कविता की दुनियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता की दुनियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 1 मई 2012

मेरा बचपन


लोटा दो वो बचपन की यादे , वो गलियों ,वो   नुकढ़ की बाते
लोटा दो मेरे जीते कंचे जो बाकि है | वो रंगबिंगी पत्नगे
वो सपनो की राजकुमारी लोटा दो वो दादा जी की कहानी
वो ऊंट की सवारी , वो १० पेसे की पेन्सिल ,
वो चुपके गुटके कहने की आदत , लोटा दो वो बचपन की बाते  मेरी बचपन की यादे ,
वो मासूम चेहरा , वो मासूमियत की लाली
क्यों नहीं लोटा ते वो बचपन की शेतानी  
ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
माँ जो बचपन में करती वो प्यार चाहिए
लोटा दो वो मेरा बचपन की बाते वो वो आँखों के आंसू
काश कोई लोटा दे वो बचपन का गुजरा जमाना

माँ पिता का वो प्यार वो मनुहार,
वो डांट फटकार, वो रोना मचलना,
वो रोती आँखों से मुस्कुराना याद आ गया,
बस रह गई एक कसक इतनी,
वो गुजरा जमाना जिसे छोड़ आये थे राह में कहीं,
अब भी खड़ा ताकता होगा राह उसी राहगुजर में,
पर बेबस हूँ मैं जा नहीं सकता वापिस,
उसकी यादो संग हसना रोना अब किस्मत मेरी,
वो गुजरा जमाना याद आ गया,
कोई तो लोटा दो वो बचपन की यादे , वो गलियों ,वो   नुकढ़ की बाते

दिनेश पारीक

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ


आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ

न मैं कंघी बनाता हूँ न मैं चोटी बनाता हूँ
ग़ज़ल में आपबीती को मैं जगबीती बनाता हूँ
ग़ज़ल वह सिन्फ़-ए-नाज़ुक़ है जिसे अपनी रफ़ाक़त से
वो महबूबा बना लेता है मैं बेटी बनाता हूँ
हुकूमत का हर एक इनआम है बंदूकसाज़ी पर
मुझे कैसे मिलेगा मैं तो बैसाखी बनाता हूँ
मेरे आँगन की कलियों को तमन्ना शाहज़ादों की
मगर मेरी मुसीबत है कि मैं बीड़ी बनाता हूँ
सज़ा कितनी बड़ी है गाँव से बाहर निकलने की
मैं मिट्टी गूँधता था अब डबल रोटी बनाता हूँ
वज़ारत चंद घंटों की महल मीनार से ऊँचा
मैं औरंगज़ेब हूँ अपने लिए खिचड़ी बनाता हूँ
बस इतनी इल्तिजा है तुम इसे गुजरात मत करना
तुम्हें इस मुल्क का मालिक मैं जीते-जी बनाता हूँ
मुझे इस शहर की सब लड़कियाँ आदाब करती हैं
मैं बच्चों की कलाई के लिए राखी बनाता हूँ
तुझे ऐ ज़िन्दगी अब क़ैदख़ाने से गुज़रना है
तुझे मैँ इस लिए दुख-दर्द का आदी बनाता हूँ
मैं अपने गाँव का मुखिया भी हूँ बच्चों का क़ातिल भी
जलाकर दूध कुछ लोगों की ख़ातिर घी बनाता हूँ
दिनेश पारीक 
दुस्र्भाश नो. ९५८२५९८२४४ 

शनिवार, 27 नवंबर 2010

मेरी कविताओं का संग्रह

हिन्दी, उर्दू और हिन्दी में अनूदित काव्य के इस विशाल संकलन में आपका स्वागत है। यह एक खुली परियोजना है जिसके विकास में कोई भी भाग ले सकता है -आप भी! आपसे निवेदन है कि आप भी इस संकलन के परिवर्धन में सहायता करें। देखिये कविता कोश में आप किस तरह योगदान कर सकते हैं।