा था। वे इतने विवादित हो गए कि आखिर पर से हटा दिए गए। यह एक संयोग ही है कि नए शिक्षा मंत्री परमार भी इसी बड़बोलेपन से ग्रसित हो गए। ये तो पता नहीं कि इस पद के साथ ही कोई चक्कर है, या दोनो वाकई बड़बोले हैं, मगर शिक्षा, ज्ञान और समझदारी देने वाले महकमे के मंत्री ही नासमझी क्यों कर रहे हैं, ये समझ में नहीं आ रहा।
-tejwanig@gmail.com

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

बदकिस्मती बिकती है, खरीदेंगे?

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वह उठा और एक छोटी कैंची ले आया। उसने कैंची से प्यूपा का छेद बड़ा कर दिया। तितली आराम से बाहर आ गई। आदमी उत्सुक उसे उड़ते देखने को बैठा रहा, लेकिन वह नहीं उड़ी। उंगली से उड़ाने की कोशिश पर वह बस हल्के से हिल डुलकर रह गई, उड़ नहीं पाई...

सीजेरियन प्रसव यानी बच्चे के लिए सुरक्षित। मां को भी प्रसव-वेदना से मुक्ति। यह भ्रम व्यापकता से फैलाया गया है। जनसाधारण को यही बताने के लिए आज की मीटिंग थी। एक छोटी फिल्म दिखाई गई। एक प्यूपा दिखा जिसमें अंदर से छेद कर तितली निकलने की कोशिश कर रही थी। पास बैठा एक आदमी गौर से तितली की यह चेष्टा देख रहा था। बार बार कोशिश के बावजूद भी तितली बाहर नहीं निकल पा रही थी। आदमी को दया आई। वह उठा और एक छोटी कैंची ले आया। उसने कैंची से प्यूपा का छेद बड़ा कर दिया। तितली आराम से बाहर आ गई। आदमी उत्सुक उसे उड़ते देखने को बैठा रहा, लेकिन वह नहीं उड़ी। उंगली से उड़ाने की कोशिश पर वह बस हल्के से हिलडुल कर रह गई, उड़ नहीं पाई।

तितली नहीं उड़ पाई, क्यों कि आदमी ने जो दया की थी वह प्रकृति-प्रतिकूल क्रिया थी। तितली को प्यूपा से निकल ने के लिए जो मशक्कत करनी पड़ती है वह प्रकृति नियत सप्रयोजन है। इस दौरान तितली को जो जोर लगाना पड़ता है उस से उसका रक्त बह कर उसके पंखों में आ जाता है जिससे बाहर आने के तुरंत बाद वह उड़ने में सक्षम हो जाती है। उसी तरह प्रसव के दौरान गर्भपथ से गुजरने की मषक्कत में शिशु के शरीर में प्रकृति नियत ऎसे परिवर्तन होते हैं जो उसे असुरक्षित परिवश से लड़ने की क्षमता देते हैं।

दबाव के कारण शिशु के शरीर में केटाकोलामिन नामक पदार्थ स्त्रावित होते हैं। इनसे लिवर में संग्रहित ग्लाईकोजन ग्लुकोस में बदल जाता है जो शीघ्र-ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करता है। शिशुु के फेंफड़ों में स्थित गर्भजल अवशोषित हो जाता है जिससे आक्सीजन एक्सचेंज सुगम हो जाता है। सीजेरियन प्रसव में यह सब नहीं होता अत: प्रसवोपरांत अगर कुछ गड़बड़ हुई तो शिशु उससे पार पाने में सक्षम नहीं होता। इसके अतिरिक्त सीजेरियन के तुरन्त बाद नाल बांध कर काटना भी प्रकृति विरूद्ध होता है। प्लेसेन्टा (आंवल) में स्थित रक्त नवजात के शरीर में नहीं पहुंचता।

सीजेरियन प्रसव। तुरन्त नाल बांध बच्चा बालचिकित्सक के हवाले। अस्पताल की नवजात सघन इकाई में देख रेख। बच्चा देखने में स्वस्थ। बड़ा हुआ। पढ़ने भेजा। सीखने में कमजोर, लनिंüग डिसेबिलिटी (ऑटिज्म) का षिकार। इसका कोई और कारण नहीं मिला। दूसरा बच्चा मंद बुद्धि। उसमें भी इसका और कोई कारण नहीं मिला। मां बाप का दुख सहज ही समझा जा सकता है। सीजेरियन प्रसव की बढ़ती दर के साथ इन विकालांगताओं की दर बढ़ती जा रही है। आधुनिक व्यवासायीकृत चिकित्सा में अकारण होते सीजेरियन प्रसवों की यही त्रासदी है। दुर्भाग्य यह कि त्रासदी, अनजाने में, लोग अच्छा खर्च कर मोल लेते हैं।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

एक मुलाकात के 80 बरस

20वीं सदी के दो महापुरूषों के मिलन की ऎतिहासिक घटना को स्विटजरलैंड निवासी दिसम्बर महीने में बड़े धूमधाम के साथ मना रहे हैं। यह वर्ष स्विटजरलैंड के एक छोटे से कस्बे के लिए गौरव का वर्ष है, जब 6 दिसम्बर 1931 को नाबेल विजेता महान साहित्यकार रोम्यां रोला और महात्मा गांधी की मुलाकात हुई थी। यहां उल्लेखनीय है कि रोमां रोलां महात्मा गांधी के सत्य ओर अहिंसा के दर्शन से इतने प्रभावित थे कि बिना उनसे मिले ही उनके बारे में एक किताब "महात्मा गांधी" लिख डाली थी जिसका प्रकाशन 1924 में हो गया था।

जब रोमां रोलां को इस बात का पता चला कि महात्मा गांधी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेन आ रहे हैं तो उन्होंने गांधी जी से मिलने की आतुरता जाहिर की । गांधी जी भी इतने प्रभावित थे कि उन्होंने उनसे मिलने का फैसला कर लिया। लेकिन जिस दिन गांधी जी उनके छोटे से कस्बेे के स्टेशन पर उतरे तो रोमां रोलां उनसे मिलने नहीं आए। एक क्षण को गांधी जी को आश्चर्य हुआ लेकिन बाद में पता चला कि रोमां रोला दमे के मरीज हेाने और भयंकर बारिश हो जाने के कारण, वे उन्हे स्टेशन पर मिलने नहीं आए। लेकिन इसके बाद वे 6 दिसम्बर से लेकर 11 दिसम्बर तक उनके अतिथि बन कर रहे।

जब तक गांधी जी उनके घर पर रहे उन दोनों के बीच विश्व की राजनीति से लेकर ईश्वर, सत्य और अहिंसा जैसे दार्शüनिक विषयों पर मात्र पांच दिनों में 15 घंटे की बातचीत हुईं रोम्या रोलां को गीता का श्लोक का पाठ सुनना अच्छा लगता था। रोला को संस्कृत के मंत्र के उच्चारण का संगीत तथा राम और शिव को लेकर उसकी व्याख्या अच्छी लगती थी। शॅाल लपेटे गांधी और लांग कोट में लदफदे रोला की तस्वीरो को वहां के तमाम अखबारों में इन दिनों ढ़ूंढ़ा जा रहा है।

रोमां रेालां की छोेटी बहन मेडेलिन रोलां ने, जो स्वयं एक लेखिका थी, लिखा था कि "जब तक गांधी जी रहे तब तक उनके कमरे की खिड़की के सामने एक युवा संगीतकार सांझ ढलते ही वायलिन बजाना शुरू कर देता। इसके साथ ही बायलिन बजाते हुए बच्चों की एक भीड़ जमा कर लेता। एक जापानी कलाकार गांधी जी से जुड़ी सभी घटनाओं के स्कैच बनाता रहता।

और गांधी जी स्वयं स्थानीय समाचार पत्र के संवाददाताओं से घिरे रहते।" गांधी जी की विदाई को लेकर स्वयं रोमंा रोलां ने पियानो बजा कर गांधी जी को सुनाया था। आश्चर्य की बात यह है कि आठ दशको के बाद भी वाउद कस्वे के निवासी इस ऎतिहासिक मिलन की याद करते हुए जश्न की तैयारियां अभी से करने लगे हैं। इस जश्न को 6 दिसम्बर से लगभग सप्ताह भर तक वहां के लोग मनाते रहेंगे।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

प्रेम गली अति सांकरी




Pariwar
प्रेम गली अति सांकरी
हमारे यहां प्रेम करना और प्रेम न करना दोनों ही कभी खतरे से खाली नहीं रहे। आम दिनों की तो छोडिए, वैलेंटाइन डे तक पर श्रीराम सेना वाले तो यह धमकी दे देते हैं कि जो प्रेम करता हुआ पाया गया, उसे पीटेंगे और सरकार पुलिस को यह आदेश दे देती है कि इस दिन कोई भी नागरिक प्रेम से वंचित नहीं रहना चाहिए। इसलिए प्रेम करने वाले तो श्रीराम सेना वालों से पिटते हैं और प्रेम न करने वाले पुलिस वालों से।

मुझसे कई प्रकार के लोग कई प्रकार की सलाह लेने आते रहते हैं। इस भय से कि जाकर सलाह नहीं ली, तो खुद देने आ जाएगा। उम्र का एक दौर ऎसा आता ही है जब आदमी को धन्नो भी बसंती लगने लगती है। ऎसी ही दशा वाला एक नौजवान मेरे पास आया और निवेदन किया, 'एक सलाह मिलेगी?'

मैंने झट कहा, 'बैठे किसलिए हैं? सलाहें तो मैं बिन मांगे ही देता रहता हूं जबकि तुम तो मांग भी कर रहे हो। एक क्यों दस मांगो।' उसने इच्छा प्रकट की, 'मैं चौपाया होना चाहता हूं। आपकी क्या राय है?'मैंने प्रति प्रश्न किया, 'अक्ल से तो लग ही रहे हो और भला किस तरह चौपाया होना चाहते हो?' उसने बात घुमाई, 'क्या आपने प्रेम या प्रेम विवाह किया है?'

मैं बोला, 'मैंने न एक बार भी लव किया और न एक बार भी लव मैरिज। प्यार-व्यार के मामले में मेरी स्थिति नितांत 'क्या जाने अदरक का स्वाद' वाली रही है। मेरी शादी पूरी तरह सुनियोजित थी। और मेरी भांति शादियाए हुए जानते ही हैं कि हिंदुस्तान में मैरिज अरेंज्ड हो, तो सारे काम बाप करता है सिवाय फेरे खाने के।
मुझे तो स्कूल-कॉलेज के दिनों में भी प्रेम-व्रेम नसीब नहीं हुआ। मैं था हिंदी साहित्य का छात्र सो मुझ मरते हुए पर कौन मरती? किंतु यह कमजोरी ही मेरी ताकत भी थी। एक तो मेरे हिंदी साहित्य का विद्यार्थी होने से भी मेरी भाषा जरा ठीक थी। दूसरा, मैंने ट्रकों से शेरो-शायरी नोट कर-कर के पर्याप्त होमवर्क कर रखा था। इसलिए प्रेमीजन मुझसे प्रेमपत्र लिखवाते थे। और सत्य कह रहा हूं कि जिस लड़के को प्रेमपत्र लिख देता था, उसके दो नतीजे तय थे। या तो वह अपनी प्रेमिका या उसके अन्य प्रेमियों से पिटता था या फिर उसकी अपनी प्रेमिका से शादी हो जाती थी (हालांकि, ले देकर बातें दोनों एक ही हैं)। भले ही जमाना गुजर गया किंतु यदा-कदा आज भी कई टकराते रहते हैं, अपनी प्रेमिका-पत्नी और बाल-बच्चों के साथ जो मेरे लिखे प्रेमपत्रों की वजह से ही ब्याहे गए थे। मुझे देखते ही दांत पीस कर कहने लगते हैं कि नालायक जॉर्ज बुश। तुम्हीं हो जिसने मुझ अच्छे- खासे अमरीकी सिपाही को इराक में उलझा दिया।'

वह बोला, 'तब तो आपसे इश्क-मोहब्बत के विषय में सलाह तो दूर, चर्चा करना ही व्यर्थ है।'मैंने कहा, 'व्यर्थ क्यों है? सच है कि मैंने स्वयं कभी भांग नहीं पी लेकिन भंगेडियों को तो देखा ही है। यों भी सलाह-मशविरा देने के लिए उस विषय की एबीसीडी ज्ञात होना जरूरी थोड़े ही है।'

उसने बात बढ़ाई, 'बताइए कि मुझे लव मैरिज करनी चाहिए या अरेंज्ड मैरिज?'मैंने सलाह दी, 'जब घंटे भर घोड़ी पर बैठ कर जिंदगी भर के लिए घोड़ी ही होना है, तो लव का बाईपास क्यों? प्रेम से नहीं बच सके हो तो कोई बात नहीं, प्रेमविवाह से तो बचो। अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा कि काश वक्त रहते किसी पेशेवर प्रेमी से गीता रहस्य जान लेते, तो मोक्ष पा जाते। भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में ही प्रयोग कर सिद्ध कर दिया था कि सफल गृहस्थी का कुल रहस्य यह है कि रास राधा के संग रचाओ और ब्याह रूक्मिणी से करो।' उसने शंका प्रकट की, 'क्या प्रेम विवाह के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं?'

मैंने कहा, 'कितने गिनाऊं? ब्याह की कुनैन खाते ही प्यार का मलेरिया उतर जाता है। जंगली तोते को पिंजरे में रख दो, तो वह हरीमिर्च और चने की दाल पर आ जाता है। जो उड़-उड़ कर टीं-टीं गाता रहता था, बेचारा राम-राम बोलने लगता है। धन्नो को बसंती समझने वाला ब्याह होते ही उसी बसंती की धन्नो बन जाता है। प्रेमिका के संग प्यार के वक्त झीलों में फेंके गए कंकर शादी होते ही दाल में निकलने लगते हैं। प्रेमी जिस प्रेमिका को लेकर भागता है, शादी के बाद उसे देखते ही भागने लगता है।

उस पर उम्र का जोश हावी था। उसने मेरी संपूर्ण सलाह खारिज की और मुझे चिढ़ाने की गरज से खुमार बाराबंकवी का शेर सुनाया- 'न हारा है इश्क न दुनिया थकी है/दिया जल रहा है हवा चल रही है।'मैं भी कहां परास्त होने वाला था। अविलंब सलाह दी, 'वक्त की नजाकत को समझो प्यारे। प्रेम दर्शन का विषय है, प्रदर्शन का नही, बचो। समय बदल चुका है।'
संपत सरल
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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

काशी कथा वाया मोहल्ला अस्सी


काशी कथा वाया मोहल्ला अस्सी
Hum Tum special article
काशी की जिंदगी के महžवपूर्ण हिस्से और धर्म की धुरी कहे जाने वाले मोहल्ला अस्सी पर हिंदी के अनूठे कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' के शब्दों को पिघलाकर चलते हुए चित्रों में तब्दील किया जा रहा है।

बनारस के घाटों की गोद में अलसायी सी लेटी गंगा को सुबह सुबह देखिए। सूरज पूर्व से अपनी पहली किरण उसे जगाने को भेजता है और अनमनी सी बहती गंगा हवा की मनुहारों के साथ अंगड़ाई लेती है। नावों के इंजन घरघराते हैं, हर हर महादेव की ध्वनियां गूंजती हैं। लोग डुबकियां लगा रहे हैं। यह मैजिक ऑवर है, रोशनी के लिहाज से।

डा.चंद्रप्रकाश द्विवदी निर्देशित फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' की यूनिट नावों में सवार है। वे इसी जादुई रोशनी के बीच सुबह का शिड्यूल पूरा कर लेना चाहते हैं। काशी की जिंदगी के महžवपूर्ण हिस्से और धर्म की धुरी कहे जाने वाले मोहल्ला अस्सी पर हिंदी के अनूठे कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' के शब्दों को पिघलाकर चलते हुए चित्रों में तब्दील किया जा रहा है। यह सिनेमा और साहित्य के संगम का अनूठा अवसर है। हम घूमने बनारस गए हैं और देखा कि वहां शूटिंग भी चल रही है तो यह यात्रा अपने आप में नई हो गई।

यह बेहद दिलचस्प है कि एक प्रतिबद्ध वामपंथी लेखक काशीनाथ सिंह की कृति पर एक समृद्ध इतिहासबोध वाले लेकिन विचारधारा में दक्षिणपंथी कहलाने वाले डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी फिल्म बना रहे हैं। दो धाराओं का यह संगम हुआ कैसे?

बकौल डॉ. द्विवेदी, जब उन्होंने उपन्यास पढा तो वे इसकी कहानी और शिल्प को लेकर चकित थे। इतिहास मुझे प्रिय रहा है और है लेकिन मैं अपने ऊपर लगे इतिहासवादी लेबल से भी अलग कुछ करना चाहता था। मैंने लगातार काशीनाथ जी से संपर्क रखा और वे मेरी दृष्टि से सहमत हुए। मैंने उन्हें यकीन दिलाया कि उपन्यास की आत्मा वही रहेगी। बस कोई बदलाव होगा तो वह सिनेमाई जरूरत के हिसाब से होगा।

काशीनाथ सिंह कहते हैं, मैं उनके दक्षिणपंथी रूझान से वाकिफ रहा हूं लेकिन डा. साहब की बातचीत और उपन्यास को लेकर नजरिए से मैं आश्वस्त था। फिर मैंने उनकी फिल्म पिंजर देखी और यह पुख्ता हो गया कि डा. द्विवेदी से बेहतर इस पर कोई फिल्म नहीं बना सकता। काशीनाथ सिंह यह कबूल करते हैं कि इस खबर के बाहर आते ही इंडस्ट्री के दो बड़े निर्देशकों ने उनसे संपर्क किया था लेकिन अव्वल तो मैं डा. साब को जुबान दे चुका था और दूसरे मैं आश्वस्त नहीं था कि वे लोग उस तरह विषय के साथ न्याय कर पाएंगे जैसा मुझे डा. चंद्रप्रकाश द्विवेदी पर यकीन है।

लेखक और निर्देशक के आपसी यकीन का आलम यह है कि फिल्म की पटकथा डा. द्विवेदी ने लिखी है और काशीनाथ सिंह ने उसे पढ़ना जरूरी नहीं समझा। वे कहते हैं, इससे किसी निर्देशक की मेहनत का अपमान होता कि मैं उन पर भरोसा नहीं कर रहा। मैं मानता हूं कि उपन्यास में कंकाल तो मेरा है लेकिन उसको मांस मज्जा की सिनेमाई जरूरत से भरने का हक निर्देशक का ही है और उसमें कहानी के लेखक होने के नाते मुझे दखल नहीं करनी चाहिए।

आप शूटिंग के दौरान देख सकते हैं कि मुंह में पान दबाए धोती कुर्ते में काशीनाथ सिंह, रामबचन पांडे, गया सिंह सब के सब बेतकल्लुफी से किसी भी वैनिटी वैन में आ जा रहे हैं। अपनी ही भूमिका निभा रहे चरित्रों से मिल रहे हैं और उन्हीं संवादों को सुनते हुए अभिभूत हैं जो उनके मुंह से उपन्यास में कहे गए हैं। बनारस के लोगों के बीच अचानक से ये सब लोग महत्त्वपूर्ण हो गए हैं।

पहले वे इन्हें नाम से जानते ही थे लेकिन अब यह भी देखा है कि किस तरह उनकी इज्जत की जा रही है। बहरहाल, जिन लोगों ने उपन्यास पढा है, वे जानते हैं कि इसमें काशी में प्रचलित गालियां जुबान का हिस्सा हैं और जैसा कि निर्देशक और लेखक दोनों की मानते हैं कि गालियां फिल्म में रहेंगी ही क्योंकि वे अश्लील होने से कहीं ज्यादा उस भाषायी संस्कृति का बोध कराती हैं जो बनारस और अस्सी घाट की परंपरा रही है। काशीनाथ सिंह हंसते हुए कहते हैं, 'डा. साब ने मुझे आश्वस्त किया है कि कहानी में इस्तेमाल 53 गालियां ज्यों की त्यों फिल्म के संवादों में हैं।'

पप्पू की दुकान के रूपक के माध्यम से पूरी कहानी समकालीन परिदृश्य में घटित होती है, जिसके अपने राजनीतिक मायने हैं और बकौल निर्देशक इसे कला फिल्म समझने की कोई गलती नहीं करनी चाहिए। हमारे समय के बदलाव को लेकर नए और पुराने के संघर्ष को लेकर यह एक जबरदस्त कहानी है, जिसमें मनोरंजन घुला हुआ है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि कहानी में आने वाले पात्रों के असली किरदार भी शूटिंग स्थल पर मौजूद रहे हैं जिनमें खुद काशीनाथ सिंह के अलावा रामबचन पांडे, गया सिंह, पप्पू चाय वाला और तन्नी गुरू के परिवार के लोग। फिल्म के मुख्य कलाकार सन्नी देओल कहते हैं, 'डा. द्विवेदी ने कमाल कर रहे है, खासकर मैं समझता हूं यह मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और सुख देने वाली भूमिका रही है। वे परफेक्शनिस्ट हैं। अपने संवादों के साथ छेड़छाड़ करने की इजाजत कलाकार को नहीं देते।' फिल्म के दूसरे कलाकार रवि किशन कहते हैं, 'सच कहूं तो मैं सैट पर कई बार संवाद इप्रोवाइज करता हंू लेकिन डॉ. साब ने हमें स्क्रिप्ट पढने के लिए बाध्य किया। हमें डॉयलॉग्स याद करने पड़े ताकि उन्हें बोलते समय हमारे भाव अपनी भूमिका के मुताबिक बने रहें।'

एक साहित्यिक कहानी पर दांव खेलने वाले निर्माता विनय तिवारी कहते हैं, 'मैंने उपन्यास पहले से ही पढा था। बनारस के मोहल्ला अस्सी के बहाने यह हमारे समय की सबसे जादुई कहानी मुझे लगती है और संयोग देखिए कि डा. द्विवेदी यह फिल्म निर्देेशित करना चाहते थे और मैं चाहता था कि अपनी कंपनी की पहली फिल्म की शुरूआत इसी कहानी से करूं।'

काशीनाथ सिंह कहते हैं, 'हिंदी लेखकों में बहुत लोगों ने मुंबई जाकर सिनेमा में लिखने की कोशिश की, जिनमें प्रेमचंद भी शामिल हैं, लेकिन शायद ही कोई हो, जो अपमानित होकर ना लौटा हो, या कड़वे अनुभव लेकर नही आया हो। ऎसे में इन लोगों को लेखक के प्रति आदर बेहतर है।' काशीनाथ सिंह यह भी कहते हैं कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि इस उपन्यास पर फिल्म बनेगी। लिखते समय उनकी मंशा यह रही कि वे उपन्यास के परंपरागत ढांचे को तोड़े जिसमें संस्मरण, यथार्थ और कल्पना के साथ कथा तžव रखा।

'यथार्थ को रचनात्मक बनाना पड़ता है। मैंने असली लोगों के पात्र रचे और वे जिधर जा रहे थे, उन्हें जाने दिया। इस तरह आप कह सकते हैं मैं किसी एक पात्र में नहीं हूं, थोड़ा थोड़ा सब में हूं।' लेखन में विचारधारा के आरोपण पर वे कहते हैं, 'मैं अकसर समाज को बदलने की इच्छा रखने वाले विद्रोही लेखक के रूप में अपनी कहानियों में रहा लेकिन रूसी समाजवाद के विघटन के बाद जो भरोसा था, वह हिला और उसका पूरा दबाव भी काशी का अस्सी के पात्रों पर आया। हालांकि लिखने के दौरान मैं मार्क्सवादी बना रहा और मुझे यह भी लगता रहा कि सारी राजनीतिक पार्टियां अब एक जैसी हो गई हैं।' डा. द्विवेदी कहते हैं, लेखक की यह दुविधा हमारे नायक में भी है। नए-पुराने के द्वंद्व हैं। आस्था का संकट है। दुनिया बदल रही है। उपन्यास की मूल आत्मा फिल्म में है।

फिल्म को एक हिस्सा मुंबई में सैट लगाकर किया गया। पप्पू की दुकान से सारा सामान खरीदकर उसे असली लुक देने की कोशिश की गई। नामवर सिंह ओर काशीनाथ सिंह ने जब मुंबई जाकर सैट देखा था तो वे अवाक थे कि किस तरह बनारस की गलियां हूबहू वहां खड़ी कर दी गई हैं। और बाकी हिस्सा बनारस में शूट हुआ। निर्देशक कहते हैं, आप ही सोचिए क्या गंगा और बनारस के घाटों को कोई भी विकल्प हो सकता है। हमें पता था कि एक तो विषय ऎसा है और दूसरा हमारा राजनीतिक माहौल ऎसा हो गया है कि आप सोच नहीं सकते कि कब क्या हो जाए लेकिन अच्छा यह है कि बनारस के लोगों ने हमें पूरी मदद की।

और इस पूरे फिल्मी माहौल के बीच बनारस के सब लोग मस्त हैं। घाट पर बच्चे कुछ फिरंगी महिलाओं को अपने दीपक बेचने की फिराक में पीछे लगे हैं। वे मुस्कराते हुए उन्हें पीछे कर रही हैं। वे सब दोस्त हो गए हैं। वे बच्चे लपकों की तरह नहीं हैं। तत्काल समझ में आ जाता है कि वे विलायती बालाएं ओर देसी बच्चे आपस में एक दूसरे को पहले से ही जानते हैं, वे हिंदी बोलते हुए उन्हें आश्वस्त करती हैं, 'आज नहीं, कल खरीदेंगी।' और बच्चे फुदकते हुए नए ग्राहक को ढूंढने लगते हैं। सिगरेट के सुट्टे लगाती लड़कियों की ओर हमारा मोबाइल कैमरा देखकर एक लोकल गाइड कहता है,

'वाई आर यू टेकिंग पिक्स।' और हम कहते हैं, 'अपना काम करो भाई।' उसने हमारी शिकायत की है उन्हीं लड़कियों और लड़कों से, 'गायज, दे आर टेकिंग योर स्नैप्स।' लड़कियां हमें अपने फोटो दिखाने को और डिलीट करने को कहती हैं और कारण पूछा तो बताया गया कि वे फिल्म की यूनिट का हिस्सा हैं। उन्हें डायरेक्टर ने मना किया है कि वे उनकी अनुमति के बिना किसी को फोटो नहीं खींचने देंगी।

अस्सी घाट पर चाट वाले ने हमारे लिए चाट बनाई है। उससे पानी मांगा तो उसने यह काम अपने वेटर को बोला है। वेटर टाल गया है। तीन चार बार याद दिलाने पर उसने खुद जग उठाया है। पानी भरा है और यह क्या? गटागट खुद पी गया है। हमारी हंसी नहीं थम रही है, 'ये बनारस है, ग्राहक बैठा है और तुम खुद पानी पिए जा रहे हो।' और उसने मुस्कराकर जबाब दिया है, 'तो क्या हो गया भइया, हमको भी तो प्यास लगी है। आप अब पी लीजिए।' और उसने जग हमें थमा दिया।
दिनेश पारीक