शनिवार, 22 दिसंबर 2012

लकीरें और तक़दीरें


लकीरें और तक़दीरेंहाथ में कोई किताब लिए बैठा हूँ.पन्ने पलटते हुए उँगलियाँ कहीं थम जाती हैंऔर तब सबकी तरह वो पढने लग जाता हूं,जो किताब में लिखा ही नहीं.
किसी दिन हाथ की किताब में उलझा था.
लकीरें जाँचने व तक़दीरें बांचने की कोशिश कर रहा था.
शायद किसी कशिश या कशमकश में रहा होऊं .
किताब चार लकीरों से जीवन जगत का हाल बताती थी -
-जिंदगी की लकीर, जो हाथ में भी वक्त के साथ नीचे ढलती जाती है.
-दिल की लकीर, एक छोर से दिल से मिलने सी आती है, मगर बीच राह में मुड कर ऊपर चढ जाती है.
-दिमाग़ की लकीर, जो जिंदगी के साथ ही शुरू होती है, मगर जिंदगी और दिल के बीच लक्ष्मण रेखा की तरह बिछ जाती है.
-किस्मत की लकीर, जो वहाँ से शुरू होती है
जहाँ जिंदगी की लकीर खत्म होती है
मगर
दिमाग़ की लकीर को काटकर दिल को छूने की खातिर बढती जाती है.
अजीब है,
आदमी ने दिमाग़ के रास्ते तक़दीर को गढा है
और
तक़दीर है कि दिल के रास्ते गुजरना चाहती है.
सोचता हूं,
जब बचपन था, हाथ पर कितनी तस्वीरें बनाईं,
क्या उससे कोई तक़दीर बनी होगी.
युवा हुआ, तब नदी तट पर बैठ जाने कितने पत्थर उछाले
क्या उनसे घिसकर कोई लकीर मिटी होगी.
और
अब जब प्रौढ़पन में माथे पर लकीरें पडने

हाथों के खुले रहने का वक्त आया,
तब लकीरें जुटा-मिटा रहा हूं.
कहीं किसी घर के द्वार पर महावर लगे हाथों की छाप लगी है.
हाथों के शुभत्व को दीवार पर उकेरने की कोशिशकी गई है.
उस शुभत्व के पार कोई सुना सा स्वर गूँज रहा है -
"मेरे रब हर तदबीर कर देखा
मिट न सकी दूरी नजदीकियों की.
खेल खेल में उसने ही खींच दी थी,
कोई तिरछी सी गहरी लकीर कोई."
तब जाना,
सब ओर वही तस्वीरें है.
घर के बाहर खुली दीवारों पर हाथों में खिली लकीरें हैं
और
घर के भीतर घिसी लकीरों से बंदी हुई तक़दीरेंहै

लकीरें और तक़दीरें


लकीरें और तक़दीरें
हाथ में कोई किताब लिए बैठा हूँ.
पन्ने पलटते हुए उँगलियाँ कहीं थम जाती हैं
और तब सबकी तरह वो पढने लग जाता हूं,
जो किताब में लिखा ही नहीं.
किसी दिन हाथ की किताब में उलझा था.
लकीरें जाँचने व तक़दीरें बांचने की कोशिश कर रहा था.
शायद किसी कशिश या कशमकश में रहा होऊं .
किताब चार लकीरों से जीवन जगत का हाल बताती थी -
-जिंदगी की लकीर, जो हाथ में भी वक्त के साथ नीचे ढलती जाती है.
-दिल की लकीर, एक छोर से दिल से मिलने सी आती है, मगर बीच राह में मुड कर ऊपर चढ जाती है.
-दिमाग़ की लकीर, जो जिंदगी के साथ ही शुरू होती है, मगर जिंदगी और दिल के बीच लक्ष्मण रेखा की तरह बिछ जाती है.
-किस्मत की लकीर, जो वहाँ से शुरू होती है
जहाँ जिंदगी की लकीर खत्म होती है
मगर
दिमाग़ की लकीर को काटकर दिल को छूने की खातिर बढती जाती है.
अजीब है,
आदमी ने दिमाग़ के रास्ते तक़दीर को गढा है
और
तक़दीर है कि दिल के रास्ते गुजरना चाहती है.
सोचता हूं,
जब बचपन था, हाथ पर कितनी तस्वीरें बनाईं,
क्या उससे कोई तक़दीर बनी होगी.
युवा हुआ, तब नदी तट पर बैठ जाने कितने पत्थर उछाले
क्या उनसे घिसकर कोई लकीर मिटी होगी.
और
अब जब प्रौढ़पन में माथे पर लकीरें पडने

हाथों के खुले रहने का वक्त आया,
तब लकीरें जुटा-मिटा रहा हूं.
कहीं किसी घर के द्वार पर महावर लगे हाथों की छाप लगी है.
हाथों के शुभत्व को दीवार पर उकेरने की कोशिशकी गई है.
उस शुभत्व के पार कोई सुना सा स्वर गूँज रहा है -
"मेरे रब हर तदबीर कर देखा
मिट न सकी दूरी नजदीकियों की.
खेल खेल में उसने ही खींच दी थी,
कोई तिरछी सी गहरी लकीर कोई."
तब जाना,
सब ओर वही तस्वीरें है.
घर के बाहर खुली दीवारों पर हाथों में खिली लकीरें हैं
और
घर के भीतर घिसी लकीरों से बंदी हुई तक़दीरेंहै

लकीरें और तक़दीरें


लकीरें और तक़दीरें
हाथ में कोई किताब लिए बैठा हूँ.
पन्ने पलटते हुए उँगलियाँ कहीं थम जाती हैं
और तब सबकी तरह वो पढने लग जाता हूं,
जो किताब में लिखा ही नहीं.
किसी दिन हाथ की किताब में उलझा था.
लकीरें जाँचने व तक़दीरें बांचने की कोशिश कर रहा था.
शायद किसी कशिश या कशमकश में रहा होऊं .
किताब चार लकीरों से जीवन जगत का हाल बताती थी -
-जिंदगी की लकीर, जो हाथ में भी वक्त के साथ नीचे ढलती जाती है.
-दिल की लकीर, एक छोर से दिल से मिलने सी आती है, मगर बीच राह में मुड कर ऊपर चढ जाती है.
-दिमाग़ की लकीर, जो जिंदगी के साथ ही शुरू होती है, मगर जिंदगी और दिल के बीच लक्ष्मण रेखा की तरह बिछ जाती है.
-किस्मत की लकीर, जो वहाँ से शुरू होती है
जहाँ जिंदगी की लकीर खत्म होती है
मगर
दिमाग़ की लकीर को काटकर दिल को छूने की खातिर बढती जाती है.
अजीब है,
आदमी ने दिमाग़ के रास्ते तक़दीर को गढा है
और
तक़दीर है कि दिल के रास्ते गुजरना चाहती है.
सोचता हूं,
जब बचपन था, हाथ पर कितनी तस्वीरें बनाईं,
क्या उससे कोई तक़दीर बनी होगी.
युवा हुआ, तब नदी तट पर बैठ जाने कितने पत्थर उछाले
क्या उनसे घिसकर कोई लकीर मिटी होगी.
और
अब जब प्रौढ़पन में माथे पर लकीरें पडने

हाथों के खुले रहने का वक्त आया,
तब लकीरें जुटा-मिटा रहा हूं.
कहीं किसी घर के द्वार पर महावर लगे हाथों की छाप लगी है.
हाथों के शुभत्व को दीवार पर उकेरने की कोशिशकी गई है.
उस शुभत्व के पार कोई सुना सा स्वर गूँज रहा है -
"मेरे रब हर तदबीर कर देखा
मिट न सकी दूरी नजदीकियों की.
खेल खेल में उसने ही खींच दी थी,
कोई तिरछी सी गहरी लकीर कोई."
तब जाना,
सब ओर वही तस्वीरें है.
घर के बाहर खुली दीवारों पर हाथों में खिली लकीरें हैं
और
घर के भीतर घिसी लकीरों से बंदी हुई तक़दीरेंहै

लकीरें और तक़दीरें


लकीरें और तक़दीरें
हाथ में कोई किताब लिए बैठा हूँ.
पन्ने पलटते हुए उँगलियाँ कहीं थम जाती हैं
और तब सबकी तरह वो पढने लग जाता हूं,
जो किताब में लिखा ही नहीं.
किसी दिन हाथ की किताब में उलझा था.
लकीरें जाँचने व तक़दीरें बांचने की कोशिश कर रहा था.
शायद किसी कशिश या कशमकश में रहा होऊं .
किताब चार लकीरों से जीवन जगत का हाल बताती थी -
-जिंदगी की लकीर, जो हाथ में भी वक्त के साथ नीचे ढलती जाती है.
-दिल की लकीर, एक छोर से दिल से मिलने सी आती है, मगर बीच राह में मुड कर ऊपर चढ जाती है.
-दिमाग़ की लकीर, जो जिंदगी के साथ ही शुरू होती है, मगर जिंदगी और दिल के बीच लक्ष्मण रेखा की तरह बिछ जाती है.
-किस्मत की लकीर, जो वहाँ से शुरू होती है
जहाँ जिंदगी की लकीर खत्म होती है
मगर
दिमाग़ की लकीर को काटकर दिल को छूने की खातिर बढती जाती है.
अजीब है,
आदमी ने दिमाग़ के रास्ते तक़दीर को गढा है
और
तक़दीर है कि दिल के रास्ते गुजरना चाहती है.
सोचता हूं,
जब बचपन था, हाथ पर कितनी तस्वीरें बनाईं,
क्या उससे कोई तक़दीर बनी होगी.
युवा हुआ, तब नदी तट पर बैठ जाने कितने पत्थर उछाले
क्या उनसे घिसकर कोई लकीर मिटी होगी.
और
अब जब प्रौढ़पन में माथे पर लकीरें पडने

हाथों के खुले रहने का वक्त आया,
तब लकीरें जुटा-मिटा रहा हूं.
कहीं किसी घर के द्वार पर महावर लगे हाथों की छाप लगी है.
हाथों के शुभत्व को दीवार पर उकेरने की कोशिशकी गई है.
उस शुभत्व के पार कोई सुना सा स्वर गूँज रहा है -
"मेरे रब हर तदबीर कर देखा
मिट न सकी दूरी नजदीकियों की.
खेल खेल में उसने ही खींच दी थी,
कोई तिरछी सी गहरी लकीर कोई."
तब जाना,
सब ओर वही तस्वीरें है.
घर के बाहर खुली दीवारों पर हाथों में खिली लकीरें हैं
और
घर के भीतर घिसी लकीरों से बंदी हुई तक़दीरेंहै

लकीरें और तक़दीरें


लकीरें और तक़दीरें
हाथ में कोई किताब लिए बैठा हूँ.
पन्ने पलटते हुए उँगलियाँ कहीं थम जाती हैं
और तब सबकी तरह वो पढने लग जाता हूं,
जो किताब में लिखा ही नहीं.
किसी दिन हाथ की किताब में उलझा था.
लकीरें जाँचने व तक़दीरें बांचने की कोशिश कर रहा था.
शायद किसी कशिश या कशमकश में रहा होऊं .
किताब चार लकीरों से जीवन जगत का हाल बताती थी -
-जिंदगी की लकीर, जो हाथ में भी वक्त के साथ नीचे ढलती जाती है.
-दिल की लकीर, एक छोर से दिल से मिलने सी आती है, मगर बीच राह में मुड कर ऊपर चढ जाती है.
-दिमाग़ की लकीर, जो जिंदगी के साथ ही शुरू होती है, मगर जिंदगी और दिल के बीच लक्ष्मण रेखा की तरह बिछ जाती है.
-किस्मत की लकीर, जो वहाँ से शुरू होती है
जहाँ जिंदगी की लकीर खत्म होती है
मगर
दिमाग़ की लकीर को काटकर दिल को छूने की खातिर बढती जाती है.
अजीब है,
आदमी ने दिमाग़ के रास्ते तक़दीर को गढा है
और
तक़दीर है कि दिल के रास्ते गुजरना चाहती है.
सोचता हूं,
जब बचपन था, हाथ पर कितनी तस्वीरें बनाईं,
क्या उससे कोई तक़दीर बनी होगी.
युवा हुआ, तब नदी तट पर बैठ जाने कितने पत्थर उछाले
क्या उनसे घिसकर कोई लकीर मिटी होगी.
और
अब जब प्रौढ़पन में माथे पर लकीरें पडने

हाथों के खुले रहने का वक्त आया,
तब लकीरें जुटा-मिटा रहा हूं.
कहीं किसी घर के द्वार पर महावर लगे हाथों की छाप लगी है.
हाथों के शुभत्व को दीवार पर उकेरने की कोशिशकी गई है.
उस शुभत्व के पार कोई सुना सा स्वर गूँज रहा है -
"मेरे रब हर तदबीर कर देखा
मिट न सकी दूरी नजदीकियों की.
खेल खेल में उसने ही खींच दी थी,
कोई तिरछी सी गहरी लकीर कोई."
तब जाना,
सब ओर वही तस्वीरें है.
घर के बाहर खुली दीवारों पर हाथों में खिली लकीरें हैं
और
घर के भीतर घिसी लकीरों से बंदी हुई तक़दीरेंहै

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

मेरा मन: काफी वक़त गुजर गया है

मेरा मन: काफी वक़त गुजर गया है: काफी वक़त गुजर गया  है यु ही खाट पे बैठे- बैठे  अब आवाजे आती हैं रिश्तों की  कभी रिसने की कभी  गांठ लगाने की  अब आवाजें आती है  कभी टूटने क...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

शनिवार, 28 जुलाई 2012

रात भर...


करके वादा कोई सो गया चैन से 
करवटें बदलते रहे हम रात भर !!१!!
हसरतें दिल में घुट-घुट के मरती रही 
और जनाज़े निकलते रहे रात भर !!२!!
रात भर चांदनी से लिपटे रहे वो 
हम अपने हाथ मलते रहे रात भर !!३!!
आबरू क्या बचाते वह गुलशन कि 
खुद कलियाँ मसलते रहे रात भर !!४!!
हमको पीने को एक कतरा भी न मिला 
और दौर पर दौर चलते रहे रात भर !!५!!
रौशनी हमें दे ना पाए यह चिराग अब 
यूँ तो कहने को वो जलते रहे रात भर !!६!!
छत में लेट टटोले हमने आसमान 
अश्क इन आँखों से ढलते रहे रात भर !!७!!
.........नीलकमल वैष्णव "अनिश".........

सोमवार, 18 जून 2012

मेरा मन: मुझे लडकी बना दे

मेरा मन: मुझे लडकी बना दे: काश उपर वाला मुझे लडकी बना दे  और फिर मुझे एक लड़की की माँ बना दे | वो सकून, वो , वो दर्द, कोई मुझे भी दिला दे, कोई मुझे एक लड़की के कपडे ह...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

शुक्रवार, 8 जून 2012

सोनिया हिन्दुओ से नफरत क्यूँ करती है ?


क्या सोनिया गाँधी को हिन्दुओ से नफरत है ??? 
मै कुछ तथ्य पेश कर रहा हूँ और आप लोग भी सोचिये कि क्या सोनिया गाँधी सच में हिन्दुओ से नफरत करती है ??

1 – सोनिया जी ने विसेंट जार्ज को अपना निजी सचिव बनाया है जो ईसाई है ..विसेंट जार्ज के पास 1500 करोड़ कि संपत्ति है 2001 में सीबीआई ने उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला दर्ज किया उस वक्त सीबीआई ने विसेंट के 14 बैंक खातो को सील करते हुए कड़ी करवाई करने के संकेत दिए थे फिर सोनिया के इशारे पर मामले को दबा दिया गया .. मैंने सीबीआई को विसेंट जार्ज के मामले में 4 मेल किया था जिसमे सिर्फ एक का जबाब आया कि जार्ज के पास अमेरिका और दुसरे देशो से पैसे के स्रोत का पता लगाने के लिए अनुरोध पत्र भेज दिया गया है.. वाह रे सीबीआई १० साल तक सिर्फ अनुरोध पत्र टाइप करने में लगा दिए !!!

2 – सोनिया ने अहमद पटेल को अपना राजनीतिक सचिव बनाया है जो मुसलमान है और कट्टर सोच वाले मुसलमान है ..

3 – सोनिया ने मनमोहन सिंह कि मर्जी के खिलाफ पीजे थोमस को cvc बनाया जो ईसाई है.. और सिर्फ सोनिया की पसंद से cvc बने .जिसके लिए भारतीय इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री को माफ़ी मागनी पड़ी ..

4 – सोनिया जी ने अपनी एकमात्र पुत्री प्रियंका गाँधी की शादी एक ईसाई राबर्ट बढेरा से की ..

5 – अजित जोगी को छतीसगढ़ का मुख्यमंत्री सिर्फ उनके ईसाई होने के कारण बनाया गया जबकि उस वक़्त कई कांग्रेसी नेता दबी जबान से इसका विरोध कर रहे थे.. अजित जोगी इतने काबिल मुख्यमंत्री साबित हुए की छतीसगढ़ में कांग्रेस का नामोनिशान मिटा दिया. अजित जोगी पर दिसम्बर 2003 से बिधायको को खरीदने का केस सीबीआई ने केस दर्ज किया है . सीबीआई ने पैसे के स्रोत को भी ढूड लिया तथा टेलीफोन पर अजित जोगी की आवाज की फोरेंसिक लैब ने प्रमडित किया इतने सुबूतो के बावजूद सीबीआई ने आजतक सोनिया के इशारे पर चार्जशीट फाइल नहीं किया ..

6 – जस्टिस ……. [मै नाम नहीं लिखूंगा क्योकि ये शायद न्यायपालिका का अपमान होगा ] को 3 जजों की बरिष्ठाता को दरकिनार करके सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया जो की एक परिवर्तित ईसाई थे …
7 – राजशेखर रेड्डी को आँध्रप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में उनका ईसाई होना और आँध्रप्रदेश में ईसाइयत को फ़ैलाने में उनका योगदान ही काम आया मैडम सोनिया ने उनको भी तमाम नेताओ को दरकिनार करने मुख्यमंत्री बना दिया ..

8 – मधु कोड़ा भी निर्दलीय होते हुए अपने ईसाई होने के कारण कांग्रेस के समर्थन से झारखण्ड के मुख्यमंत्री बने …
9 – अभी केरल विधान सभा के चुनाव में कांग्रेस ने 92 % टिकट ईसाई और मुस्लिमो को दिया है
10 – जिस कांग्रेस में सोनिया की मर्जी के बिना कोई पैर नहीं हिला सकता वही दिग्विजय सिंह किसके इशारे पर 10 सालो से हिन्दू बिरोधी बयानबाजी करते है ये हम सब अच्छी तरह जानते है …

मंगलवार, 29 मई 2012

मेरा मन


इस अंतर  मन को क्या मैं पुछु और क्या  मैं इस की सुनु
ख्वाबो में तो रोज़ मुलाकात होती हैं पर ये समझता ही चला जाता है
जाने मन के किस कोने में छुप सो जाती है, सच्चाई
फिर तो दुसरे दिन ही मुलाकात हो पति है
पर तब तक तो वो इरादा बदला चूका होता है
ये सुनता तो बहुत ही कम है
चलो दोस्तों आज फिर इस से मिलने का इरादा बनाते है इस खोजते है इस नभ में , इस  उपवन मैं  उस सपनो की नगरी मैं
चलो चलो >>>>..............

गुरुवार, 3 मई 2012

प्राइवेट पार्ट के गोरेपन पर इंटरनेट पर छिड़ी बहस

हद  हो गई  अब क्या  बाकि रह गया है  हिंदुस्तान का सेंशर बोर्ड कर क्या रहा है कभी डर्टी जेसी फिल्मे  आती है और अब तो टीवी पर भी विज्ञापन एसे दिखाई पड़ते है की  देखने वालो लो भी सरम मह्सुश  होने लगती है
मौजूदा समय में एक फेयरनेस क्रिम को लेकर इंटरनेट की दुनिया में जोरदार बवाल मचा हुआ है। यह बवाल हाल ही में टीवी पर प्रसारित हाईजीन फेयरनेस क्रिम के विज्ञापन को लेकर मचा है। इस क्रीम ने यह दावा किया है कि इसके इस्‍तेमाल से महिलाएं अपने प्राइवेट पार्ट का रंग निखार सकती हैं। इस विज्ञापन के प्रसारण के बाद इंटरनेट की दुनिया में एक नई बहस छिड़ गई है और लोग इस विज्ञापन की जमकर निंदा कर रहे हैं।

आगे की बात करने से पहले आपको विज्ञापन के बारे में बताते हैं। विज्ञापन में दिखाया गया है कि एक पत्‍नी इस बात से बेहद परेशान है कि उसका पति उससे ज्‍यादा अखबारों में खोया रहता है। विज्ञापन में दिखाया गया है कि जैसे ही वह इस हाईजीन क्रीम का इस्‍तेमाल करती ह‍ै उसका पति उसकी ओर खिंचा चला आता है।

अब जरा इंटरनेट की दुनिया में मचे घमासान के बारे में चर्चा करते हैं। इस विज्ञापन को लेकर लोगों में खासा रोष है। सोशल नेटवर्किंग साइट यू ट्यूब पर तो इस विज्ञापन को सात लाख से भी ज्‍यादा लोग देख चुके हैं और इनमें ज्‍यादातर इसके खिलाफ हैं। यू ट्यूब पर एक यूजर्स ने इस विज्ञापन के बारे में प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि 'महिलाओं को उपेक्षित महसूस कराने वाला एक और उत्‍पाद'। वहीं एक दूसरे यूजर्स ने लिखा है कि 'क्‍या वाकई में इस विज्ञापन में प्राइवेट पार्ट को लेकर महिलाओं की समस्‍याओं को दिखाया गया है? क्‍या वाकई में त्‍वचा का रंग एक समस्‍या है? यह पूरी तरह बकवास है।'

मालूम हो कि बॉलीवुड की कई हस्‍तियां और पूर्व आईपीएस अधिकारी किरन बेदी भी फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन करते हुए नजर आ चुकी हैं। जिनका दावा है कि उनकी क्रीम के इस्‍तेमाल से कोई भी गोरा बन सकता है और वह सबकुछ हासिल कर सकता है जिसकी उसे चाहत है। इन विज्ञापनों में दिखाया जाता है कि किस तरह सांवाले रंग वाली लड़की तब तक आगे नहीं बढ़ पाती जब त‍क कि वो इस जादूई फेयरनेस क्रीम का इस्‍तेमाल न कर ले। अब सवाल यह है कि क्‍या इस तरह के विज्ञापन महिलाओं का अपमान नहीं है? क्‍या गोरा रंग जिंदगी के हर इम्‍तहान के लिए जरूरी है?

क्या सांवाले रंग वाली लड़की की शादीया  नहीं होती  ?
क्या सांवाले रंग वाली लड़की  रंग को लेके अव्शाद में रहती है ?
आजकल तो इस गोरे रंग ने वापिस रंग भेद निति जेसी प्रथा को याद दिला दिया  

मंगलवार, 1 मई 2012

मेरा बचपन


लोटा दो वो बचपन की यादे , वो गलियों ,वो   नुकढ़ की बाते
लोटा दो मेरे जीते कंचे जो बाकि है | वो रंगबिंगी पत्नगे
वो सपनो की राजकुमारी लोटा दो वो दादा जी की कहानी
वो ऊंट की सवारी , वो १० पेसे की पेन्सिल ,
वो चुपके गुटके कहने की आदत , लोटा दो वो बचपन की बाते  मेरी बचपन की यादे ,
वो मासूम चेहरा , वो मासूमियत की लाली
क्यों नहीं लोटा ते वो बचपन की शेतानी  
ना ज़मीन, ना सितारे, ना चाँद, ना रात चाहिए,
माँ जो बचपन में करती वो प्यार चाहिए
लोटा दो वो मेरा बचपन की बाते वो वो आँखों के आंसू
काश कोई लोटा दे वो बचपन का गुजरा जमाना

माँ पिता का वो प्यार वो मनुहार,
वो डांट फटकार, वो रोना मचलना,
वो रोती आँखों से मुस्कुराना याद आ गया,
बस रह गई एक कसक इतनी,
वो गुजरा जमाना जिसे छोड़ आये थे राह में कहीं,
अब भी खड़ा ताकता होगा राह उसी राहगुजर में,
पर बेबस हूँ मैं जा नहीं सकता वापिस,
उसकी यादो संग हसना रोना अब किस्मत मेरी,
वो गुजरा जमाना याद आ गया,
कोई तो लोटा दो वो बचपन की यादे , वो गलियों ,वो   नुकढ़ की बाते

दिनेश पारीक

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

एक दिन की सुबह ने कहा


एक दिन की सुबह ने कहा - आप कहा हो ???
दूसरी तरफ से आवाज़ आयी, इस वक़त में डूब रही हु  अपने यकीन में _ इतने में उपर से आवाज़  आई मैं वो असमान हूँ जहा तुम दोनों की दोस्ती हुई थी ,
रोज़ ये दिन आता जाता है ,इन्सान वही रह जाता  है,
कितनी सदिया बीत गयी मेरी आँखों मै
पर हर बार मै यु हु छुट गया
जब लिखा वक़त ने अपना इतिहास तो ,
उस ने मुझे रात और दिन मै   बाट दिया
दिनेश पारीक

रविवार, 22 अप्रैल 2012

मेरा बचपन

खिला एक फूल फिर इन रेगिस्तान में.
मुरझाने फिर चला दिल्ली की गलियों में.
ग्रॅजुयेट की डिग्री हाथ में थामे निकल गया.
इस उम्र मैं ही मैं , जिंदा लांश बन गया.......

खो गया इस भागती भीड़ में वो.
रोज़ मरा बस के धक्कों में वो.
दिन है या रात वो भूल गया.
इस उम्र मैं ही मैं , जिंदा लांश बन गया.........

देर से रात घर आता है पर कोई टोकता नहीं.
भूख लगती है उसे पर माँ अब आवाज लगाती नहीं.
कितने दिन केवल चाय पीकर वो सोता गया.
इस उम्र मैं ही मैं , जिंदा लांश बन गया.........

अब साल में चार दिन घर जाता है वो.
सारी खुशियाँ घर से समेट लाता है वो.
अपने घर में अब वो मेहमान बन गया
इस उम्र मैं ही मैं , जिंदा लांश बन गया.........

मिलजाए कोई गाँव का तो हँसे लेता है वो.
पूरी अनजानी भीड़ में उसे अपना लगता है वो.
मैं आज फिये बचपन मैं गया तो उदास होता गया..
इस उम्र मैं ही मैं , जिंदा लांश बन गया.......

न जाने कितने फूल पहाड के यूँ ही मुरझाते हैं..
नौकरी के बाज़ार में वो बिक जाते है.
पत्तों पर कुछ बूंदें हैं, उन बूंदों में जीवन है
कुछ आवाजें हैं गूँज रहीं है
क़दमों तले रौंदा गया जो उस सूखे पात में भी जीवन है
पानी मेरी आँखो का बिखर गया
इस उम्र मैं ही मैं , जिंदा लांश बन गया.......

दिनेश पारीक



गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

मेरी कविताओं का संग्रह: मेरा ही नशीब था

मेरी कविताओं का संग्रह: मेरा ही नशीब था: न कमी थी कोई जहान में कमजोर मेरा ही नशीब था सब कुछ पास था उस के | मुझे देने के लिए वो गरीब था | उस ने बहुत धन दोलत दिया दुनिया को पर मे...

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

:मैं नारी हूँ नर को मैनें ही जन्म दिया

मैं नारी हूँ , नर को मैनें ही जन्म दिया
मेरे ही वक्ष-स्थल से उसने अमृत पिया
मैं स्रष्टा की सर्वोत्तम मति की प्रथम-सृष्टि
मेरे पिघले अन्तर से होती प्रेम-वृष्टि ।

जिस नर को किया सशक्त कि वह पाले समाज
मैं, उसके अकरुण अनाचार से त्रस्त आज ।


मैं वही शक्ति, जिसने शैशव में शपथ लिया
नारी-गरिमा का प्रतिनिधि बन, हुंकार किया --
'' जो करे दर्प-भंजन, जो मुझसे बलवत्तर
जो रण में करे परास्त मुझे, जो अविजित नर ।


वह पुरूष-श्रेष्ठ ही कर सकता मुझसे विवाह
अन्यथा, मुझे पाने की, नर मत करे चाह ।''

क्रमशः

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यह लम्बी कविता मेरे अब तक के जीवनानुभवों के आधार पर प्रस्तुत है । यह क्रमशः प्रस्तुत की जायेगी ब्लॉग में ।

नारी के विषय में भारतीय दृष्टि , अतिशय वैज्ञानिक, मानव-मनोविज्ञान के गूढ़ नियमों से नियंत्रित , सामाजिक-विकास को निरंतर पुष्ट करने वाली तथा स्त्री - पुरूष संबंधों को श्रेष्ठतम शिखर तक ले जाने की गारंटी देती है ।

भारत ने सदा स्त्री -पुरूष संबंधों में स्त्री को प्रधानता दी और स्त्री को यह बताया कि कैसे वह पुरूष को अपने अधीन रख सकती है । कैसे वह पुरूष के व्यक्तित्व में निहित सर्वोत्तम संभावनाओं को प्रकृति और मानव-समाज के कल्याण में नियोजित करा सकती है ।

मैं इन कविताओं में , स्त्री के अनेक स्वरूपों को प्रस्तुत करते हुए यह कहना चाहता हूँ कि यदि समाज को अपराधमुक्त , अनाचार-मुक्त बनाना है तो स्त्री-पुरूष संबंधों को भारतीय-प्रज्ञा के आलोक में परिभाषित करना अनिवार्य है अन्यथा समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलाना कठिन से कठिनतर होता जाएगा ।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

मैं नारी हूँ

मैं नारी हूँ

मुझे किसी ने न जाना
किसी ने न पहचाना

मैं नारी हूँ
मेरा काम है लड़ते जाना।



लड़ती हूँ मैं पुराने रीति-रिवाजों से
करती हूँ अपने बच्चों को सुरक्षित
अंधविश्वासों की आँधी से
रहती हूँ हरदम अभावों में
पर देती हूँ अभयदान।
मैं नारी हूँ ...

उलझी रहती हूँ सवालों में
जकड़ी रहती हूँ मर्यादा की बेड़ियों में
बदनामी का ठिकरा हमेशा
फोड़ा जाता है मुझ पर
मैं हँसते-हँसते हो जाती हूँ कुर्बान।
मैं नारी हूँ ...

नए रिश्तों की उलझन में
उलझी रहती हूँ मैं
पर पुराने को निभाकर
हरदम चलती हूँ मैं
रिश्तों में जीना और मरना काम है मेरा।
मैं नारी हूँ ...

बुधवार, 21 मार्च 2012

मेरी धड़कन


मेरी धड़कन, मॉं

लौट रही थी खाली घड़ा लेकर
मैं पलट रहा था थी भूगोल के पृष्ट... और
खोज था
देश के मानचित्र पर
नदियों का बहाव
मॉं
सामना कर रही थी भूखमरी से
वे चखना चाहते
अनाज के बदले उसकी देह
मैं उसकी कोख में
तलाश रहा था भट्टी
हथियार बनाने के लिए
मॉं
जर्जर कमरे में , हाथ की फटी साड़ी में
ढ़ॉंप रही थी देह और दुविधा
मैं उसकी कोख में
बुन रही थी वस्त्र आकार के क्षेत्रफल-सा
मॉं
दंगे में भीड़ से घिरी चीख रही है
संभाल नहीं पा रही है अपने कटे हुए पेट को
एक अकेले हाथ से
दूसरा हाथ कटकर दूर जा गिरा है
मैं, गर्भस्थ शिशु
पेट से बाहर टुकड़े-टुकड़े बिखरा हूँ
मैं ठीक उसी समय हलाल हुआ
जब कोख में लिख रहा था धर्म का अर्थ ।
दिनेश पारीक

मंगलवार, 20 मार्च 2012

गीता ने बर्बाद किया भारत को:ओरिसन :

आज सुबह सुबह मैं कुछ खोज रहा था गूगल में की कुछ दिन उपरांत ही माँ दुर्गा के नव रात्रि का आगमन होने वाला है तो कुछ पूजा की विधि अपने देश में किन किन प्रकार से की जाती है ये ही खोज ने का मन बना के गूगल खोला और कुछ लिखा और देखा की नव भारत times के पेपर में २१/१२/२०११ के दिन कोई एक ओरिसन नामक लेखक के विचार गीता के उपर कुछ इस तरह से है मेने ध्यान पूरवक पढ़ा तो पहले तो सोचा की इस लेखक ने या तो गीता को कभी देखा और पढ़ा भी नहीं होगा फिर उन के लेख से आगे बड़ा तो पाया की उस ने पढ़ा तो जरुर है वर्ना उस के पास इतना गीता के विरुद्ध इतने कड़े विचार धरा बनती केसे
पर कुछ बातो का तो समर्थन मेरा दिल भी कर रहा है की
दुर्योधन ने असा क्या पाप और अधर्म किया जिसे से वो अपने भाइयो के हाथो से ही मारा गया उसका ये पाप था क्या की उसे भगवान ने पांडव पुत्र से पहले जन्म ने ही नहीं दिया दुर्योधन को गांधारी के गर्भ में ९ महीनो की जगह ११ महीनो तक रखा ये अन्याय नहीं तो क्या था भगवान का
शायद उसे ये कहानी ही लिखनी थी दुर्योधन जिसने कुछ भी नहीं किया वह अधर्म है ?
दुर्योधन ने ऐसा क्या किया जो अधर्म था

१ पिछले एक हज़ार साल से तो गुलाम हैं,
कोई धर्म वाला कृष्ण अवतार लेने नहीं आया,
अभी तक,
गीता में भगवान् प्राप्ति के साधन हैं,
तो आज तक किसी को गीता से भगवान् क्यूँ नहीं मिला ?

गीता के बाद यहाँ पर किसी ग्रन्थ को टिकने ही नहीं दिया गया, गीता को ही हर चीज़ का हल माना गया की गीता से हर समस्या का हल निकल सकता है, और किसी के ग्रन्थ को जगह ही नहीं मिली, तो बर्बादी का जो नाम है वह गीता के ही नाम है, और अगर आबाद की बात है तो आबादी के लिए किसी ग्रन्थ की जरूरत नहीं है, क्यूंकि फिर आदमी किताबों से नहीं अपने हृदय से जीवन व्यतीत करता है, हृदय की बात को हृदय सुनता, फिर गीता के दिमाग की जरूरत नहीं होती, आबादी के लिए दिमाग की जरूरत नहीं, हृदय की जरूरत है,

दिनेश पारीक

गीता ने बरबाद किया भारत को, भारत में भावनाओं के अथाह समंदर को गीता ने बरबाद कर दिया, लोग ने लोगों पर विश्वास करना छोड़ दिया, और लोग आपस में नातें-रिश्ते भूलकर, जमीन-जायदाद और धन के लिए अपने ही अपनों के गले काटने लगे, क्यूंकि गीता में ऐसा लिखा है, जिसमे इंसानी भावनाओं से ऊपर जमीन-जायदाद और धन-संम्पत्ति को बड़ा माना गया, और उसके पीछे यह मिसाल दी गयी की जो अपना है, वह अगर किसी के पास भी है तो छीन लो, भले ही वह भाई-हो, नातेदार हो, रिश्तेदार हो, उस भावना को दबा दो, और जमीन और धन के लिए अपने से बड़ों से भी लड़ पड़ो, यह गीता ने सिखाया, जिससे भारत बरबाद हो गया, और भारत में जमीन-जायदाद और धन संम्पति को ज्यादा महत्त्व दिया गया, जबकि भावनाओं और हृदय की बातों को कमजोरी समझा गया, और इसका फायदा उठाया गया, तो इस तरह तो गीता ने एक तरफ कहाँ की जो तुम्हारा है अर्जुन वह किसी भी प्रकार लड़कर छीन लो, फिर दूसरी तरफ गीता ने कहा की तुम क्या लाये तो जो तुम्हारा है, तुम क्या ले जाओगे, इस तरह की विरोधाभाषी वक्तव्य ने भारत के लोगों को भ्रमित कर दिया, तो जो लोग, ताकतवर थे, चालाक थे, उन्होंने दूसरों की भावनाओं का फायदा उठाकर, उन्हें उसी में उलझाये रखा और अपने पास धन-दौलत और जमीन-जायदाद अपने पास रखी, बस यही पारी पाटि भारत में चलती रही, और उसने कमजोर को वैरागी बना दिया, और ताकतवर को अय्याश बना दिया, कमजोर होकर वह वैराग का बाना ओढ़ लिया की अब उसे तो यह जामीन मिलने से रही तो उसने कहाँ की संसार मिथ्या है, और जो ताकतवर था उसने अय्याशी अपना ली | इस तरह से गीता ने पूरे भारत को दो भागों में बाँट दिया, एक जो उस जमीन-जायदाद के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे, उसके लिए किसी के साथ भी लड़ सकते थे, कोई भी पैंतरा अपना सकते थे, और अपने हाथ में दौलत काबू में रखते थे, और दूसरे वो जों भावनाओं के आगे जमीन-जायदाद को भी ठोकर मार देते थे, और अपने ईमान को कभी गन्दा नहीं करते थे, और अपने नाते-रिश्तों और बड़ों का सम्मान करते थे, आज भी भारत इसी ढर्रे पर चल रहा है, जों लोग पैसे वाले होते हैं वह भावुक नहीं होते हैं, और जों गरीब होते हैं वह भावुक होते हैं, और पैसे वाले किसी के सामने दिखावा तो करते हैं की हम सम्मान करते हैं, पर पीठ पीछे छुरा भी घोंप देते हैं, और उनकी भावना झूठी होती है, उस भावना में भी वह उससे गरीब के पास जों होता है, वह हथियाना चाहते हैं, और उसे और गरीब ही रहने देना चाहते हैं, बात तो बड़ी-बड़ी करते हैं की सब माया है, पर भारत वाले जितनी माया इक्कठी करते हैं उतना संसार का कोई आदमी नहीं करता है |


तो आज भी यह गीता किसी भी नाते और रिश्ते को तोड़कर जमीन और जायदाद को महत्त्व देने को कहती है, और गीता के बल पर वह किसी की परवाह नहीं करता है, और बड़े-बूढें की भावनाओं को देखता तक नहीं है, उसके लिए अपना अहंकार ही सबसे बड़ा होता है, और उसका अहंकार किसी भी प्रकार से जमीन और जायदाद हथियाना चाहता है | चाहे उसके लिए किसी को भी मारना पड़े, चाहे वह कोई भी हो, नाते में रिश्ते में।
ओरिसन :
इस लेख को सिर्फ कॉपी किया गह है नवभारत times न्यूज़ पेपर से ये विचार एक ओरिसन नामक लेखक के है

गुरुवार, 15 मार्च 2012

माँ की वजह से ही है आपका वजूद

एक विधवा माँ ने अपने बेटे को बहुत मुसीबतें उठाकर पाला। दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। बड़ा होने पर बेटा एक लड़की को दिल दे बैठा। लाख कोशिशों के बावजूद वह लड़की का दिल नहीं जीत पाया।

एक दिन वह लड़की से बोला- यदि तुम मुझसे शादी नहीं करोगी तो मैं अपनी जान दे दूँगा। उसकी हरकतों से परेशान हो चुकी लड़की ने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे लड़के से पीछा छूट जाए। वह बोली- मैं तुम्हारे प्यार की परीक्षा लेना चाहती हूँ। बोलो तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो? लड़का बोला- बताओ, मुझे अपने प्यार को साबित करने के लिए क्या करना होगा?

लड़की बोली- क्या तुम मुझे अपनी माँ का दिल लाकर दे सकते हो? लड़का सोच में पड़ गया, लेकिन उस पर तो लड़की को पाने का जुनून सवार था। वह बिना कुछ कहे वहाँ से चल दिया। लड़की खुश हो गई कि अब शायद वह उसका पीछा नहीं करेगा। उधर लड़का घर पहुँचा तो उसने देखा कि उसकी माँ सो रही है। उसने माँ की हत्या कर उसका दिल निकाल लिया और उसे कपड़े में छुपाकर लड़की के घर की तरफ चल पड़ा।
एक विधवा माँ ने अपने बेटे को बहुत मुसीबतें उठाकर पाला। दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। बड़ा होने पर बेटा एक लड़की को दिल दे बैठा। लाख कोशिशों के बावजूद वह लड़की का दिल नहीं जीत पाया।


रास्ते में अँधेरा होने के कारण ठोकर खाकर वह जमीन पर गिर पड़ा और उसकी माँ का दिल उसके हाथ से छिटककर दूर जा गिरा। गिरने पर वह कराहा। तभी माँ के दिल से आवाज आई- बेटा, तुझे चोट तो नहीं लगी? लेकिन इस बात का भी लड़के पर कोई असर नहीं हुआ और वह माँ का दिल लेकर लड़की के घर पहुँच गया। लड़के को अपनी माँ के दिल के साथ आया देख लड़की हतप्रभ रह गई।

उसे बिलकुल भी विश्वास नहीं हो रहा था कि एक बेटा इतना निर्दयी भी हो सकता है। उसे लड़के पर बहुत गुस्सा आया और वह बोली- जो व्यक्ति एक लड़की की खातिर अपनी माँ के निःस्वार्थ प्यार को भूलकर उसका दिल निकाल सकता है, वह किसी दूसरे से क्या प्रेम करेगा।

दोस्तो, यह कहानी भले ही आपको अविश्वसनीय लगे, लेकिन यह सही है कि दुनिया में एक माँ ही होती है, जो खुद लाख दुःख उठा ले, लेकिन अपने बच्चे की छोटी-सी तकलीफ भी सह नहीं पाती। माँ तो इंसान को खुदा से मिली अनुपम सौगात है। वह जननी है। वही सृष्टिकर्ता है, क्योंकि उसके बिना तो सृष्टि आगे बढ़ ही नहीं सकती।
एक विधवा माँ ने अपने बेटे को बहुत मुसीबतें उठाकर पाला। दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। बड़ा होने पर बेटा एक लड़की को दिल दे बैठा। लाख कोशिशों के बावजूद वह लड़की का दिल नहीं जीत पाया।

एक दिन वह लड़की से बोला- यदि तुम मुझसे शादी नहीं करोगी तो मैं अपनी जान दे दूँगा। उसकी हरकतों से परेशान हो चुकी लड़की ने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे लड़के से पीछा छूट जाए। वह बोली- मैं तुम्हारे प्यार की परीक्षा लेना चाहती हूँ। बोलो तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो? लड़का बोला- बताओ, मुझे अपने प्यार को साबित करने के लिए क्या करना होगा?

लड़की बोली- क्या तुम मुझे अपनी माँ का दिल लाकर दे सकते हो? लड़का सोच में पड़ गया, लेकिन उस पर तो लड़की को पाने का जुनून सवार था। वह बिना कुछ कहे वहाँ से चल दिया। लड़की खुश हो गई कि अब शायद वह उसका पीछा नहीं करेगा। उधर लड़का घर पहुँचा तो उसने देखा कि उसकी माँ सो रही है। उसने माँ की हत्या कर उसका दिल निकाल लिया और उसे कपड़े में छुपाकर लड़की के घर की तरफ चल पड़ा।
एक विधवा माँ ने अपने बेटे को बहुत मुसीबतें उठाकर पाला। दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। बड़ा होने पर बेटा एक लड़की को दिल दे बैठा। लाख कोशिशों के बावजूद वह लड़की का दिल नहीं जीत पाया।


रास्ते में अँधेरा होने के कारण ठोकर खाकर वह जमीन पर गिर पड़ा और उसकी माँ का दिल उसके हाथ से छिटककर दूर जा गिरा। गिरने पर वह कराहा। तभी माँ के दिल से आवाज आई- बेटा, तुझे चोट तो नहीं लगी? लेकिन इस बात का भी लड़के पर कोई असर नहीं हुआ और वह माँ का दिल लेकर लड़की के घर पहुँच गया। लड़के को अपनी माँ के दिल के साथ आया देख लड़की हतप्रभ रह गई।

उसे बिलकुल भी विश्वास नहीं हो रहा था कि एक बेटा इतना निर्दयी भी हो सकता है। उसे लड़के पर बहुत गुस्सा आया और वह बोली- जो व्यक्ति एक लड़की की खातिर अपनी माँ के निःस्वार्थ प्यार को भूलकर उसका दिल निकाल सकता है, वह किसी दूसरे से क्या प्रेम करेगा।

दोस्तो, यह कहानी भले ही आपको अविश्वसनीय लगे, लेकिन यह सही है कि दुनिया में एक माँ ही होती है, जो खुद लाख दुःख उठा ले, लेकिन अपने बच्चे की छोटी-सी तकलीफ भी सह नहीं पाती। माँ तो इंसान को खुदा से मिली अनुपम सौगात है। वह जननी है। वही सृष्टिकर्ता है, क्योंकि उसके बिना तो सृष्टि आगे बढ़ ही नहीं सकती।