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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

बेटी है गर्भ में, गिरायें क्या?

अँधेरे का जश्न मनाएँ क्या
उजालों में मिल जाएँ क्या

अनगिनत पेड़ कट रहे हैं
कहीं एक पौधा लगाएं क्या

आज बेचना है ज़मीर हमें
तो खादी खरीद लाएं क्या

बामुश्किल है पीने को पानी
धोएँ तो बताओ नहाएं क्या

बहु के गर्भ में बेटी है आई
पेट पर छुरी चलवायें क्या

बेबस हैं बिकती मजबूरियाँ
भूखे बदन ज़हर खाएं क्या

अंधा है क़ानून परख लिया
कोई तिजोरी लूट लाएं क्या

रोने को रो लिए बहुत हम
पल दो पल मुस्कराएं क्या

यारों ने दिल की लगी दी है
यारों से दिल लगाएं क्या

सायों का क़द नापेगा कौन
हम भी घट-बढ़ जाएँ क्या

चुप की बात समझ आलम
और हम हाल सुनाएँ क्या

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

मेरी बिटिया

उसके होने से ही
पावन है घर-आँगन,
उसकी चंचल चितवन
मोह लेती हम सबका मन,

वो रूठती
तो रुक जाते हैं
घर के काम सभी,
वो हँसती

तो झर उठते हैं
हरसिंगार के फूल,
महक उठता है
घर का कोना-कोना,
जाने कैसे हैं वे लोग
जो बेटियों को
जन्मने ही नहीं देते
हम तो सह नहीं सकते
अपनी बेटी का
एक पल भी घर में न होना .

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

लड़की, बाहर आओ तोड़ के सिमटते हुये दायरे को छत के कोने पर खड़े हो फैलाओ

लड़की,
बाहर आओ
तोड़ के सिमटते हुये दायरे को
छत के कोने पर खड़े हो फैलाओ बाहों को
महसूस करो हवा में तैरने के लिये
तुम कभी लगा सकती हो छलाँग
अनंत में तोड़ते हुये सारे बंधनों को

हथेलियों में,
क़ैद करो हवा में घुली हुई नमी को
और मुरझाते हुये सपनों को ताज़ा दम कर लो
या गूँथो कोई नया संकल्प

सुनो
हवा में गूँजते हुये संगीत को
और चुरा कर रखो किसी टुकड़े को अपने अंदर
वहीं, जहाँ तुम रखती हो अपनी सिसकियाँ सहेज कर
और छाने दो संगीत का खु़मार सिसकियों पर

देखो ठहरे हुये
पराग कणों को तुम्हारी चेहरे पर
और पनाह दो आँखों के नीचे बन आये काले दायरो में/
या बुनी जा रही झुर्रीयों में
और फूलने दो नव-पल्लव विषाद रेखाओं के बीच

महसूस करो,
हवा में पल रही आग को
और उतार लो तपन को अपने सीने में
जहाँ रह-रह कर उमड़ते हैं ज्वार
और लौट आते हैं अलकों की सीमा से टकराकर

लड़की,
बाहर आओ, उठ खड़ी होओ
दीवार के बाद पीछे कोई जगह नहीं होती
और यदि कोने में हो तो कुछ और नहीं हो सकता
कब तक घुटनों पर रख सकोगी सिर/
आँसुओं का सैलाब बहाओगी/
अँधेरे में सिमटती रोशनी सी
कब तक लड़ सकोगी अकेली फड़फ़डाते हुये

लड़की,
बाहर आ

सोमवार, 10 जनवरी 2011

मैं एक बहन एक बेटी एक औरत हूँ

मैं
एक बहन
एक बेटी
एक औरत हूँ
एक औरत जो न जाने कब से नंगे पाँव
रेगिस्तान की धदकती बालू मैं भागती रही है !
मैं सुदूर उत्तर के गाँव से आई हूँ
एक औरत जो न जाने कब से के धान खेतों मे,
और चाय के बागानों मे, अपनी ताकत से ज़यादा मेहनत करती आई है !
मैं पूरब के अँधेरे खंडहरों से आई हूँ
जंहा मैंने न जाने कब से नंगे पांव सुबह से शाम तक,
अपनी मरियल गाय के साथ, खलियानों मे दर्द का बोझ उठाया है
मैं एक औरत हूँ,
उन बंजारों मे से जो तमाम दुनिया मे भटकते फिरते हैं
एक औरत जो पहाड़ों की गोद मे बच्चे जनती है जिसकी
बकरी मैदानों मे कंही मर जाती है और वो बैन करती रह जाती हे
मैं एक मजदूर औरत हूँ
जो अपने हाथों से फेक्टरी में
देवकाय मशीनों के चक्के घुमती है
वो मशीने जो उसकी ताकत को
ऐन उसकी आँखों के सामने
हर दिन नोचा करती है
एक औरत जिसके खून से खूंखार कंकालों की प्यास बुझती है
एक औरत जिसका खून बहने से सरमायेदार का मुनाफा बढता है
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली मे,
एक शब्द भी ऐसा नहीं जो उसके महत्त्व को बयां कर सके
तुम्हारी शब्दावली केवल उस औरत की बात करती है
जिसके हाथ साफ हैं
जिसका शरीर नर्म है
जिसकी त्वचा मुलायम है
और जिसके बाल खुशबूदार हैं
मैं तो वो औरत हूँ
जिसके हाथों को दर्द की पैनी छुरियों ने घायल कर दिया
एक औरत जिसका बदन तुम्हारे अंतहीन
शर्मनाक और कमरतोड़ काम से टूट चुका है
एक औरत जिसकी खाल मे
रेगिस्तानो की झलक दिखाई देती है
जिसके बालों से फेक्टरी के धुंए की बदबू आती है !
मैं एक आज़ाद औरत हूँ
जो अपने कामरेड भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
मैदान पार करती है
एक औरत जिसने मजदूर के मजबूत हाथों की रचना की है
और किसान की बलवान भुजाओं की
मैं खुद भी एक मजदूर हूँ
मैं खुद भी एक किसान हूँ मेरा पूरा जिस्म दर्द की तस्वीर है
मेरी रग - रग में नफ़रत की आग भरी है
और तुम कितनी बेशर्मी से कहते हो
की मेरी भूक एक भ्रम है
और मेरा नंगापन एक ख्वाब
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली में एक शब्द भी ऐसा नहीं
जो उसके महत्त्व को बयान कर सके
एक औरत जिसके सीने में
गुस्से से फफकते नासूरों से भरा एक दिल छिपा है
एक औरत जिसकी आँखों में आज़ादी की आग के लाल साये लहरा रहे हैं
एक औरत जिसके हाथ काम करते करते सीख गये हैं कि
अपने हक के लिए झंडा कैसे उठाया जाता है

मैं एक बहन एक बेटी एक औरत हूँ

मैं
एक बहन
एक बेटी
एक औरत हूँ
एक औरत जो न जाने कब से नंगे पाँव
रेगिस्तान की धदकती बालू मैं भागती रही है !
मैं सुदूर उत्तर के गाँव से आई हूँ
एक औरत जो न जाने कब से के धान खेतों मे,
और चाय के बागानों मे, अपनी ताकत से ज़यादा मेहनत करती आई है !
मैं पूरब के अँधेरे खंडहरों से आई हूँ
जंहा मैंने न जाने कब से नंगे पांव सुबह से शाम तक,
अपनी मरियल गाय के साथ, खलियानों मे दर्द का बोझ उठाया है
मैं एक औरत हूँ,
उन बंजारों मे से जो तमाम दुनिया मे भटकते फिरते हैं
एक औरत जो पहाड़ों की गोद मे बच्चे जनती है जिसकी
बकरी मैदानों मे कंही मर जाती है और वो बैन करती रह जाती हे
मैं एक मजदूर औरत हूँ
जो अपने हाथों से फेक्टरी में
देवकाय मशीनों के चक्के घुमती है
वो मशीने जो उसकी ताकत को
ऐन उसकी आँखों के सामने
हर दिन नोचा करती है
एक औरत जिसके खून से खूंखार कंकालों की प्यास बुझती है
एक औरत जिसका खून बहने से सरमायेदार का मुनाफा बढता है
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली मे,
एक शब्द भी ऐसा नहीं जो उसके महत्त्व को बयां कर सके
तुम्हारी शब्दावली केवल उस औरत की बात करती है
जिसके हाथ साफ हैं
जिसका शरीर नर्म है
जिसकी त्वचा मुलायम है
और जिसके बाल खुशबूदार हैं
मैं तो वो औरत हूँ
जिसके हाथों को दर्द की पैनी छुरियों ने घायल कर दिया
एक औरत जिसका बदन तुम्हारे अंतहीन
शर्मनाक और कमरतोड़ काम से टूट चुका है
एक औरत जिसकी खाल मे
रेगिस्तानो की झलक दिखाई देती है
जिसके बालों से फेक्टरी के धुंए की बदबू आती है !
मैं एक आज़ाद औरत हूँ
जो अपने कामरेड भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
मैदान पार करती है
एक औरत जिसने मजदूर के मजबूत हाथों की रचना की है
और किसान की बलवान भुजाओं की
मैं खुद भी एक मजदूर हूँ
मैं खुद भी एक किसान हूँ मेरा पूरा जिस्म दर्द की तस्वीर है
मेरी रग - रग में नफ़रत की आग भरी है
और तुम कितनी बेशर्मी से कहते हो
की मेरी भूक एक भ्रम है
और मेरा नंगापन एक ख्वाब
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली में एक शब्द भी ऐसा नहीं
जो उसके महत्त्व को बयान कर सके
एक औरत जिसके सीने में
गुस्से से फफकते नासूरों से भरा एक दिल छिपा है
एक औरत जिसकी आँखों में आज़ादी की आग के लाल साये लहरा रहे हैं
एक औरत जिसके हाथ काम करते करते सीख गये हैं कि
अपने हक के लिए झंडा कैसे उठाया जाता है

रविवार, 28 नवंबर 2010

मेरी बिटिया

झुकी नहीं वह  तनी हुई है.
किस मिटटी की बनी हुई है.
अपने हक़ को पहचाना है.
देश स्वतंत्र है, यह जाना है.
आजादी बच जाये अपनी,
लोकतंत्र ना हो बर्बाद.
इरोम शर्मिला जिंदाबाद 

 पुलिस के सीमित हो अधिकार.
करती हरदम अत्याचार.
जहां कहीं यह मंज़र है,
लोग कर रहे हाहाकार.
इसीलिए इक औरत निकली, 

लोकतंत्र करने आबाद.
इरोम शर्मिला जिंदाबाद .

 बंदूको का राज ख़त्म हो.
अभी ख़त्म हो, आज ख़त्म हो.
शत्रु नहीं, तुम मित्र बनाओ,
वर्दी का कुछ फ़र्ज़ निभाओ.
करे देश की जनता अपनी-
सरकारों से यह  फरियाद.
इरोम शर्मिला जिंदाबाद..

कैसा है यह अपना देश?
दुखी में डूबा है परिवेश.
मणिपुर में वर्दी का राज.
वहा कोढ़ में दिखता खाज. (यानी पुलिस का विशेषाधिकार)
रोजाना दहशत में रहती, 
सीधीसादी आदमजात.
अत्याचारी  मुर्दाबाद .
इरोम शर्मिला जिंदाबाद 

जागे-जागे पूरा देश.
यही शर्मिला का सन्देश.
लोकतंत्र को याद रखो,
मधुर यहाँ संवाद रखो.

जन-गण-मन खुशहाल रहे,
प्रेम-अहिंसा हो आबाद.
अत्याचारी  मुर्दाबाद . 
इरोम शर्मिला जिंदाबाद ....

मेरी बिटिया

बेटी का एक पत्र अपनी मां के नाम

मेरी प्यारी मां,
मैं खुश हूं और भगवान से प्रार्थना करती हूं कि आप भी खुश होंगी,जब तुम कल ड़ाक्टर के यहां गई तो मुझे लगा जैसे मेरी खैरियत पता करने आई हो फिर तुम्हे मेरे लडकी होने का पता चला , लेकिन मैंने जो सनसनी खेज़ ख़बर सुनी है उससे मैं बैचेन हो गई हूं मुझे बहुत ड़र लग रहा है।मैने पापा को ड़ाक्टर से कहते सुना की वो मुझे इस दुनिया में ही नहीं आना देना चाहते हैं।यह सुनकर तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ मेरे हाथ पैर अभी तक कांप रहे हैं।भला मेरी प्यारी प्यारी कोमलहृदया मां ऐसा कैसे कर सकती है तुम ही बताओ क्या तुम ऐसाकर सकती हो।बस मेरी खातिर यह एक बार कह दो कि ये सब झूठ है सिर्फ एक बार कह दो ना मेरी प्यारी मां।जब तुम ड़ाक्टर के क्लीनिक की तरफ जा रही थी तो मैंने तुम्हारे आंचल को जोर से खीचने का भी प्रयास भी किया लेकिन मेरी हथेलिय़ां इतनी छोटी है कि तुम्हारा आंचल नहीं पकड़ सके।मेरी बांहे इतनी कमजोर हैं मैं इन्हें तुम्हारे गले ड़ालकर तुम्हारा रास्ता भी नहीं रोक सकती हूं।मेरी प्यारी मां तुम जो दवा मुझे मारने के लिए लेना चाहती हो बहुत ही घातक है उससे मेरे पूरे शरीर को बहुत कष्ट मिलेगा.ड़ाक्टर की कैंची मेरेपूसे शरीर को चीड़-फाड़ ड़ालेगी मेरे नाजूक हाथों औक कोमल पैरो को काट ड़ालेगी।आप कैसे यह दृश्य़ देख सकती हो मेरी प्यारी कोमलहृदया मां.मुझे इतने कष्ट में कैसे रहने दे सकती हो।.मैं ये पत्र तुम्हे इसलिए लिख रही हूं कि अभी मैं ठीक से बोल नहीं पा रहीं तुमसे तो अभी मुझे बोलना भी सीखना है,मेरी आवाज भी इतनी उंची नहीं है कि तुम्हें जोर जोर से चिल्ला कर मना करसकूं। मैं तुम्हारी कोख मैं खुद को सुरक्षित महसूस कर रही लेकिम अब मुझे यह ड़र सुकून से नहीं रहने दे रहा है।मेरी प्यारी मां में इस दुनिया में आना चाहती हूं मैं तुम्हारे आंगन में खेलना चाहती हूं. तुम ही बताओ जब मैं पूरे घर में अपने छोटेछोटे पैरों से छम छम करती शरारत करती तुम्हरी गोद में आउंगी तो क्या तुम्हारा मन मुझे गले से लगा कर चूमने का नहीं करेगामुझे तुम्हारी ममता भरी गोद मैं खेलना है मेरी प्यारी मां।....और हां सुनो तुम मुझे इस दुनिया में आने दो मै तुम पर बोझ नहीं बनूगीं, मेरी चिंता भी नहीं करनी पडेगी मैं .आपकी लाडली थोडे से ही कपडे से काम चला लेगी उतरन पहन कर ही अपने तन को ढक लूगीं मेरी प्यारी मां बस एक बार मुझे अपनी कोख से निकलकर इस दुनिया में आ जाने दो मेरी प्यारी मांमैं आपकी बेटी हूं मां क्या बेटा होता तो आप उसे पाल नहीं लेती पालती ना फिर मुझे क्यों नहीं आने दे रही हो,तुम मेरी चिंता मत करना ना ही मेरे लिए दहेज की मैं अपना खर्चा खुद उठा लूगीं खूब मन लगा पढ़ाई करूंगी और तुम्हारा नाम रोशन करूंगी.बड़ी होकर मैं खुद अपने पैरों पे खड़ी होकर दिखाउंगी.मेरी प्यारी मां मेरी भी ड़ोली सजेगी और हाथों में मेंहदी लगेगी फिर एक दिन आपके आंगन चिड़िया की तरह फुर्र होकर उड जाऊगीं क्या तुम खुद को एक बार मुझे दुल्हन बनते नहीं देखना चाहती हो....बस मेरी प्यारी मां मुझे एक बार जन्म देदो एक बार एस दुनिया में आ जाने दो एक बार मुझे फूल बनकर अपनी बगिया में खिल जाने दो मैं तुम्हारे लिए जीवन भर कृतज्ञ रहूंगी। तुम्हारी प्यारी बेटी

मेरी बिटिया

साथियों, यह आलोचना नहीं, हमारे चरित्र पर एक करारा तमाचा है। सुनील त्‍यागी ने एक ऐसे भिखारी के बारे में बात की जो भीख मांग कर बेटियों का विवाह करता है। मगर उस पर कोई चर्चा ही नहीं हो रही है।
उधर स्मित मिश्र के सवाल पर भी तर्क ही बदल दिये जा रहे हैं, मुददे फिसल रहे है। इस हालत पर देखिये तो कि हमारे दो साथियों ने क्‍या कमेंट किया है। इससे करारा व्‍यंग्‍य और क्‍या होगा हमारे तौर तरीकों पर।

Satpal Kaswan जो बात चर्चा करने वाली है उसे इग्नोर किया जा रहा है और फालतू बातो पे लिखा जा रहा है ........... वह रे बिटिया तू क्या भाग्य लेकर आई 

Rajnish Parihar समूह का नाम मेरी बिटिया से बदल कर 'मेरे विवाद' कर देना चाहिए..क्युम्नकी यहाँ बेटी पर लिखी कविता पर ४ कमेन्ट मिलते है,जबकि विवादों पर हज़ार कमेन्ट मिलते है...बिटिया पर कम और विवादों पर चर्चा ज्यादा होती है...

अब भी समय है हम अपने रवैये के प्रति गंभीर हो सकते हैं।

मेरी बिटिया

यह मेरी बिटिया समूह है और आप सभी इसके सम्मानित सदस्य हैं।
जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह महिलाओं को बराबरी के स्तर पर लाने का एक प्रयास है।
अतः आप कृपया इसके मर्म को स्वच्छ रखने में समूह की मदद करें। 
मसलन विवाद तो खडा करें, लेकिन उसके मूल में समस्या के समाधान की तो चिंता हो, मगर आरोप-प्रत्यारोप अथवा आस्था अथवा धर्म पर लांछन या परस्पर छींटाकशी ना हो।
बहस चाहे जितनी गर्म हो, स्वागत है। लेकिन उसमें आक्षेप नहीं चल सकते। 
पुरूष भी इसमें महिलाओं की सामाजिक, पारिवारिक और निजी बातों या भावनाओ को उठा सकते हैं, लेकिन मैं फिर कहूंगा कि वह आक्षेप के स्तर पर ना हो।
बस।
धन्यवाद।