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गुरुवार, 3 मई 2012

प्राइवेट पार्ट के गोरेपन पर इंटरनेट पर छिड़ी बहस

हद  हो गई  अब क्या  बाकि रह गया है  हिंदुस्तान का सेंशर बोर्ड कर क्या रहा है कभी डर्टी जेसी फिल्मे  आती है और अब तो टीवी पर भी विज्ञापन एसे दिखाई पड़ते है की  देखने वालो लो भी सरम मह्सुश  होने लगती है
मौजूदा समय में एक फेयरनेस क्रिम को लेकर इंटरनेट की दुनिया में जोरदार बवाल मचा हुआ है। यह बवाल हाल ही में टीवी पर प्रसारित हाईजीन फेयरनेस क्रिम के विज्ञापन को लेकर मचा है। इस क्रीम ने यह दावा किया है कि इसके इस्‍तेमाल से महिलाएं अपने प्राइवेट पार्ट का रंग निखार सकती हैं। इस विज्ञापन के प्रसारण के बाद इंटरनेट की दुनिया में एक नई बहस छिड़ गई है और लोग इस विज्ञापन की जमकर निंदा कर रहे हैं।

आगे की बात करने से पहले आपको विज्ञापन के बारे में बताते हैं। विज्ञापन में दिखाया गया है कि एक पत्‍नी इस बात से बेहद परेशान है कि उसका पति उससे ज्‍यादा अखबारों में खोया रहता है। विज्ञापन में दिखाया गया है कि जैसे ही वह इस हाईजीन क्रीम का इस्‍तेमाल करती ह‍ै उसका पति उसकी ओर खिंचा चला आता है।

अब जरा इंटरनेट की दुनिया में मचे घमासान के बारे में चर्चा करते हैं। इस विज्ञापन को लेकर लोगों में खासा रोष है। सोशल नेटवर्किंग साइट यू ट्यूब पर तो इस विज्ञापन को सात लाख से भी ज्‍यादा लोग देख चुके हैं और इनमें ज्‍यादातर इसके खिलाफ हैं। यू ट्यूब पर एक यूजर्स ने इस विज्ञापन के बारे में प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि 'महिलाओं को उपेक्षित महसूस कराने वाला एक और उत्‍पाद'। वहीं एक दूसरे यूजर्स ने लिखा है कि 'क्‍या वाकई में इस विज्ञापन में प्राइवेट पार्ट को लेकर महिलाओं की समस्‍याओं को दिखाया गया है? क्‍या वाकई में त्‍वचा का रंग एक समस्‍या है? यह पूरी तरह बकवास है।'

मालूम हो कि बॉलीवुड की कई हस्‍तियां और पूर्व आईपीएस अधिकारी किरन बेदी भी फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन करते हुए नजर आ चुकी हैं। जिनका दावा है कि उनकी क्रीम के इस्‍तेमाल से कोई भी गोरा बन सकता है और वह सबकुछ हासिल कर सकता है जिसकी उसे चाहत है। इन विज्ञापनों में दिखाया जाता है कि किस तरह सांवाले रंग वाली लड़की तब तक आगे नहीं बढ़ पाती जब त‍क कि वो इस जादूई फेयरनेस क्रीम का इस्‍तेमाल न कर ले। अब सवाल यह है कि क्‍या इस तरह के विज्ञापन महिलाओं का अपमान नहीं है? क्‍या गोरा रंग जिंदगी के हर इम्‍तहान के लिए जरूरी है?

क्या सांवाले रंग वाली लड़की की शादीया  नहीं होती  ?
क्या सांवाले रंग वाली लड़की  रंग को लेके अव्शाद में रहती है ?
आजकल तो इस गोरे रंग ने वापिस रंग भेद निति जेसी प्रथा को याद दिला दिया  

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

एक छलावा-सा

एक छलावा-सा
4 जुलाई 1942 को जन्मे कन्हैयालाल भाटी की अनुवादक के रूप में विशेष ख्याति रही है, मगर उनकी कहानियां भी कथ्य व शिल्प की दृष्टि से अनूठी हैं. साहित्य अकादमी व गुजरात सरकार से अनुवाद के लिए पुरस्कृत भाटी की एक राजस्थानी कहानी हमलोग के पाठकों के लिए...

जोधपुर स्टेशन पर एक-दूसरे को आमने-सामने देख कर अचरज में दोनों बोल उठे तुम? जेठ की तपती दोपहर का वक्त था। सपना को मुंबई जाना था, जबकि त्रिलोक हावड़ा से आई गाड़ी से उतरा था। स्टेशन पर भीड़ के बीच दोनों सुध -बुध खोकर खड़े थे। आसपास शोर-शराबे से अनजान स्टेशन के बीचोबीच इस तरह खड़े रहने से आने-जाने वाले मुसाफिरों क ो दिक्कत हो रही थी, पर उनको सुनने का वक्त कहां था।

सपना की गाड़ी के रवानगी का वक्त हो चुका था। दोनों चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे। आखिर त्रिलोक सपना को हाथ पकड़कर उसे स्टेशन के बाहर एक रेस्टोरेंट में ले गया। चाय मंगवाई और दोनों चाय की चुस्कियां लेने लगे। त्रिलोक चाय की चुस्की लेते बोला, "तुम ठीक तो हो ना? मैं तो तुम्हें देखकर बावरा ही हो गया। कितना वक्त बीत गया उन बातों को, पर स्टेशन पर मुझे देखकर तुम गले आ पडी...।" "नहीं, नहीं, तुम गले पड़े हो मेरे।" सपना ने मुस्कराते हुए त्रिलोक को बीच में टोका, "लग तो ऎसे रहा है जैसे कल ही हम मिले हो, वैसे तो हमें मिले बहुत साल हो गए।"

"हां, लगभग पन्द्रह वर्ष हो गए होंगे।" सपना बोली।
"तुम्हें कितनी अच्छी तरह याद है-पन्द्रह वर्ष। एक युग बीत गया, है ना सपना?" त्रिलोक बोला, "तुमने विवाह कर लिया क्या? बाल बच्चे भी होंगे? आज यहां कैसे? कहां जा रही हो?" "थोड़ा धीरज रखो, जल्दबाजी मत करो, बारी-बारी से पूछो। तुम्हारी जल्दबाजी वाली आदत अभी तक पहले जैसी ही है। तुम्हें रतौंधी हुई है क्या? तुम्हारी आंखों के सामने बैठी हूं। तुम्हें मेरी गोद में दीख रहे है बच्चे। जो पूछ रहे हो, तुम्हारे बच्चे-बच्चे हैं क्या? बेतुकी बातें मत किया करो। तुम्हें पता होना चाहिए कि मैंने अभी तक विवाह नहीं किया है।

तुम तो जानते ही हो रोजमर्रा के काम में आदमी के सामने कितनी कठिनाईयां आती है। जीव एक और जंजाल बहुत। आदमी जीवन में आगे बढ़ना चाहता है, पर उसे वक्त कहां मिलता है? और वक्त भी कितना चंचल है, इधर-उधर देखते है तब तक कितना आगे निकल जाता है। जो वक्त की कीमत समझता है, वही दिनोंदिन आगे बढ़ सकता है। "खैर छोड़ो इस बात को। अब तू बता कि काम क्या करती है? मतलब ऎसा कौनसा काम है जिससे तुम्हें वक्त ही नहीं मिलता? त्रिलोक बड़ी उत्सुकता से उसे देख रहा था, पर सपना खिड़की से बाहर वृक्ष की डाली पर बैठे तोता- मैना के जोड़े को एकटक निहार रही थी।

"मैं यहां एक कॉलेज में व्याख्याता हूं। अब तुम खुद अंदाज लगा लो कि बड़े शहरों की दौड़-भाग की जिन्दगी में वक्त कैसे बीत जाता है।"
"क्या बात करती हो।" त्रिलोक उतावला सा बोला, "बधायजै।" सपना अब त्रिलोक को बड़े गौर से देख रही थी। उसका चेहरा लाल हो गया, बधाई की बात सुनकर।

"तुमने तो खूब तरक्की कर..." त्रिलोक बोला, "मैं तुम्हारी सारी बात समझ गया। पर अब बता कि तुम छुटि्टयां मनाने कहां जा रही हो?"
"मैं मुंबई जा रही हूं। मेरा वहां जाना बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि एक ही कॉलेज में पढ़ाते-पढ़ाते बोर हो गई हूं। त्रिलोक, तुम क्या कर रहे हो आजकल? मैंने तो बस सेहत सुधारने का ही काम किया है।" त्रिलोक मन ही मन सोच रहा था कि यदि इसे इतना आसान काम नहीं मिला होता तो ठीक रहता। फिर तो मैं उसे पूछ लेता कि तुम अभी भी मुझे चाहती हो क्या? पर अब, ना भई ना, अब यह बात पूछनी ठीक नहीं। यह मेरी बात को अभी हंसी में टाल देगी पर बाद मैं जरूर मखौल उड़ाएगी। सपना उसकी बात को अनसुना करती बोली, "तुम क्या काम कर रहे हो अभी?"

"मैँ", त्रिलोक धीरे से बोला, "अभी मेरे भाग भी जगे हुए हैं। मैं पहले जो काम करता था उसे छोड़ दिया है। अब मैं एक मिल में मैंनेजर हूं। मुझे यह काम करते लगभग चार साल हो गए।" सपना उसकी बात को ध्यान से सुन रही थी पर इसके साथ उसकी नजरें त्रिलोक की अंगुली में विवाह की अंगूठी ढंूढ रही थी। मगर उसकी अंगुली में अंगूठी नहीं थी। अब सपना का मन गुजरे वक्त की खिड़कियों में झांक रहा था। आज से पन्द्रह वर्ष पहले दोनों के बीच "ब्रेक-अप" हो गया था। एक छोटी-सी बात पर दोनों के मन में खटास आ गया और अचानक दोनों की प्रीत का हार टूट गया। उसके बाद दोनों अब तक मिल नहीं सके थे। वह उस वक्त मोटर मिस्त्री का काम सीख रहा था।

उसकी ओछी कमाई, कपड़ो में तेल की बदबू पर सपना खूब कटाक्ष करती कि जीवन में कुछ अच्छा काम कर के दिखा। पहले सफल आदमी तो बन, फिर मैं दूसरी बात पर विचार करूंगी। वो कितनी नादानी का वक्त था। बात खिंचती गई और दोनों उलझ पड़े। वैसे उन दोनों का झगड़ा करने का कोई मन नहीं था। पर इस झगड़े से आई खटास को वे मिठास में नहीं बदल सके और आपस में मिलने-जुलने के अभाव में कुछ नहीं कर पाए। इन हालातों में भी सपना सोचती रहती कि त्रिलोक कुछ बन कर दिखाए।

वह बोली, "वक्त ने हमारा साथ दिया और हम दोनों ने सफलता हासिल की। यह हमारे लिए खुशी की बात है।" यह कहने के साथ- साथ सपना मन में सोचती रही कि त्रिलोक की उम्र तो पक गई मगर अभी तक कितना खूबसूरत व आकर्षक लग रहा है। यह इतनी तरक्की नहीं करता तो ठीक रहता। तभी तो मैं उसे पूछ सकती कि हमारे बीच हुए झगड़े को तुम अभी तक भूले नहीं क्या? क्या तुम अब भी मुझे चाहते हो? पर अब किस मुंह से पूछूं। तभी त्रिलोक बोला, "अरे, मैं तो बिना मतलब तुम्हारा वक्त खराब कर रहा हूं। तुम्हारी सैर-सपाटे की छूियां शुरू हो गई है।" वह इसी तरह की बातें करता रहा, पर सपना के चेहरे के सामने देखने की हिम्मत नहीं कर सका। पता नहीं क्यों?" "नहीं रे, मैं तो तीन वाली गाड़ी से रवाना हो जाऊंगी और वैसे देखा जाए तो मैं ही तुम्हारा कीमती वक्त बरबाद कर रही हूं। तो ठीक है, तुम्हारा कोई जरूरी काम होगा या फिर किसी से मिलना-जुलना होगा।"

"तुम इस बात की चिंता मत करो। मुझे यहां से लेने गाड़ी आ जाएगी। मैं लम्बा सफर करता हूं तब गाड़ी घर पर ही छोड़कर आता हूं। आजकल टे्रफिक की हालत तो तुम्हे पता ही है। घर पहुंचे तब तक आदमी थक कर अधमरा हो जाता है। "तुम्हारा कहना सोलह आना सही है। मैं भी यही कहना चाहती हूं।" फिर सपना त्रिलोक की आंखों में झांक कर बोली, "तुमने विवाह कर लिया या फिर अंगूठी और घरवाली को घर छोड़कर मुसाफरी करके आए हो?" यह बात कहते ही दोनों जोर-जोर से हंसने लगे, तो रेस्टोरेंट के लोगों को बड़ा अटपटा लगा।

त्रिलोक बोला, "नहीं, मैंने अभी तक विवाह नहीं किया है। इसमें भी राज है, कोई अड़चन है। बात ऎसी है कि मैं जिसे चाहता हूं , वैसी तो मुझे संसार में ढूंढने पर भी मिली नहीं और जो मुझे चाहती है, वह मेरी तरफ झांकना नहीं चाहती। फिर इसके लिए समय भी तो चाहिए।" इतना कहने के बाद वह मन में सोच रहा था कि यदि मैं इसे कह दूं कि तुम्हें अभी तक भूल नहीं सका हूं और आज पन्द्रह वर्ष बीत गए हैं, पर कोई महिला मुझे नहीं डिगा सकी है। इसे ये सारी बातें कैसे कहूं? अब वक्त आगे निकल गया है। हां, अब बहुत देर हो गई है। यह मेरी बात की हंसी उडाएगी।

इसकी वह हंसी आज तक मेरे कानों में गूंज रही है। उधर सपना के मन में भी यही भाव उठ रहे थे। उसके मन में लोर उठ रहे थे कि मुझे त्रिलोक को कह देना चाहिए कि मैं आज तुम्हारे इशारे पर चलने को तैयार हूं। मेरे जीवन में जब कोई दूसरा आदमी आया, मैंने हमेशा उसकी तुलना त्रिलोक से करती रहती। मैंने यह पक्का इरादा कर रखा था कि जीवन साथी हो तो त्रिलोक सरीखा, पर मुझे इस जैसा कहीं नजर नहीं आया। पर अब उसे यह बात कहने का कुछ मतलब नहीं है। आज यह अच्छी इज्जतदार नौकरी कर रहा है। सब बातों से सुखी है। अब तो ये मेरी बातों का मखौल ही उडाएगा। भले ही मुंह से नहीं बोले, मगर मन में तो सोचेगा कि अब तुमसे क्या लेना-देना। छोड़ो इस बात को और भूल जाओ मुझे। अंत में दोनोे अलग-अलग शब्दों में एक ही बात सोचते रहे।

"अपना जीवन सफल हुआ। मान-सम्मान, धन-दौलत वगैरह जो हम चाहते थे वो मिल गया।" त्रिलोक सिगरेट के कश खींचता गया और ये बाते सोचता रहा। सपना धीरे-धीरे लस्सी के घूंट गले में उतारती रही। त्रिलोक बैठा बैठा सपना को देखता रहा कि उसे उसकी आंखों के पास हल्की सी सलवट दिखी, पर वह सलवट उसकी खूबसूरती में इजाफा ही कर रहा था। सपना की गाड़ी का वक्त होने वाला था। त्रिलोक सपना को साथ लेकर स्टेशन पहुंचा। दोनों एक-दूसरे के सामने नहीं देख रहे थे। थोड़ी देर वे दोनों बिना बोले खड़े रहे। केवल आने-जाने वाले यात्रियों को देखते रहे। कुछ समय बाद गाड़ी आ गई। सपना गाड़ी में बैठ गई, त्रिलोक ने उसका सामान सीट के नीचे रख दिया।

अभी तक दोनों नजरें नहीं मिला पा रहे थे। उनका बोलने का मन हुआ कि अब तो तुम मुंह से बोलो, सच कहो। पर त्रिलोक गाड़ी से उतर गया। सपना ने डब्बे में बैठे विदाई की धुन में हाथ हिलाया। जैसे ही गाड़ी स्टेशन से आगे निकली वह तुरंत दूसरे डिब्बे में जाकर बैठ गई । अब वह अखबार की ओट में मोरनी की तरह आंसू टपकाने लगी और मन में सोचा कि मैं कितनी मूर्ख हूं। जब मैं अपने भले की नहीं सोच सकी तो दूसरों के बारे में कैसे सोच सकती हूं? मैंने झूठ की ओट क्यों ली, मैं उसे सच बता देती तो क्या बिगड़ता बल्कि कुछ समाधान ही निकलता।

मैंने उसे साफ-साफ क्यों नहीं कहा कि मैं एक सेल्स गर्ल हूं। मेरी वही पुरानी नौकरी है, एक छोटी सी दुकान में, पर ये सारी बातें कैसे कहती? मेरे मन में डर बैठा हुआ है कि वह मेरी बातों को हंसी-मजाक में टाल देगा। अब तो वह बड़ा आदमी बन गया है। और नहीं तो कम से कम उसका पता तो लेना चाहिए था। ये मेरी कितनी नादानी है। इधर त्रिलोक स्टेशन से बाहर निकलकर बस-अaे की तरफ गया। बस की टिकट खिड़की के आगे कतार में खड़ा हो गया । मकानोें का काम चल रहा था। वहां पहुंच गया। अपना परिचय दिया, "मैं क्रेन का ड्राइवर हूं।"

"हूं.. कल कहा रह गए थे तुम?" खैर। सुपरवाइजर, इसे काम बता दो और सोने-उठने का कमरा दिखा दो। कल से काम पर लगना है।" त्रिलोक को सपना की याद सताने लगी। सपना की गाड़ी दौड़ती जा रही होगी।"

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

बदकिस्मती बिकती है, खरीदेंगे?

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वह उठा और एक छोटी कैंची ले आया। उसने कैंची से प्यूपा का छेद बड़ा कर दिया। तितली आराम से बाहर आ गई। आदमी उत्सुक उसे उड़ते देखने को बैठा रहा, लेकिन वह नहीं उड़ी। उंगली से उड़ाने की कोशिश पर वह बस हल्के से हिल डुलकर रह गई, उड़ नहीं पाई...

सीजेरियन प्रसव यानी बच्चे के लिए सुरक्षित। मां को भी प्रसव-वेदना से मुक्ति। यह भ्रम व्यापकता से फैलाया गया है। जनसाधारण को यही बताने के लिए आज की मीटिंग थी। एक छोटी फिल्म दिखाई गई। एक प्यूपा दिखा जिसमें अंदर से छेद कर तितली निकलने की कोशिश कर रही थी। पास बैठा एक आदमी गौर से तितली की यह चेष्टा देख रहा था। बार बार कोशिश के बावजूद भी तितली बाहर नहीं निकल पा रही थी। आदमी को दया आई। वह उठा और एक छोटी कैंची ले आया। उसने कैंची से प्यूपा का छेद बड़ा कर दिया। तितली आराम से बाहर आ गई। आदमी उत्सुक उसे उड़ते देखने को बैठा रहा, लेकिन वह नहीं उड़ी। उंगली से उड़ाने की कोशिश पर वह बस हल्के से हिलडुल कर रह गई, उड़ नहीं पाई।

तितली नहीं उड़ पाई, क्यों कि आदमी ने जो दया की थी वह प्रकृति-प्रतिकूल क्रिया थी। तितली को प्यूपा से निकल ने के लिए जो मशक्कत करनी पड़ती है वह प्रकृति नियत सप्रयोजन है। इस दौरान तितली को जो जोर लगाना पड़ता है उस से उसका रक्त बह कर उसके पंखों में आ जाता है जिससे बाहर आने के तुरंत बाद वह उड़ने में सक्षम हो जाती है। उसी तरह प्रसव के दौरान गर्भपथ से गुजरने की मषक्कत में शिशु के शरीर में प्रकृति नियत ऎसे परिवर्तन होते हैं जो उसे असुरक्षित परिवश से लड़ने की क्षमता देते हैं।

दबाव के कारण शिशु के शरीर में केटाकोलामिन नामक पदार्थ स्त्रावित होते हैं। इनसे लिवर में संग्रहित ग्लाईकोजन ग्लुकोस में बदल जाता है जो शीघ्र-ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करता है। शिशुु के फेंफड़ों में स्थित गर्भजल अवशोषित हो जाता है जिससे आक्सीजन एक्सचेंज सुगम हो जाता है। सीजेरियन प्रसव में यह सब नहीं होता अत: प्रसवोपरांत अगर कुछ गड़बड़ हुई तो शिशु उससे पार पाने में सक्षम नहीं होता। इसके अतिरिक्त सीजेरियन के तुरन्त बाद नाल बांध कर काटना भी प्रकृति विरूद्ध होता है। प्लेसेन्टा (आंवल) में स्थित रक्त नवजात के शरीर में नहीं पहुंचता।

सीजेरियन प्रसव। तुरन्त नाल बांध बच्चा बालचिकित्सक के हवाले। अस्पताल की नवजात सघन इकाई में देख रेख। बच्चा देखने में स्वस्थ। बड़ा हुआ। पढ़ने भेजा। सीखने में कमजोर, लनिंüग डिसेबिलिटी (ऑटिज्म) का षिकार। इसका कोई और कारण नहीं मिला। दूसरा बच्चा मंद बुद्धि। उसमें भी इसका और कोई कारण नहीं मिला। मां बाप का दुख सहज ही समझा जा सकता है। सीजेरियन प्रसव की बढ़ती दर के साथ इन विकालांगताओं की दर बढ़ती जा रही है। आधुनिक व्यवासायीकृत चिकित्सा में अकारण होते सीजेरियन प्रसवों की यही त्रासदी है। दुर्भाग्य यह कि त्रासदी, अनजाने में, लोग अच्छा खर्च कर मोल लेते हैं।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

एक मुलाकात के 80 बरस

20वीं सदी के दो महापुरूषों के मिलन की ऎतिहासिक घटना को स्विटजरलैंड निवासी दिसम्बर महीने में बड़े धूमधाम के साथ मना रहे हैं। यह वर्ष स्विटजरलैंड के एक छोटे से कस्बे के लिए गौरव का वर्ष है, जब 6 दिसम्बर 1931 को नाबेल विजेता महान साहित्यकार रोम्यां रोला और महात्मा गांधी की मुलाकात हुई थी। यहां उल्लेखनीय है कि रोमां रोलां महात्मा गांधी के सत्य ओर अहिंसा के दर्शन से इतने प्रभावित थे कि बिना उनसे मिले ही उनके बारे में एक किताब "महात्मा गांधी" लिख डाली थी जिसका प्रकाशन 1924 में हो गया था।

जब रोमां रोलां को इस बात का पता चला कि महात्मा गांधी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेन आ रहे हैं तो उन्होंने गांधी जी से मिलने की आतुरता जाहिर की । गांधी जी भी इतने प्रभावित थे कि उन्होंने उनसे मिलने का फैसला कर लिया। लेकिन जिस दिन गांधी जी उनके छोटे से कस्बेे के स्टेशन पर उतरे तो रोमां रोलां उनसे मिलने नहीं आए। एक क्षण को गांधी जी को आश्चर्य हुआ लेकिन बाद में पता चला कि रोमां रोला दमे के मरीज हेाने और भयंकर बारिश हो जाने के कारण, वे उन्हे स्टेशन पर मिलने नहीं आए। लेकिन इसके बाद वे 6 दिसम्बर से लेकर 11 दिसम्बर तक उनके अतिथि बन कर रहे।

जब तक गांधी जी उनके घर पर रहे उन दोनों के बीच विश्व की राजनीति से लेकर ईश्वर, सत्य और अहिंसा जैसे दार्शüनिक विषयों पर मात्र पांच दिनों में 15 घंटे की बातचीत हुईं रोम्या रोलां को गीता का श्लोक का पाठ सुनना अच्छा लगता था। रोला को संस्कृत के मंत्र के उच्चारण का संगीत तथा राम और शिव को लेकर उसकी व्याख्या अच्छी लगती थी। शॅाल लपेटे गांधी और लांग कोट में लदफदे रोला की तस्वीरो को वहां के तमाम अखबारों में इन दिनों ढ़ूंढ़ा जा रहा है।

रोमां रेालां की छोेटी बहन मेडेलिन रोलां ने, जो स्वयं एक लेखिका थी, लिखा था कि "जब तक गांधी जी रहे तब तक उनके कमरे की खिड़की के सामने एक युवा संगीतकार सांझ ढलते ही वायलिन बजाना शुरू कर देता। इसके साथ ही बायलिन बजाते हुए बच्चों की एक भीड़ जमा कर लेता। एक जापानी कलाकार गांधी जी से जुड़ी सभी घटनाओं के स्कैच बनाता रहता।

और गांधी जी स्वयं स्थानीय समाचार पत्र के संवाददाताओं से घिरे रहते।" गांधी जी की विदाई को लेकर स्वयं रोमंा रोलां ने पियानो बजा कर गांधी जी को सुनाया था। आश्चर्य की बात यह है कि आठ दशको के बाद भी वाउद कस्वे के निवासी इस ऎतिहासिक मिलन की याद करते हुए जश्न की तैयारियां अभी से करने लगे हैं। इस जश्न को 6 दिसम्बर से लगभग सप्ताह भर तक वहां के लोग मनाते रहेंगे।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

विविध

इस मेरे ब्लॉग पे  अनेक परकार की  घटनाओ  और  विचारओ  पैर में अपने व्न्ग्य  देता हु
धन्यवाद