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सोमवार, 2 जनवरी 2012

शर्म क्यों मगर हमें नहीं आती!

शर्म क्यों मगर हमें नहीं आती!

शर्म क्यों मगर हमें नहीं आती!

‘सच का सामना’ में एक प्रत्याशी राजीव खंडेलवाल के सामने हॉट सीट पर बैठा है। उससे सवाल पूछा जाता है- ‘क्या आपने विवाह से पहले अपनी प्रेमिका का अबॉर्शन कराया था?’ जवाब सुनने के लिए प्रत्याशी की मां भी सामने बैठी हैं। प्रत्याशी जवाब देता है-‘हां।’ कैमरा मां के चेहरे को फोकस में लेता है। राजीव प्रत्याशी की मां से पूछते हैं-‘जवाब सुन कर कैसा लगा?’ मां का जवाब है-‘यह सब तो आजकल चलता है।’ कल्पना कीजिये, यदि यही सवाल उस वृद्ध महिला की बेटी या बहू से पूछा होता तो भी क्या उनकी यही प्रतिक्रिया होती? शायद नहीं। यही हमारे समाज का असली सच है-लड़कियों के लिए और तथा लड़कों के लिए कुछ और। यानी लड़कों के सच लड़कियों के सच से नितांत अलग हैं। यूं भी निजी सच कोई बहुत ज्यादा अहमियत नहीं रखते। लेकिन जिस समाज में रह रहे लोगों के निजी सच इस तरह के हैं तो सोचिये उस समाज के अपने सच, सामूहिक सच किस तरह के होंगे? ‘सच का सामना’ ने और कुछ किया हो या न किया हो, लेकिन हमारे भीतर सोये हुए सत्यों को उद्घाटित करने के लिए हमें प्रेरित जरूर किया है। आज हम आपको रूबरू करवा रहे हैं, समाज के कुछ ऐसे सत्यों से, जिनसे हम वाकिफ तो हो सकते हैं, लेकिन हम इस बात पर सामूहिक रूप से शर्मिंदा कतई नहीं दिखाई पड़ते। और ये ऐसे सच हैं, जो किसी भी समाज की प्रगतिशीलता, समानता और उदारता पर बड़ा सवालिया निशान लगा देते हैं?
कुंआरेपन की परीक्षा
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में पिछले दिनों एक बेहद शर्मनाक कांड सामने आया। पता चला कि मध्य प्रदेश में सामूहिक विवाह का एक आयोजन किया जाना है। इसमें बड़ी संख्या में दलित और आदिवासी महिलाओं ने शिरकत की। विवाह के लिए जो महिलाएं आई थीं, उनका सामूहिक स्तर पर कौमार्य परीक्षण किया गया यानी उनके कुंआरेपन की परीक्षा ली गई। बाद में इस कांड पर लीपापोती की गयी। सवाल यह उठता है कि क्या हम अभी भी आदिम युग में जी रहे हैं? कौमार्य परीक्षण जैसी चीजें क्या आज के इस आधुनिक युग को बर्बर युग साबित नहीं करतीं? और क्या कौमार्य परीक्षण पुरुषों का नहीं होना चाहिए था? इस कौमार्य परीक्षण ने भारतीय समाज की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की स्त्री जाति को अपमानित किया। और इस परीक्षण ने एक और बात यह साबित की कि जब कौमार्य परीक्षण सामूहिक स्तर पर हो सकता है तो निजी स्तर पर पुरुष न जाने कितनी लड़कियों का कौमार्य परीक्षण क

सोमवार, 7 मार्च 2011

बेटी हूं मैं, कोई पाप नहीं


http://vangaydinesh.blogspot.com/बेटी हूं मैं, कोई पाप नहीं

भारत में लगातार बढ़ती जनसंख्या एक चिंता का विषय बनी हुई है विश्व में चीन के बाद भारत दूसरा सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है जहां एक ओर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन का दवाब विकास की गति को बाधित कर रहा है वहीं दूसरी ओर भू्रण हत्या के कारण घटता लिंगानुपात समाज के संतुलन को बिगाड़ रहा है। भारत में कन्या भ्रूण हत्या का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।सरकारी स्तर पर किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद इसमें कमी नहीं आ रही है।
girl child 395x300 बेटी हूं मैं, कोई पाप नहींआजादी से पहले लड़किया मात पिता पर बोझ समझी जाती थी और पैदा होने के बाद ही उन्हे मार दिया जाता था लेकिन विज्ञान के बढते दायरे ने भ्रण हत्या को बढ़ावा दिया है भारत विश्व में के उन देशों में शामिल है जहां पर लिंगानुपात में भारी अंतर है लिंगानुपात से मतलब होता है प्रति हजार पुरूषों में महिलाओं की संख्या 1901 में भारत लिंगानुपात 972 जो कि गिरते गिरते 1991 में 927 हो गया1991 2001 में यह अनुपात 933 हुआ 2001 की जनगणना में लिंगानुपात की स्थिति ने इस बात पर बल दिया कि भारत में लिंग विरोधीसमाजिक व्यवस्था में परिवर्तन आ रहा है लेकिन इसी जनगणना में जब हम 0-6 वर्ष आयु के लिंग अनुपात में नज़र डालें तो सारी आशाएं चकनाचूर हो जाती है इस वर्ग में लिंगानुपात औऱ भी कम हो गया था जिससे इस बात का पता चलता है कि देश में लिंग भेद व्यवस्था कमजोर होने बजाये और फिर मुखर हो रही हैएक सर्वे के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष पांच लाख कन्या भू्रण हत्या होती है तथा पिछले दो दशक में एक करोड़ लड़कियां कम हो गई हैं।आलम यह कि लिंगानुपात का यह सामाजिक दुष्परिणाम पंजाब औऱ हरिय़ाणा जैसे राज्यों में सबसे अधिक है जहां युवकों का विवाह कठिन होता जा रहा है तो दूसरी तरफ पर्वी बिहारऔर पूर्वी उत्तर प्रदेश में लड़कियों के लिए भारी रकम खर्च कर उन्हे खरीदा तक जा रहा है खरीद कर लाई गई दुल्हनो को समाज औऱ परिवार दोनों जगहों पर ही सम्मान नहीं मिल पाता है यूनीसेफ के 2007के आंकड़ो पर यकीन करें तो लड़कियों की स्थिति को लेकर भारत का स्थान पाकिस्तान और नाइजीरिया से भी नीचे है।यूनीसेफ की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोजाना 7000 लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है।देश में लिंग जांच औऱ कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ा व्यवसाय बनकर उभरा है।विश्व की बेहतरीन तकनीकों का निर्माण करने वाली कंपनियों के लिए भारत अलट्रासाउंड़ मशीनों के व्यापार का एक बड़ा स्त्रोत बनकर उभरा है ।एक अनुमान है कि हर साल देश 300करोड से भी ज्यादा की मशीनें बाजार में बेज दी जाती हैं इन आधुनिक तकनीकों के चलते यह सुलभ हो गया है। आसानी इस बात का पता लगाया जा सकता है कि गर्भ में पल बच्चा लडका है या लडकी मध्य प्रदेश में सबसे कम लिंगानुपात वालें जिले मुरैना मे तो हर गली में इस मशीने आपको देखने में मिल जायेगी कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़ों को देखे तो यह प्रवृत्ति गरीब परिवारों के बजाए संपन्न घरों में अधिक है। महिलाएं चाहे जितनी भी शिक्षित हो जायें लेकिन परिवारिक दबाब और भावनाओं के चलते लडके औऱ लड़कियों में से उनकी पहली पसंद लड़के ही होते हैं इसके पीछे सबसे बड़ा कारण समाज में बेटे की मां होना अपनेआप में गर्व का विषय होता है जहां बेटी पैदा होने पर दिन रात के ताने सुनने पड़ते है बहीं बेटे होने पर बहूओं को सर आंखों पर बिटाया जाता है।साथ ही साथ भारतीयों के भीतर बैठी एक विकृति भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसका सीधा तालुक्क मोक्ष प्राप्ति माना जाता है भारतीय रीति अनुसार ऐसा माना जाता है कि बेटा ही कुल को स्वर्ग का रास्ता दिखाताहै।
दो बच्चों की अनिवार्यता और कन्या भ्रूण हत्या
परिवार का आकर सीमित करने और छोटे परिवार की धारणा को प्रबल करने के उद्देश से सरकार द्वारा दो बच्चों के सिद्धात को लागू किया सबसे पहले यह राजस्थान में 1992 में फिर हरिय़ाणा 1993 उसके बाद मध्य प्रदेश 2000 (जिसे वापस लिया गया था और अभी इसके बारे में मुझे पता नही है कि स्थिति क्या है),उड़ीसा 1993 आदि में लागू किया गया इस नियम के चलते दो अधिक संतानों वाले माता-पिता चुनाव में उम्मीदवारी और पंचायत राज संस्थाओं की स्वायत्त शासन की आधारभूत इकाईयों यथा पंचायती राज संस्थान और स्थानीय नगरीय निकायों में किसी भी पद के लिए अयोयग्य करार दिया है( राजस्थाम में लागू है) इन राज्यों में इस फैसले ने भी कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपरोधों को प्रोसाहित ही किया हैएक सर्वे के अनुसार इन सिंद्धात की बजह से समाज में महिलाओं की स्थिति पहले से ज्यादा बदतर हुई है।इसमे जबरिया गर्भपात कन्या शिशुओं का परिस्याग लोगों राजनैतिक आकंक्षाओं की बलि चढती जा रही है। राजनैतिक महत्वकाक्षांओं की पूर्ति के लिए बालिकाओं के प्रति उपेक्षाभाव,पतियों द्वारा पत्नियों का परित्याग कलह और बेटे को ही पैदा करने का दबाब महिलाओं पर पड रहा है
निर्णय लेने की अधिकारी नहीं है महिलाएं
घर में खाना बनाने के लिए जहां84 प्रतिशत महिलाएं स्वयं निर्णय ले सकती है बहीं सामाजिक और रीतिगत मामलों में उन्हें निर्णय लेनेका अधिकार सिर्फ 40 प्रतिशत ही है।समाज में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा महिलाएं अपने पतियों की हिंसा की शिकरा होती है तो 49 प्रतिशत महिलाएं ही पुरूषों के मुकाबलें कार्यशीलहैं।समाजिक दबाब के चलते उनके कानों यह बात बार बार डाली जाती है कि बगैर बेटे को पैदा किये समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थान नहीं मिल सकता है।हमें मिलकर इस सामाजिक बुराई से लडना होगा समय के साथ साथ लडके औऱ लड़कियों के बीच के भेद को मिटाना होगा नहीं तो कहीं लड़किया सिर्फ वेश्यालयों मे ही ना पैदा होने लगे और हमारा संभ्रात समाज अपनी ही सोच के चलते सिमट कर ना रह जाये इन हालातो में एक बात जरूर हमें समझ लेनी चाहिए कि .यदि हम बेटियां नहीं चाहेगें तो हमे बहुए भी नसीब नहीं होगीं
“यहां आने से पहले बेटी पूछती है खुदा से
संसार तूने बनाया, या बनाया है इन्सां ने
मारे वो हमको जैसे, हम उनकी संतान नहीं
डर लग रहा है कभी वापस भेज न दे वो हमें यहां से
कहा फिर उस खुदा ने कि भूल गया है इन्सां
जहां बेटी नहीं है बता वो कौन सा है जहां
वक्त एक ऐसा आएगा, ‘औरत’ शब्द रह न जाएगा
फिर पूछूंगा इन्सां से, अब तू ‘बेटा’ लाएगा कहां से”
दिनेश पारीक


रविवार, 6 मार्च 2011

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक पहल


कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक पहल: आज इस कलयुग में कुछ लोग बेटी के जन्म को मुसीबत मानने लगे हैं और कन्या भू्रण हत्या का प्रचलन तेजी से बढ़ता चला जा रहा है। बेटी के पैदा होने पर घरों में मातम छा जाता है। सांझे चूल्हे और संयुक्त परिवार लगभग खत्म होते जा रहे हैं। हर एक रिश्ता सिर्फ और सिर्फ मतलब का रिश्ता बनता चला जा रहा है।
girl child enfanticide 300x232 कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक पहलवहीं आज कन्या भू्रण हत्या रोकने के लिये राम के इस देश भारत में एक जिला ऐसा भी है जिस में बसने वाले लोग खासकर युवा वर्ग आज जिस युग में जी रहे हैं, उसे रामराज कहना ही उचित होना। सोनभद्र जिले के राबर्टसगंज ब्लाक के छोटे-छोटे तीन गांव मझुवी, भवानीपुर और गइर्डगढ के 60 युवाओं ने एक मण्डली तैयार की है। मण्डली अपने गांव में होने वाली किसी धर्म और जाति की कन्या की शादी में टेंट, तम्बू से लेकर बर्तन भान्डे का काम खुद सभालती है।
इस समूह ने बड़े बड़े दानियों से दान लेकर नहीं बल्कि खुद अपने संसाधनों से शादी विवाह में काम आने वाले तमाम छोटे बडे़े साजो सामान जुटा लिये हैं। संगठन से जुड़े युवा लड़की के घर वालों को आर्थिक मदद देने के साथ-साथ मिनटों में हर सामान की व्यवस्था कर देते हैं।
इस युवा समूह के सदस्य शादी ब्याह के वक्त लड़के वालों की आव भगत और खाने पीने की व्यवस्था भी खुद ही देखते है। सन् 2002 में बने इन संगठन के द्वारा लाभान्वित कई ग्रमीणों का कहना है कि उन्हें बेटी की शादी में कोई भी परेशानी या भाग दौड़ नहीं करनी पड़ती।
यंू तो बेटी का विवाह एक सामाजिक परम्परा है लेकिन अगर ऐसी ही एक सोसायटी हम सब लोग भी मिलकर बना लें और आपस में एक दूसरे का हाथ बटाने लगें तो बेटियों की शादी हम लोग और अच्छे ढंग से कर सकते है। इन युवाओं की पहल और इन के इस जज्बे को पूरे देश को सलाम करना चाहिये और अपनाना चाहिये। आज इस दौर की जरूरत है इस अच्छी और आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ाने वाली इस परम्परा की।
क्यों आज हम अपनी सभ्यता अपने आदर्शों और अपनी अपनी उन मजहबी किताबों के उन रास्तांे से भटकने लगे है जो हमें इंसान बनाती हैं और अच्छे और सच्चे रास्तों पर चलना सिखाती है। इंसान से मोहब्बत करना सिखाती है। शायद पैसे का लालच, समाज में मान सम्मान पाने का जुनून, अपने बच्चों के लिये राजसी सुख सुविधाओं का ख्वाब या फिर आज हमारे समाज में विकराल रूप धारण कर चुके दहेज के दानव के कारण हम कन्याओं को जन्म दिलाने से डरने लगे हैं जो कन्या भू्रण हत्या का मुख्य कारण हैं।
आज हम इंसान बनना क्यों भूलते जा रहे है, यह हम सब को सोचने जरूरत है क्योंकि इत्तेफाक से हम सब इंसान हैं। बेटियों से घर आंगन में रौनक है। ममता, प्रेम, त्याग, रक्षा बन्धन और न जाने कितनी परम्परायें जीवित हैं। कन्या भ्रूण हत्या पाप ही नहीं, देश और समाज के लिये अभिशाप है।

मंगलवार, 1 मार्च 2011

क्या समाज में लड़की का जन्म लेना ही अपराध है? (विज्ञान कथा।)

क्या समाज में लड़की का जन्म लेना ही अपराध है? क्या लड़की पैदा होने के लिए सिर्फ स्त्री ही जिम्मेदार है? और क्या लड़की के जन्म को नियंत्रित किया जा सकता है? इन्हीं सवालों से जूझती एक सामाजिक विज्ञान कथा।
'निर्णय'
‘‘देखिए जरीना जी, आप एक बार फिर इस वैक्सीन (एक्स क्रोमोसोम डिजेनेरेटिंग फैक्टर आफ ह्यूमन) के बारे में सोचिए।’’ प्रभाकरन ने स्वयं पर गम्भीरता का नकाब डालते हुए कहा, ‘‘क्योंकि यह आपकी वर्षों की मेहनत और महती आकांक्षाओं का प्रश्न है। .......और फिर क्या जवाब देंगी आप अपनी उस बहन को, जिसे मरने के बाद भी शान्ति नहीं मिल सकी है। क्या आप यह चाहेंगी कि आपकी शेष बहनें भी....?’’

जरीना की वर्षों पुरानी दुखती रग पर हाथ रख दिया था प्रभाकरन ने। जरीना को लगा जैसे किसी ने गर्म लोहे की सलाख उसके दिल के आर-पार कर दी हो। पर बजाय घबराने के उसके शरीर में दृढ़ता आ गयी। उसका चेहरा चट्टान की तरह सख्त हो गया और आंखें इलेक्ट्रिक हीटर की दहक उठीं।

कांप सा गया प्रभाकरन। उसे अपनी गल्ती का एहसास हो आया। उसने सोचा कि अगर अब मैंने एक शब्द भी कहा, तो काम बनने की जगह बिगड़ ही जाएगा। अपने थुलथुल पेट के दाईं ओर सरक गयी टाई को ठीक करते हुए वह चुपचाप खड़ा हो गया और हिम्मत बटोर कर धीरे से बोला, ‘‘अच्छा, तो अब मुझे आज्ञा दीजिए। कल फिर मैं आपकी सेवा में उपस्थित होऊंगा। और आशा करता हूं कि तब तक आप वैक्सीन से सम्बंधित कोई ठोस निर्णय, जो व्यवहारिकता के धरातल पर खरा उतरता हो, ले चुकी होंगी।’’

कहने के साथ ही प्रभाकरन ने अभिवादन किया और नोटों से भरे ब्रीफकेस को वहीं पर छोड़कर कमरे से बाहर निकल गया। साथ ही छोड़ गया वह एक हाहाकारी तूफान, जिसमें से होकर जरीना को बाहर निकलना था और लेना था उसे एक ऐतिहासिक निर्णय, जो किसी महान क्रान्ति के संवहन का गौरव प्राप्त करने वाला था।

काफी देर तक जरीना उसी प्रकार बैठी रही। एकदम मूर्तिवत। यदि पलकों का उठना-गिरना बंद हो जाता, तो शायद यह पहचानना भी मुश्‍किल हो जाता कि वह किसी मूर्तिकार का परिश्रम है अथवा शुक्राणु और अण्डाणु के महामिलन का क्रान्तिकारी सुफल?

विचारों की सरिता में उठने वाले चक्रवातों ने कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि जरीना किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में स्वयं को अस्मर्थ महसूस करने लगी। बिच्छू के जहर से बचने के लिए उसने अन्जाने में ही सांप को भी उत्तेजित कर दिया था। और अब उन दोनों के बीच वह निरूपाय सी खड़ी थी। आखिर जाए तो किधर? बस यही एक प्रष्न था, जिसका हल उसे खोजना था।

मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी जरीना को अपने मां-बाप की पहली सन्तान होने का गौरव प्राप्त था। जरीना के जन्म से भले ही उसके मां-बाप के अरमान पूरे न हो पाए हों, पर उसकी नानी की खुशी का पारावार न रहा। उसकी छट्ठी के दिन ही उन्होंने अपनी लाखों की दौलत जरीना के नाम कर दी। उन्हें तो जैसे जरीना के जन्म का ही इन्तजार था। तभी तो अपनी जायदाद के बोझ से मुक्त होते ही उन्होंने इस दुनिया से अपना बोझ भी कम कर दिया। लेकिन जरीना पर इससे कोई विशेष फर्क न पड़ा, सिवाए इसके कि वह नानी की गोद में खेलने के सुख से महरूम रह गयी थी।

अपनी वंश परम्परा बनाए रखने और कम से कम एक पुत्र का पिता कहलाने की चाह में फंसे जरीना के पिता हाकिम प्रतिवर्ष एक सन्तान को दावत देते रहे। लेकिन आश्चर्य कि उनके घर जन्म लेने वाली प्रत्येक सन्तान लड़की ही होती। प्रकृति के इस क्रूरतम (?) मजाक को हाकिम सहन न कर सके और उनका स्वभाव दिन-प्रतिदिन चिड़चिड़ा होता चला गया।

इसके बावजूद उन्होंने आशा का दामन नहीं छोड़ा। यह सोचकर कि शायद अगली बार उनकी मुराद पूरी हो जाए। पीरों-फकीरों की दुआएं काम कर ही जाएं। सो वे दांव पर दांव लगाते गये। लेकिन परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात। और अन्त में एक दिन अपनी आठवीं पुत्री को जन्म देते समय जरीना की मां संसार को अलविदा कह गयीं।

मां की मौत का बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ा। घर की सारी व्यवस्थाएं चरमरा गयीं। हाकिम ने उन्हें संभालने का प्रयत्न किया और असफल होने पर अपनी मां की शरण में जा पहुंचे। दादी ने घर में आते ही मां की कमी पूरी कर दी। धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा। लेकिन लाख कोशिश के बावजूद भी वे सबसे छोटी लड़की को संभाल न पाईं। मां की कमी उसे बर्दाश्त नहीं हुयी और निमोनिया के बहाने वह इस संसार के कूच कर गयी।

नानी ने अपनी वसीयत में यह व्यवस्था कर दी थी कि जब तक जरीना बालिग नहीं हो जाती, उसके पिता को जरीना के खर्च के लिए पूरा पैसा मिलता रहेगा। इस व्यवस्था का सुफल यह निकला कि अपने पिता की कोई बहुत अच्छी आर्थिक स्थिति न होने के बावजूद जरीना का लालन-पालन राज परिवार में जन्मी राजकुमारियों की तरह से हुआ। भले ही उसकी छोटी बहनें पर्याप्त मात्रा में दूध तक न पा सकीं, पर उसे कभी किसी चीज की कमी न हुयी। जब भी उसके मुंह से जो भी निकला, वह तुरन्त हाजिर हो गया।

हाकिम एक फैक्ट्री में बाबू थे। निश्चित तनख्वाह थी। आय का कोई ऊपरी श्रोत था नहीं, इसलिए धीरे-धीरे तंगई ने अपन शिकंजा कसना शुरू कर दिया। बच्चों को पढ़ाना तो दूर उनको सही ढ़ंग से खाना मिलना भी दूभर हो गया। और कोई रास्ता न देखकर हाकिम ने जरीना का नाम बोर्डिंग स्कूल में लिखवा दिया, जिससे कम से कम वह तो ढ़ंग से पढ़-लिख जाए। वैसे भी जरीना को घर में विशेष सुविधाएं मिलने की वजह से उसे अपनी बहनों से अलग रहने की आदत सी पड़ गयी थी, इसलिए हास्टल में उसे कोई विषेश परेशानी नहीं हुयी। वहां के माहौल में उसने जल्दी ही अपने आप को ऐडजेस्ट कर लिया और अपना सारा ध्यान अपनी पढ़ाई पर केन्द्रित कर दिया।

स्कूल के बाद कालेज और कालेज के बाद यूनीवर्सिटी। हाईस्कूल से लेकर एम0एस0सी0 तक की उसने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। जीव विज्ञान में पी0एच0डी0 का भी इरादा था उसका, पर घर वाले उस पर शादी करने के लिए दबाव डालने लगे। चूंकि शुरू से ही उसे अपनी मर्जी के मुताबिक कार्य करने की आदत सी पड़ गयी थी, इसलिए उसे यह फैसला स्वीकार्य न हो सका। बात जब काफी आगे बढ़ने लगी, तो एक दिन उसने स्पष्ट षब्दों में कह ही दिया, ‘‘शादी करना कोई बच्चों का खेल तो नहीं कि जब मां-बाप ने चाहा, डोली पर लाद दिया। जब तक मैं पी0एच0डी0 न कर लूं, शादी करना तो दूर, उसके बारे में सोच भी नहीं सकती।’’

जरीना भले ही कुछ भी हो, पर थी तो वह हाकिम की बेटी ही। और हाकिम को अपनी बेटी से ऐसी उम्मीद कतई न थी। हाकिम को लगा, जैसे किसी ने सीने पर हथौड़ा चला दिया हो। पर वे कर भी क्या सकते थे? एक के लिए वे छः-छः को बैठा कर नहीं रख सकते? सामाजिक मर्यादाओं और अपनी परिस्थितियों के दबाव में उन्होंने फैसला कर लिया कि जरीना चाहे शादी करे या न करे, वे अपनी दूसरी लड़कियों को तो निपटा ही देंगे।

हालांकि हाकिम की आर्थिक स्थिति कोई बहुत अच्छी न थी और न ही उन्होंने कोई बहुत बड़ी सम्पत्ति संजो कर रखी थी। लेकिन फिर भी किसी तरह से उन्होंने अपनी कोशिशों को अन्जाम देना षुरू कर दिया। जैसा भी हाकिम से बन पड़ा, आश्चर्यजनक ढ़ंग से उन्होंने अपनी बेटियों की जिम्मेदारी का निर्वहन किया। तीसरे साल जरीना की पी0एच0डी0 पूरी होते-होते उन्होंने अपनी छठवीं बेटी की भी नैया पार लगा दी।

जेनेटिक इंजीनियरिंग में डाक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने के बाद जरीना को सुकून मिला। हालांकि इसके लिए उसे अपने कीमती चार वर्ष होम कर देने पड़े। फिर भी वह पारिवारिक टेंशन, सामाजिक दबाव और मन के अन्तर्द्वन्द्व को झेलकर विजय श्री का मुकुट धारण करने में कामयाब हो ही गयी।

अपनी उपलब्धियों का जखीरा एकत्रित करने के बाद जब जरीना अपने परिवार की स्थिति का जायजा लेने बैठी, तो उसका मन बड़ा खिन्न हुआ। मरजीना और तहमीना की तथाकथित रूप से उम्र ज्यादा हो जाने के कारण उनकी शादियां ऐसे व्यक्तियों से हुयी थीं, जोकि उम्र में उनसे पन्द्रह-पन्द्रह साल बड़े थे और सिर पर विधुर का ताज लगाए हुए थे।

सफीना ने तो प्रेम विवाह किया था, पर शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब उसका पति पिटाई न करता हो। कारण वही पुराना, दहेज और सिर्फ दहेज। सकीना और शबीना की शादियां ऐसे घरों में हुयी थीं, जहां साल के बारहों महीने फाकाजनी का आलम रहता था। उनके पति चार दिन काम करते, तो सात दिन आराम। जब भूखों मरने की नौबत आ जाती, तो वे अपना होश संभालते। हां, सबसे छोटी आमिना की शादी जरूर अच्छे घर में हुयी थी। पर फिर भी उसे वह सब कुछ नहीं मिल पाया था, जिसकी वह हकदार थी।

एक दिन जरीना दोपहर के समय अपने कमरे में बैठी हुयी अखबार पढ़ रही थी। तभी उसे लगा कि मरजीना घर में मौजूद है। वह अपने कमरे से निकल कर बैठक में पहुंची, तो देखा कि वास्तव में मरजीना अपनी तीन छोटी-छोटी लड़कियों के साथ वहां उपस्थित है। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसके साथ कोई बहुत बड़ी दुर्घटना हो चुकी है।

सलाम दुआ के बाद जैसे ही जरीना ने मरजीना के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा, वह फफक कर रो पडी, ‘‘मैं कहीं की नहीं रही आपा। उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया और दूसरी......’’ बाकी के शब्द उसकी सिसकियों के बीच ही कहीं गुम हो गये।

जरीना पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा। उसने कांपते स्वरों में पूछा, ‘‘लेकिन क्यों?’’

‘‘क्योंकि मैं, मैं उनके खानदान का वारिस, एक लड़का नहीं पैदा कर सकी। मेरी कोख इस लायक नहीं हो सकी कि.....।’’

‘‘लेकिन इसमें तुम्हारा क्या कुसूर? इसके लिए तो वो जिम्मेदार है।’’ जरीना लगभग चीखी, ‘‘मैं तुम्हारे साथ यह नाइन्साफी नहीं होने दूंगी। आज ही मैं....।’’

मरजीना ने उसकी बात बीच में ही काट दी, ‘‘नहीं आपा, अब मैं वहां नहीं जा सकती। मैं इस घर के किसी कोने में पड़ी रहूंगी, पर उस दोजख में कभी नहीं जाऊंगी।’’

‘‘... ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी।’’ जरीना ने भी अपने हथियार डाल दिये और अपने कमरे में लौट गयी।

काफी देर तक जरीना बैठी हुयी यह सोचती रही कि आखिर मरजीना लड़का पैदा नहीं कर सकती, तो इसमें उसका क्या दोष? सन्तान के लिंग निर्धारण की सारी जिम्मेदारी पुरूषों के शुक्राणुओं पर निर्भर करती है। यह बात तो आज सभी जानते हैं कि स्त्री में सिर्फ एक्स प्रकार के अण्डाणु (ओवा) पाए जाते हैं। लेकिन पुरूषों के शुक्राणु (स्पर्म) एक्स और वाई दो प्रकार के होते हैं।

गर्भाधान की क्रिया के दौरान जब पुरूष का एक्स शुक्राणु स्त्री के किसी अण्डाणु से निशेचन क्रिया करता है, तो लड़की पैदा होती है। लेकिन इस क्रिया में यदि वाई शुक्राणु कामयाबी का सेहरा पहनने में कामयाब हो जाए, तो पैदा होने वाली सन्तान लड़का होता है। चूंकि सामान्यतः पुरूष के एक्स शुक्राणु वाई की अपेक्षा कुछ हल्के होते हैं, इसलिए वे इस काम को सम्पन्न करने में कुछ ज्यादा सफल होते हैं। ....लेकिन रूढ़िवादिता से क्रस्त पुरूषों को यह बात समझाए तो कौन?

इस सवाल के जाल में जरीना कुछ ऐसी उलझी कि उसे शादी जैसे उपक्रम से ही घ्रणा हो गयी। उसने यह फैसला किया कि वह जीवन भर शादी नहीं करेगी। क्योंकि दलदल से बचने का सबसे अच्छा उपाय तो यही है कि उस ओर जाया ही न जाए।

हाकिम ने जब बेटी का फैसला सुना, तो अवाक रह गये। लेकिन अब उनमें इतनी हिम्मत न बची थी कि वे जरीना को समझाकर और तथाकथित रीतिरिवाजों का वास्ता देकर उसे शादी के लिए राजी करवा सकें। अतः इस समस्या के हल के लिए वे अपनी मां की शरण में पहुंचे। उन्हें उम्मीद थी कि शायद वे जरीना को उसके औरत होने का एहसास करा सकें और लाद सकें उस पर शादी का बोझ, जिसकी परम्परा सदियों से चली आ रही है।

लेकिन दादी भी जरीना के तर्कों के आगे टिक न सकीं। उसकी बातों को सुनकर वे एकदम सन्न रह गयीं। आजकल की लड़कियों की हिम्मत तो देखो, शादी से ही इनकार? ये कयामत के आसान नहीं तो और क्या है? लड़की का दिमाग फिर गया है। और दो उसे इतनी छूट? दिन भर घर के बाहर मंडराएगी, गैर मर्दों के साथ घूमती फिरेगी, तो और क्या होगा? अब तो इस घर की इज्जत को रब्बुलपाक ही बचाए!

बड़बड़ाते हुए दादी जैसे ही जीने से नीचे उतरने लगीं, हड़बड़ाहट में उनका पैर फिसल गया और वे धड़ाम के साथ नीचे आ गयीं। खण्डहर से जर्जर शरीर में इतनी ताब न बची थी कि वह सिर पर लगी मामूली से चोट को बर्दाश्त कर पाता। अतएव अत्यधिक खून बह जाने के नाम पर उनकी वहीं पर मौत हो गयी।

जरीना और हाकिम के बीच जो दूरी जरीना की नानी की जायदाद ने पैदा की थी, दादी की मौत ने उसे और बढ़ा दिया। हाकिम ने सीधे-सीधे जरीना को अपनी मां की मौत का जिम्मेदार मानते हुए उससे एक तरह से किनारा ही कर लिया। रहते तो वे एक छत के नीचे जरूर थे, पर बिलकुल अजनबी की तरह। न बाप को बेटी से कोई मतलब और न बेटी को बाप से कोई सरोकार।

धीरे-धीरे समय का पहिया एक वर्ष आगे खिसक गया। अचानक एक दिन सूचना मिली कि सफीना ने अपनी दो बेटियों के साथ आग लगाकर आत्महत्या कर ली है। सफीना उनकी सबसे लाडली बेटी थी। उन्हें पूरा विश्वास था कि वह ऐसा नहीं कर सकती। जरूर उसे उसकी ससुराल वालों ने जला दिया होगा। यही सोच-सोच कर वे एकदम विछिप्त हो गये।

अक्सर वे चीख पड़ते, ‘‘नहीं-नहीं, उन लोगों ने मेरी बेटी को जिंदा जला डाला। वह उनके लिए एक लड़का नहीं पैदा कर पाई न, इसलिए उन कमीनों ने मेरी बच्ची ...... सफीना को ...... जला दिया। खून कर दिया उन लोगों ने सफीना और उसकी मासूम बच्चियों का। वे खूनी हैं। मैं उन्हें जिन्दा नहीं छोडूंगा। एक-एक को फांसी दिलवाऊंगा।’’

जरीना को भी पूर विश्वास था कि सफीना और उसकी बेटियों की आग लगाकर हत्या की गयी है। उसने सफीना की ससुराल वालों के विस्द्ध अदालत में हत्या का मुकदमा दायर कर दिया। पानी की तरह पैसा बहा, अदालत के सैकड़ों चक्कर लगे, लेकिन इसके बावजूद जरीना ऐसा कोई सबूत न पेश कर सकी, जिससे साबित होता कि सफीना की ससुराल वालों ने उसकी व उसकी बेटियों की हत्या की है। और अन्ततः वही हुआ, जो होना था। सफीना की ससुराल के सभी लोग बाइज्जत बरी कर दिये गये।

इस अनचाहे दर्द से जरीना तड़प कर रह गयी। क्रोध आने लगा उसे अपनी विवशता पर। कितना सड़ गया है हमारा यह समाज, जहां कातिलों को सजा तक नहीं दिलाई जा सकती। वाकई कितना विकृत है इस दुनिया का यथार्थ?

इस सदमें ने जरीना को एकदम तोड़ दिया। खीझ कर उसने स्वयं को अपने आप में कैद कर लिया। न खाने की चिन्ता, न पीने से मतलब। रात-रात भर वह जागती रहती। जब कभी घड़ दो घड़ी के आंख लगती भी, तो उसे सपने में सफीना ही नजर आती। आग से घिरी सफीना, अपनी बच्चियों को गोद में चिपटाए, बेबस।

हमेशा की तरह आधी रात बीत जाने के बाद जब जरीना की आंखें लगीं, तो उस रोज भी सफीना वहां मौजूद थी। झुलसा हुआ चेहरा, एकदम काला, बेहद डरावना। जरीना स्तब्ध रह गयी। धीरे-धीरे चेहरे में हरकत हुयी। उसके होंठ कांपे, ‘‘जानती हो आपा, हमारा ये हाल क्यों किया गया?’’

एक क्षण के लिए जरीना जुर्म साबित हो चुके अपराधी की भांति शान्त रही। फिर धीरे-धीरे उसने अपनी शक्ति को एकत्रित किया और कांपते स्वरों में बोली, ‘‘जानती हूं, तुमसे अच्छी तरह से।’’

‘‘फिर आप कुछ करती क्यों नहीं?’’ सफीना का स्वर तेज हो गया, ‘‘इससे पहले कि यह घटना किसी और के साथ दोहरायी जाए, आपको कुछ करना ही होगा।’’

‘‘लेकिन क्या कर सकती हूं मैं ?’’

‘‘क्यों, आप तो पढ़ी-लिखी हैं। डाक्टरी पास की है आपने।’’

‘‘ ...............’’

‘‘क्या आप ऐसी कोई दवा नहीं बना सकतीं, जिससे लड़का पैदा किया जा सके ?’’

‘‘नहीं सफीना, ऐसा नहीं हो सकता। वो तो सब प्राकृतिक.........’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता आपा? क्यों नहीं? इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता? सिर्फ हौसला और लगन होनी चाहिए। .....और फिर आपको ऐसा करना ही होगा। अपनी दूसरी बहनों को दर्दनाक मौत से बचाने के लिए आपको ऐसी दवा बनानी ही हागी। नहीं तो आपकी सारी बहनें इसी तरह एक-एक करके मौत के घाट उतार दी जाएंगी और आप कुछ भी नहीं कर पाएंगी।’’

सफीना का स्वर गूंजता चला गया। और जब शोर हद से ज्यादा बढ़ गया, तो उसकी निद्रा भंग हो गयी। वह हड़बड़ा कर बिस्तर पर उठ बैठी। उसके बाद फिर उसे नींद नहीं आयी। सारी रात उसके कानों में सफीना की बातें गूंजती रहीं।

उस स्वप्न ने जरीना की सोच को एकदम बदल दिया। हमेशा गुमसुम सी रहने वाली जरीना के पास अब एक उद्देश्य था। उसे एक ऐसी दवा का निर्माण करना था, जो पुरूषों के वाई शुक्राणुओं को अधिक क्रियाशील बना सके। और अगर वह इस काम में सफल हो गयी, तो एक पुत्र के लिए अपने घरों में लड़कियों की लाइन लगा देने वाले और लड़का पैदा न होने की दषा में अपनी पत्नी के घर निकाला दे देने वाले लोग इस पाप से मुक्ति पा सकेंगे।

जेनेटिक इंजीनियरिंग में पी0एच0डी0 की डिग्री प्राप्त करने वाली जरीना ने अपना सारा ध्यान इसी पर केन्द्रित कर दिया। क्योंकि अगर इस दिशा में कुछ हो सकता था, तो उसकी सारी सम्भावनाएं जेनेटिक इंजीनियरिंग की रिकाम्बिनैन्ट पद्धति में ही निहित थीं।

लगातार दस वर्षों तक पुस्तकों और अपनी निजी प्रयोगशाला में सिर खपाने के बाद जरीना को मंजिल तक पहुंचने का सूत्र मिल ही गया। और वह सूत्र था लैम्डा फेज वाइरस। इस वाइरस की सहायता से जरीना ने एक्स क्रोमोसोम डिजेनेरेटिंग फैक्टर आफ ह्यूमन वैक्सीन तैयार की, जोकि एक प्रकार की क्लोन्ड जीन थी।

लेकिन जब इस वैक्सीन के परिणाम सामने आए, तो जरीना कांप उठी। जिस व्यक्ति के शरीर में यह वैक्सीन एक बार पहुंच जाती, उसके शरीर के समस्त एक्स प्रकार के शुक्राणुओं को नष्ट कर देती। इसके साथ ही साथ भविष्य में भी उस व्यक्ति के शरीर में बनने वाले एक्स शुक्राणु निश्क्रिय ही रहते। यानी कि जिस व्यक्ति ने एक बार इस वैक्सीन का प्रयोग कर लिया, तो फिर वह व्यक्ति जिंदगी भर किसी लड़की का पिता नहीं बन सकता था।

खन्दक से बचने के प्रयास में अन्जाने में ही खाई का निर्माण हो चुका था। यदि यह वैक्सीन बाजार में आ जाती, तो पुत्र-मोहान्ध पुरूषों की बदौलत बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ डालती। चूंकि समाज में लड़कियों का पैदा होना ही आमतौर पर एक बोझ मान लिया जाता है, इसलिए कोई भी पुरूष इससे दूर न रहना चाहता और परिणाम की चिन्ता किए बिना ही वैक्सीन का उपयोग कर डालता। ऐसी दशा में समाज की बनावट में भारी उलटफेर हो जाता और उसका सारा ढ़ाँचा ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता।

वैक्सीन के सहारे जन्मी लड़कों की खेप भले ही विशेष प्रभावों के कारण वर्णान्धता रोग से दूर रहती, पर जब वह अपनी युवावस्था में पहुंचती, तो उनके जीवन साथी की तलाष आकाश के तारे तोड़ लाने से भी दूभर प्रक्रिया बन जाती। ऐसी स्थिति में उन लोगों के घर जन्मी लड़कियां, जिन्होंने वैक्सीन का प्रयोग नहीं किया था या जिनके हिस्से नकली वैक्सीन आई थी, परमाणु बम से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जातीं। शायद लड़के वाले अपनी बहू लाने के लिए उल्टे लड़की वालों को दहेज देना प्रारम्भ कर देते। तब शायद लोग पांडव स्टाइल में पांच-पांच ही नहीं बीस-बीस या पचास-पचास मिलकर एक पत्नी रखते। स्थिति यहां तक बिगड़ती कि लड़कियों का व्यापार होने लगता और उनका घर से निकलना तक मुश्‍किल हो जाता।

...और तब ऐसी भयानक स्थिति में शायद किसी वैज्ञानिक को वाई0सी0डी0एफ0एच0 वैक्सीन का निर्माण करना पड़ता, जिसको प्रयोग कर पुरूष सिर्फ लड़कियों को जन्म देते। ऐसी दशा में समाज दो ध्वंसात्मक वर्गों में बंट जाता, जिसके शैतानी पंजों से निकल पाना बिलकुल असंभव सा हो जाता।

कट्टरता कभी भी किसी भी समाज के लिए कल्याणकारी नहीं हो सकती, चाहे वह विचारों की हो या फिर वैक्सीन की। लेकिन वैक्सीन तो बन चुकी थी। और न जाने कैसे यह खबर भारत के सबसे बड़े दवा निर्माता प्रभाकरन तक जा पहुंची। प्रभाकरन एक सफल व्यवसायी के साथ-साथ एक कुशल मनोविज्ञानी भी था। जरीना का पूरा इतिहास जानने के बाद वह उससे मिलने के लिए उसके घर जा पहुंचा। अपना परिचय देने के साथ प्रभाकरन ने जरीना के उन सभी मर्म स्थलों पर चोट पहुंचानी शुरू कर दी, जिनकी वजह से वह वैक्सीन निर्माण की ओर उन्मुख हुयी थी।

..और जब लोहा पूरी तरह से गर्म हो गया, तो उसने चोट करने में देर नहीं की। आकर्षक कमीशन के प्रस्ताव के साथ पेशगी के तौर पर सौ-सौ की नोटों से भरा 21 इंची सूटकेश जरीना की खिदमत में पेश किया गया।

प्रभाकरन को विश्वास था कि जरीना को तोहफे में पेश किया गया सूटकेश वैक्सीन के सूत्र को उस तक लाने में कामयाब हो जाएगा। वह वैक्सीन वास्तव में उसके लिए कुबेर के खजाने की चाबी साबित होने वाली थी। और एक बार जहां उसे वह चाबी मिल गयी, फिर उसे भारत का सबसे बड़ा अमीर बनने से कोई नहीं रोक सकता।

दूसरे दिन जब प्रभाकरन जरीना के घर पहुंचा, तो वह प्रतीक्षारत मिली। कुर्सी पर बैठते ही प्रभाकरन मुस्कराया, ‘‘मैं समझता हूं कि आपने वैक्सीन के सम्बंध में अपना निर्णय ले लिया होगा।’’

कहने के साथ ही उसने जरीना की ओर एक चेक बढ़ाया, ‘‘ये रहे मेरी तरफ से एडवांस, मात्र बीस लाख रूपयों का चेक। बाकी के अस्सी लाख आपको कांट्रैक्ट पर साइन करने के साथ ही दे दिए जाएंगे। इसके अलावा बिक्री प्रारम्भ होने पर प्राफिट पर पच्चीस प्रतिशत कमीशन आपको हर माह मिलता रहेगा।’’

जरीना चुपचाप बैठी रही। उसके भीतर अन्तर्द्धन्द्ध छिड़ा हुआ था। एक तरफ सफीना की दर्दनाक मौत, दस साल की कड़ी मेहनत, नोटों का अम्बार, और दूसरी तरफ इंसानियत और समाज। चुनना तो उसे एक ही था। उसके एक फैसले पर समाज की गति निर्भर करने वाली था। सिर्फ एक ‘हां’ से पूरे समाज का ढ़ांचा ही बदल जाता और छिड़ जातीी एक महान क्रान्ति, जो किन्ही अर्थों में द्वितीय विश्व युद्ध से भी भयानक होती।

जरीना की स्थिति सम्मोहित व्यक्ति की सी हो गयी थी। जैसे उसकी सोचने-समझने की शक्ति ही समाप्त हो गयी हो। बस जो सामने वाला चाहे, वह होता चला जाए। मौके की नजाकत के विशेषज्ञ प्रभाकरन ने एक पतली सी मुस्कान बिखेरते हुए कांट्रैक्ट फार्म आगे कर दिया, ‘‘लीजिए जरीना जी, प्लीज आप यहां पर साइन कर दीजिए।’’

बिना किसी प्रतिवाद के जरीना ने फार्म उठा लिया। प्रभाकरन का दिल खुशी के मारे बल्लियों उछलने लगा। उसे लगा कि अब दिल्ली दूर नहीं। अब उसके पास होगी अरबों की दौलत। और वह होगा हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा उद्योगपति।

पर तभी जरीना को अचानक न जाने क्या हुआ? देखते ही देखते उसने कान्ट्रैक्ट फार्म के चार टुकड़े कर दिए। उसका चेहरा चट्टान की तरह सख्त हो चुका था। इससे पहले कि प्रभाकरन कुछ समझ पाए, जरीना के होंठ हिले, ‘‘माफ कीजिएगा प्रभाकरन जी, चंद नोटों के लिए मैं अपने समाज की खुशियाँ नहीं बेंच सकती।’’ कहते हुए जरीना ने सूटकेश को मेज पर पटका और कमरे से बाहर निकल गयी।

सोमवार, 10 जनवरी 2011

मैं एक बहन एक बेटी एक औरत हूँ

मैं
एक बहन
एक बेटी
एक औरत हूँ
एक औरत जो न जाने कब से नंगे पाँव
रेगिस्तान की धदकती बालू मैं भागती रही है !
मैं सुदूर उत्तर के गाँव से आई हूँ
एक औरत जो न जाने कब से के धान खेतों मे,
और चाय के बागानों मे, अपनी ताकत से ज़यादा मेहनत करती आई है !
मैं पूरब के अँधेरे खंडहरों से आई हूँ
जंहा मैंने न जाने कब से नंगे पांव सुबह से शाम तक,
अपनी मरियल गाय के साथ, खलियानों मे दर्द का बोझ उठाया है
मैं एक औरत हूँ,
उन बंजारों मे से जो तमाम दुनिया मे भटकते फिरते हैं
एक औरत जो पहाड़ों की गोद मे बच्चे जनती है जिसकी
बकरी मैदानों मे कंही मर जाती है और वो बैन करती रह जाती हे
मैं एक मजदूर औरत हूँ
जो अपने हाथों से फेक्टरी में
देवकाय मशीनों के चक्के घुमती है
वो मशीने जो उसकी ताकत को
ऐन उसकी आँखों के सामने
हर दिन नोचा करती है
एक औरत जिसके खून से खूंखार कंकालों की प्यास बुझती है
एक औरत जिसका खून बहने से सरमायेदार का मुनाफा बढता है
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली मे,
एक शब्द भी ऐसा नहीं जो उसके महत्त्व को बयां कर सके
तुम्हारी शब्दावली केवल उस औरत की बात करती है
जिसके हाथ साफ हैं
जिसका शरीर नर्म है
जिसकी त्वचा मुलायम है
और जिसके बाल खुशबूदार हैं
मैं तो वो औरत हूँ
जिसके हाथों को दर्द की पैनी छुरियों ने घायल कर दिया
एक औरत जिसका बदन तुम्हारे अंतहीन
शर्मनाक और कमरतोड़ काम से टूट चुका है
एक औरत जिसकी खाल मे
रेगिस्तानो की झलक दिखाई देती है
जिसके बालों से फेक्टरी के धुंए की बदबू आती है !
मैं एक आज़ाद औरत हूँ
जो अपने कामरेड भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
मैदान पार करती है
एक औरत जिसने मजदूर के मजबूत हाथों की रचना की है
और किसान की बलवान भुजाओं की
मैं खुद भी एक मजदूर हूँ
मैं खुद भी एक किसान हूँ मेरा पूरा जिस्म दर्द की तस्वीर है
मेरी रग - रग में नफ़रत की आग भरी है
और तुम कितनी बेशर्मी से कहते हो
की मेरी भूक एक भ्रम है
और मेरा नंगापन एक ख्वाब
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली में एक शब्द भी ऐसा नहीं
जो उसके महत्त्व को बयान कर सके
एक औरत जिसके सीने में
गुस्से से फफकते नासूरों से भरा एक दिल छिपा है
एक औरत जिसकी आँखों में आज़ादी की आग के लाल साये लहरा रहे हैं
एक औरत जिसके हाथ काम करते करते सीख गये हैं कि
अपने हक के लिए झंडा कैसे उठाया जाता है

मैं एक बहन एक बेटी एक औरत हूँ

मैं
एक बहन
एक बेटी
एक औरत हूँ
एक औरत जो न जाने कब से नंगे पाँव
रेगिस्तान की धदकती बालू मैं भागती रही है !
मैं सुदूर उत्तर के गाँव से आई हूँ
एक औरत जो न जाने कब से के धान खेतों मे,
और चाय के बागानों मे, अपनी ताकत से ज़यादा मेहनत करती आई है !
मैं पूरब के अँधेरे खंडहरों से आई हूँ
जंहा मैंने न जाने कब से नंगे पांव सुबह से शाम तक,
अपनी मरियल गाय के साथ, खलियानों मे दर्द का बोझ उठाया है
मैं एक औरत हूँ,
उन बंजारों मे से जो तमाम दुनिया मे भटकते फिरते हैं
एक औरत जो पहाड़ों की गोद मे बच्चे जनती है जिसकी
बकरी मैदानों मे कंही मर जाती है और वो बैन करती रह जाती हे
मैं एक मजदूर औरत हूँ
जो अपने हाथों से फेक्टरी में
देवकाय मशीनों के चक्के घुमती है
वो मशीने जो उसकी ताकत को
ऐन उसकी आँखों के सामने
हर दिन नोचा करती है
एक औरत जिसके खून से खूंखार कंकालों की प्यास बुझती है
एक औरत जिसका खून बहने से सरमायेदार का मुनाफा बढता है
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली मे,
एक शब्द भी ऐसा नहीं जो उसके महत्त्व को बयां कर सके
तुम्हारी शब्दावली केवल उस औरत की बात करती है
जिसके हाथ साफ हैं
जिसका शरीर नर्म है
जिसकी त्वचा मुलायम है
और जिसके बाल खुशबूदार हैं
मैं तो वो औरत हूँ
जिसके हाथों को दर्द की पैनी छुरियों ने घायल कर दिया
एक औरत जिसका बदन तुम्हारे अंतहीन
शर्मनाक और कमरतोड़ काम से टूट चुका है
एक औरत जिसकी खाल मे
रेगिस्तानो की झलक दिखाई देती है
जिसके बालों से फेक्टरी के धुंए की बदबू आती है !
मैं एक आज़ाद औरत हूँ
जो अपने कामरेड भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
मैदान पार करती है
एक औरत जिसने मजदूर के मजबूत हाथों की रचना की है
और किसान की बलवान भुजाओं की
मैं खुद भी एक मजदूर हूँ
मैं खुद भी एक किसान हूँ मेरा पूरा जिस्म दर्द की तस्वीर है
मेरी रग - रग में नफ़रत की आग भरी है
और तुम कितनी बेशर्मी से कहते हो
की मेरी भूक एक भ्रम है
और मेरा नंगापन एक ख्वाब
एक औरत जिसके लिए तुम्हारी बेहूदा शब्दावली में एक शब्द भी ऐसा नहीं
जो उसके महत्त्व को बयान कर सके
एक औरत जिसके सीने में
गुस्से से फफकते नासूरों से भरा एक दिल छिपा है
एक औरत जिसकी आँखों में आज़ादी की आग के लाल साये लहरा रहे हैं
एक औरत जिसके हाथ काम करते करते सीख गये हैं कि
अपने हक के लिए झंडा कैसे उठाया जाता है

शनिवार, 8 जनवरी 2011

हर जनम में पाऊँ कन्या रूप

समुद्र के गर्भ में छिपे सीप की कोख में पलते मोती की नैसर्गिक चमक, बंद कोंपलों में खिलते फूल का मादक यौवन या फिर तपती धरती पर नीले नभ से गिरी बारिश की पहली बूँद की शीतलता ... ये सभी सृजन के रूप हैं ... प्रकृति ने यही वरदान स्त्री को भी दिया है। उसकी कोख से जन्मी बेटियाँ ही इस वरदान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं।

वह दौर बीत गया जब लड़कियों के जन्म पर शोक छा जाता था। आज तो बेटियाँ वो पावन दुआएँ हैं, जो हर क्षेत्र में अपनी सफलता के लिए आदर्श बन रही हैं। आज की नारी इन सभी पुराने अंधविश्वासों व रूढ़ियों पर विजय पाकर अपनी श्रेष्ठता का प्रतिपादन कर रही है। आज हर नारी को अपने कन्या रूप में जन्म लेने पर शर्म नहीं बल्कि गौरव महसूस होता है। हमने महिला सशक्तिकरण के इस दौर में कई महिलाओं से चर्चा की व जाना कि क्या वे अगले जन्म में फिर से लड़की के रूप में जन्म लेना चाहेंगी या नहीं?

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

मैं खुश हँूं और भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि आप भी सुखी रहें। यह पत्र मैं इसलिये लिख रही हँू क्योंकि मैने एक सनसनीखेज खबर सुनी है जिसे सुनकर सिर से पाँव तक काँप उठी।

स्नेहदात्री माँ! आपको मेरे कन्या होने का पता चल गया है और आप मुझ मासूम को जन्म लेने से से रोकने जा रही हैं। यह सुनकर मुझे तो यकी नही नहीं हुआ। भला मेरी प्यारीप्यारी कोमल ह्रदया मां ऐसा कैसे कर सकती है? कोख में पल रही अपनी लाडली के सुकुमार शरीर नश्तरों की चुभन एक मां कैेसे सह सकती है?

पुण्यशीला माँ! बस, आप एक बार कह दीजिये के यह जो कुछ मैने सुना है वह सब झूठ है। दरअसल यह सब सुनकर मै दहल सी गई हँूं। मेरे तो हाथ भी इतने कोमल है कि इनसे डाक्टर की क्लीनिक की तरफ जाते वक्त आपकी चुन्नी ज़ोर से नहीं खींच सकती ताकि आपको रोक लूँ। मेरी बांह भी इतनीपतली और कमजोर है कि इन्हें आपके गले में डालकर लिपट भी नहीं सकती।

मधुमय माँ! मुझे मारने के लिये आप जो दवा लेना चाहती हैं वह मेरे नन्हें से शरीर को बहुत कष्ट देंगी। स्नेहमयी माँ! उससे मुझे दर्द होगा। आप तो देख भी नहीं पायेंगी कि वह दवाई आपके पेट के अन्दर मुझे कितनी बेरहमी से मार डालेगी।
मैं खुश हँूं और भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि आप भी सुखी रहें। यह पत्र मैं इसलिये लिख रही हँू क्योंकि मैने एक सनसनीखेज खबर सुनी है जिसे सुनकर सिर से पाँव तक काँप उठी।

स्नेहदात्री माँ! आपको मेरे कन्या होने का पता चल गया है और आप मुझ मासूम को जन्म लेने से से रोकने जा रही हैं। यह सुनकर मुझे तो यकी नही नहीं हुआ। भला मेरी प्यारीप्यारी कोमल ह्रदया मां ऐसा कैसे कर सकती है? कोख में पल रही अपनी लाडली के सुकुमार शरीर नश्तरों की चुभन एक मां कैेसे सह सकती है?

पुण्यशीला माँ! बस, आप एक बार कह दीजिये के यह जो कुछ मैने सुना है वह सब झूठ है। दरअसल यह सब सुनकर मै दहल सी गई हँूं। मेरे तो हाथ भी इतने कोमल है कि इनसे डाक्टर की क्लीनिक की तरफ जाते वक्त आपकी चुन्नी ज़ोर से नहीं खींच सकती ताकि आपको रोक लूँ। मेरी बांह भी इतनीपतली और कमजोर है कि इन्हें आपके गले में डालकर लिपट भी नहीं सकती।

मधुमय माँ! मुझे मारने के लिये आप जो दवा लेना चाहती हैं वह मेरे नन्हें से शरीर को बहुत कष्ट देंगी। स्नेहमयी माँ! उससे मुझे दर्द होगा। आप तो देख भी नहीं पायेंगी कि वह दवाई आपके पेट के अन्दर मुझे कितनी बेरहमी से मार डालेगी।