बुधवार, 9 नवंबर 2011

प्रेम गली अति सांकरी




Pariwar
प्रेम गली अति सांकरी
हमारे यहां प्रेम करना और प्रेम न करना दोनों ही कभी खतरे से खाली नहीं रहे। आम दिनों की तो छोडिए, वैलेंटाइन डे तक पर श्रीराम सेना वाले तो यह धमकी दे देते हैं कि जो प्रेम करता हुआ पाया गया, उसे पीटेंगे और सरकार पुलिस को यह आदेश दे देती है कि इस दिन कोई भी नागरिक प्रेम से वंचित नहीं रहना चाहिए। इसलिए प्रेम करने वाले तो श्रीराम सेना वालों से पिटते हैं और प्रेम न करने वाले पुलिस वालों से।

मुझसे कई प्रकार के लोग कई प्रकार की सलाह लेने आते रहते हैं। इस भय से कि जाकर सलाह नहीं ली, तो खुद देने आ जाएगा। उम्र का एक दौर ऎसा आता ही है जब आदमी को धन्नो भी बसंती लगने लगती है। ऎसी ही दशा वाला एक नौजवान मेरे पास आया और निवेदन किया, 'एक सलाह मिलेगी?'

मैंने झट कहा, 'बैठे किसलिए हैं? सलाहें तो मैं बिन मांगे ही देता रहता हूं जबकि तुम तो मांग भी कर रहे हो। एक क्यों दस मांगो।' उसने इच्छा प्रकट की, 'मैं चौपाया होना चाहता हूं। आपकी क्या राय है?'मैंने प्रति प्रश्न किया, 'अक्ल से तो लग ही रहे हो और भला किस तरह चौपाया होना चाहते हो?' उसने बात घुमाई, 'क्या आपने प्रेम या प्रेम विवाह किया है?'

मैं बोला, 'मैंने न एक बार भी लव किया और न एक बार भी लव मैरिज। प्यार-व्यार के मामले में मेरी स्थिति नितांत 'क्या जाने अदरक का स्वाद' वाली रही है। मेरी शादी पूरी तरह सुनियोजित थी। और मेरी भांति शादियाए हुए जानते ही हैं कि हिंदुस्तान में मैरिज अरेंज्ड हो, तो सारे काम बाप करता है सिवाय फेरे खाने के।
मुझे तो स्कूल-कॉलेज के दिनों में भी प्रेम-व्रेम नसीब नहीं हुआ। मैं था हिंदी साहित्य का छात्र सो मुझ मरते हुए पर कौन मरती? किंतु यह कमजोरी ही मेरी ताकत भी थी। एक तो मेरे हिंदी साहित्य का विद्यार्थी होने से भी मेरी भाषा जरा ठीक थी। दूसरा, मैंने ट्रकों से शेरो-शायरी नोट कर-कर के पर्याप्त होमवर्क कर रखा था। इसलिए प्रेमीजन मुझसे प्रेमपत्र लिखवाते थे। और सत्य कह रहा हूं कि जिस लड़के को प्रेमपत्र लिख देता था, उसके दो नतीजे तय थे। या तो वह अपनी प्रेमिका या उसके अन्य प्रेमियों से पिटता था या फिर उसकी अपनी प्रेमिका से शादी हो जाती थी (हालांकि, ले देकर बातें दोनों एक ही हैं)। भले ही जमाना गुजर गया किंतु यदा-कदा आज भी कई टकराते रहते हैं, अपनी प्रेमिका-पत्नी और बाल-बच्चों के साथ जो मेरे लिखे प्रेमपत्रों की वजह से ही ब्याहे गए थे। मुझे देखते ही दांत पीस कर कहने लगते हैं कि नालायक जॉर्ज बुश। तुम्हीं हो जिसने मुझ अच्छे- खासे अमरीकी सिपाही को इराक में उलझा दिया।'

वह बोला, 'तब तो आपसे इश्क-मोहब्बत के विषय में सलाह तो दूर, चर्चा करना ही व्यर्थ है।'मैंने कहा, 'व्यर्थ क्यों है? सच है कि मैंने स्वयं कभी भांग नहीं पी लेकिन भंगेडियों को तो देखा ही है। यों भी सलाह-मशविरा देने के लिए उस विषय की एबीसीडी ज्ञात होना जरूरी थोड़े ही है।'

उसने बात बढ़ाई, 'बताइए कि मुझे लव मैरिज करनी चाहिए या अरेंज्ड मैरिज?'मैंने सलाह दी, 'जब घंटे भर घोड़ी पर बैठ कर जिंदगी भर के लिए घोड़ी ही होना है, तो लव का बाईपास क्यों? प्रेम से नहीं बच सके हो तो कोई बात नहीं, प्रेमविवाह से तो बचो। अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा कि काश वक्त रहते किसी पेशेवर प्रेमी से गीता रहस्य जान लेते, तो मोक्ष पा जाते। भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में ही प्रयोग कर सिद्ध कर दिया था कि सफल गृहस्थी का कुल रहस्य यह है कि रास राधा के संग रचाओ और ब्याह रूक्मिणी से करो।' उसने शंका प्रकट की, 'क्या प्रेम विवाह के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं?'

मैंने कहा, 'कितने गिनाऊं? ब्याह की कुनैन खाते ही प्यार का मलेरिया उतर जाता है। जंगली तोते को पिंजरे में रख दो, तो वह हरीमिर्च और चने की दाल पर आ जाता है। जो उड़-उड़ कर टीं-टीं गाता रहता था, बेचारा राम-राम बोलने लगता है। धन्नो को बसंती समझने वाला ब्याह होते ही उसी बसंती की धन्नो बन जाता है। प्रेमिका के संग प्यार के वक्त झीलों में फेंके गए कंकर शादी होते ही दाल में निकलने लगते हैं। प्रेमी जिस प्रेमिका को लेकर भागता है, शादी के बाद उसे देखते ही भागने लगता है।

उस पर उम्र का जोश हावी था। उसने मेरी संपूर्ण सलाह खारिज की और मुझे चिढ़ाने की गरज से खुमार बाराबंकवी का शेर सुनाया- 'न हारा है इश्क न दुनिया थकी है/दिया जल रहा है हवा चल रही है।'मैं भी कहां परास्त होने वाला था। अविलंब सलाह दी, 'वक्त की नजाकत को समझो प्यारे। प्रेम दर्शन का विषय है, प्रदर्शन का नही, बचो। समय बदल चुका है।'
संपत सरल
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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

काशी कथा वाया मोहल्ला अस्सी


काशी कथा वाया मोहल्ला अस्सी
Hum Tum special article
काशी की जिंदगी के महžवपूर्ण हिस्से और धर्म की धुरी कहे जाने वाले मोहल्ला अस्सी पर हिंदी के अनूठे कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' के शब्दों को पिघलाकर चलते हुए चित्रों में तब्दील किया जा रहा है।

बनारस के घाटों की गोद में अलसायी सी लेटी गंगा को सुबह सुबह देखिए। सूरज पूर्व से अपनी पहली किरण उसे जगाने को भेजता है और अनमनी सी बहती गंगा हवा की मनुहारों के साथ अंगड़ाई लेती है। नावों के इंजन घरघराते हैं, हर हर महादेव की ध्वनियां गूंजती हैं। लोग डुबकियां लगा रहे हैं। यह मैजिक ऑवर है, रोशनी के लिहाज से।

डा.चंद्रप्रकाश द्विवदी निर्देशित फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' की यूनिट नावों में सवार है। वे इसी जादुई रोशनी के बीच सुबह का शिड्यूल पूरा कर लेना चाहते हैं। काशी की जिंदगी के महžवपूर्ण हिस्से और धर्म की धुरी कहे जाने वाले मोहल्ला अस्सी पर हिंदी के अनूठे कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' के शब्दों को पिघलाकर चलते हुए चित्रों में तब्दील किया जा रहा है। यह सिनेमा और साहित्य के संगम का अनूठा अवसर है। हम घूमने बनारस गए हैं और देखा कि वहां शूटिंग भी चल रही है तो यह यात्रा अपने आप में नई हो गई।

यह बेहद दिलचस्प है कि एक प्रतिबद्ध वामपंथी लेखक काशीनाथ सिंह की कृति पर एक समृद्ध इतिहासबोध वाले लेकिन विचारधारा में दक्षिणपंथी कहलाने वाले डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी फिल्म बना रहे हैं। दो धाराओं का यह संगम हुआ कैसे?

बकौल डॉ. द्विवेदी, जब उन्होंने उपन्यास पढा तो वे इसकी कहानी और शिल्प को लेकर चकित थे। इतिहास मुझे प्रिय रहा है और है लेकिन मैं अपने ऊपर लगे इतिहासवादी लेबल से भी अलग कुछ करना चाहता था। मैंने लगातार काशीनाथ जी से संपर्क रखा और वे मेरी दृष्टि से सहमत हुए। मैंने उन्हें यकीन दिलाया कि उपन्यास की आत्मा वही रहेगी। बस कोई बदलाव होगा तो वह सिनेमाई जरूरत के हिसाब से होगा।

काशीनाथ सिंह कहते हैं, मैं उनके दक्षिणपंथी रूझान से वाकिफ रहा हूं लेकिन डा. साहब की बातचीत और उपन्यास को लेकर नजरिए से मैं आश्वस्त था। फिर मैंने उनकी फिल्म पिंजर देखी और यह पुख्ता हो गया कि डा. द्विवेदी से बेहतर इस पर कोई फिल्म नहीं बना सकता। काशीनाथ सिंह यह कबूल करते हैं कि इस खबर के बाहर आते ही इंडस्ट्री के दो बड़े निर्देशकों ने उनसे संपर्क किया था लेकिन अव्वल तो मैं डा. साब को जुबान दे चुका था और दूसरे मैं आश्वस्त नहीं था कि वे लोग उस तरह विषय के साथ न्याय कर पाएंगे जैसा मुझे डा. चंद्रप्रकाश द्विवेदी पर यकीन है।

लेखक और निर्देशक के आपसी यकीन का आलम यह है कि फिल्म की पटकथा डा. द्विवेदी ने लिखी है और काशीनाथ सिंह ने उसे पढ़ना जरूरी नहीं समझा। वे कहते हैं, इससे किसी निर्देशक की मेहनत का अपमान होता कि मैं उन पर भरोसा नहीं कर रहा। मैं मानता हूं कि उपन्यास में कंकाल तो मेरा है लेकिन उसको मांस मज्जा की सिनेमाई जरूरत से भरने का हक निर्देशक का ही है और उसमें कहानी के लेखक होने के नाते मुझे दखल नहीं करनी चाहिए।

आप शूटिंग के दौरान देख सकते हैं कि मुंह में पान दबाए धोती कुर्ते में काशीनाथ सिंह, रामबचन पांडे, गया सिंह सब के सब बेतकल्लुफी से किसी भी वैनिटी वैन में आ जा रहे हैं। अपनी ही भूमिका निभा रहे चरित्रों से मिल रहे हैं और उन्हीं संवादों को सुनते हुए अभिभूत हैं जो उनके मुंह से उपन्यास में कहे गए हैं। बनारस के लोगों के बीच अचानक से ये सब लोग महत्त्वपूर्ण हो गए हैं।

पहले वे इन्हें नाम से जानते ही थे लेकिन अब यह भी देखा है कि किस तरह उनकी इज्जत की जा रही है। बहरहाल, जिन लोगों ने उपन्यास पढा है, वे जानते हैं कि इसमें काशी में प्रचलित गालियां जुबान का हिस्सा हैं और जैसा कि निर्देशक और लेखक दोनों की मानते हैं कि गालियां फिल्म में रहेंगी ही क्योंकि वे अश्लील होने से कहीं ज्यादा उस भाषायी संस्कृति का बोध कराती हैं जो बनारस और अस्सी घाट की परंपरा रही है। काशीनाथ सिंह हंसते हुए कहते हैं, 'डा. साब ने मुझे आश्वस्त किया है कि कहानी में इस्तेमाल 53 गालियां ज्यों की त्यों फिल्म के संवादों में हैं।'

पप्पू की दुकान के रूपक के माध्यम से पूरी कहानी समकालीन परिदृश्य में घटित होती है, जिसके अपने राजनीतिक मायने हैं और बकौल निर्देशक इसे कला फिल्म समझने की कोई गलती नहीं करनी चाहिए। हमारे समय के बदलाव को लेकर नए और पुराने के संघर्ष को लेकर यह एक जबरदस्त कहानी है, जिसमें मनोरंजन घुला हुआ है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि कहानी में आने वाले पात्रों के असली किरदार भी शूटिंग स्थल पर मौजूद रहे हैं जिनमें खुद काशीनाथ सिंह के अलावा रामबचन पांडे, गया सिंह, पप्पू चाय वाला और तन्नी गुरू के परिवार के लोग। फिल्म के मुख्य कलाकार सन्नी देओल कहते हैं, 'डा. द्विवेदी ने कमाल कर रहे है, खासकर मैं समझता हूं यह मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और सुख देने वाली भूमिका रही है। वे परफेक्शनिस्ट हैं। अपने संवादों के साथ छेड़छाड़ करने की इजाजत कलाकार को नहीं देते।' फिल्म के दूसरे कलाकार रवि किशन कहते हैं, 'सच कहूं तो मैं सैट पर कई बार संवाद इप्रोवाइज करता हंू लेकिन डॉ. साब ने हमें स्क्रिप्ट पढने के लिए बाध्य किया। हमें डॉयलॉग्स याद करने पड़े ताकि उन्हें बोलते समय हमारे भाव अपनी भूमिका के मुताबिक बने रहें।'

एक साहित्यिक कहानी पर दांव खेलने वाले निर्माता विनय तिवारी कहते हैं, 'मैंने उपन्यास पहले से ही पढा था। बनारस के मोहल्ला अस्सी के बहाने यह हमारे समय की सबसे जादुई कहानी मुझे लगती है और संयोग देखिए कि डा. द्विवेदी यह फिल्म निर्देेशित करना चाहते थे और मैं चाहता था कि अपनी कंपनी की पहली फिल्म की शुरूआत इसी कहानी से करूं।'

काशीनाथ सिंह कहते हैं, 'हिंदी लेखकों में बहुत लोगों ने मुंबई जाकर सिनेमा में लिखने की कोशिश की, जिनमें प्रेमचंद भी शामिल हैं, लेकिन शायद ही कोई हो, जो अपमानित होकर ना लौटा हो, या कड़वे अनुभव लेकर नही आया हो। ऎसे में इन लोगों को लेखक के प्रति आदर बेहतर है।' काशीनाथ सिंह यह भी कहते हैं कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि इस उपन्यास पर फिल्म बनेगी। लिखते समय उनकी मंशा यह रही कि वे उपन्यास के परंपरागत ढांचे को तोड़े जिसमें संस्मरण, यथार्थ और कल्पना के साथ कथा तžव रखा।

'यथार्थ को रचनात्मक बनाना पड़ता है। मैंने असली लोगों के पात्र रचे और वे जिधर जा रहे थे, उन्हें जाने दिया। इस तरह आप कह सकते हैं मैं किसी एक पात्र में नहीं हूं, थोड़ा थोड़ा सब में हूं।' लेखन में विचारधारा के आरोपण पर वे कहते हैं, 'मैं अकसर समाज को बदलने की इच्छा रखने वाले विद्रोही लेखक के रूप में अपनी कहानियों में रहा लेकिन रूसी समाजवाद के विघटन के बाद जो भरोसा था, वह हिला और उसका पूरा दबाव भी काशी का अस्सी के पात्रों पर आया। हालांकि लिखने के दौरान मैं मार्क्सवादी बना रहा और मुझे यह भी लगता रहा कि सारी राजनीतिक पार्टियां अब एक जैसी हो गई हैं।' डा. द्विवेदी कहते हैं, लेखक की यह दुविधा हमारे नायक में भी है। नए-पुराने के द्वंद्व हैं। आस्था का संकट है। दुनिया बदल रही है। उपन्यास की मूल आत्मा फिल्म में है।

फिल्म को एक हिस्सा मुंबई में सैट लगाकर किया गया। पप्पू की दुकान से सारा सामान खरीदकर उसे असली लुक देने की कोशिश की गई। नामवर सिंह ओर काशीनाथ सिंह ने जब मुंबई जाकर सैट देखा था तो वे अवाक थे कि किस तरह बनारस की गलियां हूबहू वहां खड़ी कर दी गई हैं। और बाकी हिस्सा बनारस में शूट हुआ। निर्देशक कहते हैं, आप ही सोचिए क्या गंगा और बनारस के घाटों को कोई भी विकल्प हो सकता है। हमें पता था कि एक तो विषय ऎसा है और दूसरा हमारा राजनीतिक माहौल ऎसा हो गया है कि आप सोच नहीं सकते कि कब क्या हो जाए लेकिन अच्छा यह है कि बनारस के लोगों ने हमें पूरी मदद की।

और इस पूरे फिल्मी माहौल के बीच बनारस के सब लोग मस्त हैं। घाट पर बच्चे कुछ फिरंगी महिलाओं को अपने दीपक बेचने की फिराक में पीछे लगे हैं। वे मुस्कराते हुए उन्हें पीछे कर रही हैं। वे सब दोस्त हो गए हैं। वे बच्चे लपकों की तरह नहीं हैं। तत्काल समझ में आ जाता है कि वे विलायती बालाएं ओर देसी बच्चे आपस में एक दूसरे को पहले से ही जानते हैं, वे हिंदी बोलते हुए उन्हें आश्वस्त करती हैं, 'आज नहीं, कल खरीदेंगी।' और बच्चे फुदकते हुए नए ग्राहक को ढूंढने लगते हैं। सिगरेट के सुट्टे लगाती लड़कियों की ओर हमारा मोबाइल कैमरा देखकर एक लोकल गाइड कहता है,

'वाई आर यू टेकिंग पिक्स।' और हम कहते हैं, 'अपना काम करो भाई।' उसने हमारी शिकायत की है उन्हीं लड़कियों और लड़कों से, 'गायज, दे आर टेकिंग योर स्नैप्स।' लड़कियां हमें अपने फोटो दिखाने को और डिलीट करने को कहती हैं और कारण पूछा तो बताया गया कि वे फिल्म की यूनिट का हिस्सा हैं। उन्हें डायरेक्टर ने मना किया है कि वे उनकी अनुमति के बिना किसी को फोटो नहीं खींचने देंगी।

अस्सी घाट पर चाट वाले ने हमारे लिए चाट बनाई है। उससे पानी मांगा तो उसने यह काम अपने वेटर को बोला है। वेटर टाल गया है। तीन चार बार याद दिलाने पर उसने खुद जग उठाया है। पानी भरा है और यह क्या? गटागट खुद पी गया है। हमारी हंसी नहीं थम रही है, 'ये बनारस है, ग्राहक बैठा है और तुम खुद पानी पिए जा रहे हो।' और उसने मुस्कराकर जबाब दिया है, 'तो क्या हो गया भइया, हमको भी तो प्यास लगी है। आप अब पी लीजिए।' और उसने जग हमें थमा दिया।
दिनेश पारीक

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

माँ , तुमने महिषासुर का संहार किया

माँ , तुमने महिषासुर का संहार किया
नौ रूपों में अपने
नारी की शक्ति को समाहित किया !
अल्प बुध्धि - सी काया दी
वक्त की मांग पर तेज़
जब-जब अत्याचार बढ़ा
तुमने काया कल्प किया !
रक्त में ज्वाला
आँख में अग्नि
मस्तिष्क में त्रिशूल बन धधकी !
कमज़ोर नहीं है नारी
जाने है दुनिया सारी
माँ तेरी कृपा है हर उस घर में
जहाँ जन्म ले नारी !!!
पहले पहल किसने छुई?
किया किसने अविष्कार धागे के साथ
तेरा रिश्ता? तुम पहले पहल
कैसी थी और अब से कितनी अलग?
कोई औरत सी रही होगी अलाव के पास चमड़े और पत्ते
इसके पहले कि हो बंर्फबारी
हो जाए हालत बद से बदतर
मर्द जबकि लड़ते थे
पत्थरों के हथियारों से जंगलों की लड़ाई
एक औरत
लड़ रही थी सुई से
बुरे मौसमों के विरुध्द
उस औरत को भी
नहीं मालूम
कि सी दी थी
उसने कितनी बड़ी
आदिम सभ्यता की
चादर
वह इसलिए
नहीं सोई
कि उसके मर्द
बच्चों के लिए
गुफा में
सिमटी रहे
थोड़ी-सी गर्मी
नींदों में भी
सुनाई न पड़े
दु:खों की गुर्राहट
फिर पीले पत्ते उड़े
जंगल
अग्रि-पर्वतों में तब्दील हुए पत्ते झुलसे
स्वप् राख हुए तब भी औरत
बना रही थी एक नक्षत्राकार तंबू
बिन थके
बिन थके
आखिरकार उसने बुन ही डाला
संसार का ताना-बाना टांक दिए
आकाश में खरबों सलमे-सितारे
उससे इसको जोड़ा इससे उसको
और पूरी पृथ्वी को ही
उसने बना डाला उष्णऊनों का
धड़कता हुआ गोला शुरु से
जो पास रही औरत के वह थी यही एक
नन्हीं सुई ऊंगलियों के
पोरों में असंख्य बार चुभी, छलकी आंखें
पर न औरत रुकी न ही पृथ्वी...

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मेरी बिटिया

उसके होने से ही
पावन है घर-आँगन,
उसकी चंचल चितवन
मोह लेती हम सबका मन,

वो रूठती
तो रुक जाते हैं
घर के काम सभी,
वो हँसती

तो झर उठते हैं
हरसिंगार के फूल,
महक उठता है
घर का कोना-कोना,
जाने कैसे हैं वे लोग
जो बेटियों को
जन्मने ही नहीं देते
हम तो सह नहीं सकते
अपनी बेटी का
एक पल भी घर में न होना .

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

एक स्त्री के बारे में....?

क्या तुम जानते हो

क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत?

घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी
जमीन के बारे में बता सकते हो तुम?

बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता?

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में किस तरह एक ही समय में
स्वयं को स्थापित और निर्वासित करती है एक स्त्री?

सपनों में भागती एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में अपने-आपसे लड़ते?

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के मन की गाँठ खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने उसके भीतर का खेलता इतिहास?
पढ़ा है कभी उसकी चुप्पी की दहलीज पर बैठ
शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को?

उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर?

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण?

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

अगर नहीं!
तो फिर क्या जानते हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में....?

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

मेरी कविताओं का संग्रह: ब्लॉग पे सेक्स की जानकारी नहीं बल्कि सेक्स केस कि...

मेरी कविताओं का संग्रह: ब्लॉग पे सेक्स की जानकारी नहीं बल्कि सेक्स केस कि...: मेरे प्यारे मित्रो और साथियों पहले तो मैं आप सब से माफ़ी चाहता हु की मैं काफी दिनों के बाद ब्लॉग जगत में आया हु किसी अन्य जरुरी काम की वजह ...

प्रेम कहानियां यूं ही नहीं बनतीं (कोमल )

जब भी प्यार, इश्क की बात होती है तो हम खुद को मजनूं या रांझा का रिश्तेदार समझ लेते हैं. हर किसी की लाइफ में इन प्रेम कहानियों की खास इंपोर्टेंस होती है. किसी ने आपका दर्द पूछा नहीं कि आप तुरंत अपनी प्रेमकथा सुनाने को तैयार हो जाते हैं. हर किसी का अपना-अपना दर्द होता है, लेकिन इस दर्द को बयां करके जो सूकून इंसान को मिलता है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. आज मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. दूसरी सिटी में रहने के कारण मेरा फ्रैंड सर्किल काफी सीमित है. बस यूं ही टहलते हुए मैं एक पार्क तक चली गई. इस पार्क को दून के रिपोटर्स का अड्ढा भी कहा जाता है. यहां पर जर्नलिज्म के कुछ सीनियर्स हमेशा ही मिल जाया करते हैं. यहां पर पहुंची तो एक रीजनल न्यूजपेपर के दो रिपोर्टर यहां पहले से मौजूद थे. आमतौर पर इनसे मैं फील्ड में मिल चुकी हूं, लेकिन बातचीत कम ही होती है. मुझे लगा चलो थोड़ी देर यहीं गपशप कर ली जाए. दोनों जर्नलिस्ट बहुत सीनियर हैं. बात ही बात में चर्चा मेरी शादी तक आ पहुंची. दोनों का कहना था कि ‘कोमल हर काम समय पर होना चाहिए, तुम भी जल्दी शादी कर लो’. मैंने हामी भरी और यूं ही कह दिया कि हां भईया जी जल्द ही शादी कर लूंगी. बात यहां से मुड़ी और प्यार पर आ गई. मैंने उनमें से एक सीनियर से उनके परिवार के बारे में पूछा तो पहले तो वह चुप रहे, लेकिन उनके दूसरे साथी ने कहा कि यह इस बुढ़ापे में भी अपनी लवर का वेट कर रहे हैं. पहले तो मुझे यह मजाक लगा, लेकिन यह मजाक नहीं था. इन सीनियर की उम्र अब चालीस साल क्रास कर चुकी है. उन्होंने बताया कि वह कुमांऊ के एक गांव से बिलांग करते हैं, वहीं पर वह लड़की रहा करती है जिसे उन्होंने प्यार किया. कुमांऊनी ब्राह्म्ण होने के कारण पैरेंट्स ने दूसरी कास्ट की लड़की से शादी करने की इजाजत नहीं दी. बस फिर क्या था मैंने सोच लिया कि अब उसका इंतजार ही करूंगा. मुझे मेरे स्कूटर से बहुत प्यार था और उसकी के सहारे मैं सिटी की गलियां नापा करता था. यह स्कूटर क्योंकि मेरे पापा ने दिया था, इसीलिए मैंने अपने निर्णय के बाद इस स्कूटर को कभी नहीं छुआ. इसके बाद में देहरादून आ गया. कई साल यूं ही बीत गए हैं, लेकिन मैं अकेला ही रहा. उस लड़की को देखे हुए छह साल हो गए हैं, चार साल से उसकी आवाज नहीं सुनी. बावजूद इसके यह रिश्ता इतना गहरा है कि मैं उसकी हर खबर रखता हूं. कोई टेलीफोनिक कम्युनिकेशन नहीं है, लेकिन मुझे पता है कि उसने भी शादी नहीं की. हमेशा चुप रहने वाले इन सीनियर जर्नलिस्ट की बातें सुनकर मैं सोच में पड़ गई कि क्या सचमुच कोई किसी का इतना लंबा इंतजार कर सकता है. बावजूद इसके वह बहुत आशावान हैं और उन्होंने मुझे बताया कि कोमल इस बार मैं जब गांव जाऊंगा तो उससे जरूर मिलूंगा. तुम प्रेयर करना की सब ठीक हो जाए…..

नारी किसी से न हारी

नारी किसी से न हारी 

Pariwar Special articleईश्वर की रची सर्वाधिक सुंदर कृति है 'स्त्री'। प्रकृति ने उसे कोमल अवश्य बनाया है , पर उसने  परंपराओं से बाहर  निकलकर मील के पत्थर कायम किए हैं। लेकिन अपनी खास पहचान बनाने के बाद भी कदम-कदम पर उसके लिए चुनौतियां हैं। कभी वह इनसे उबरकर पंख लगाकर उड़ती है तो कभी संघर्ष में उलझ जाती है। आइए, उन्हीं से जानते हैं कि मुश्किलों से भरा यह सफर उन्होंने कैसे तय किया।

पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में सामंजस्य
एक कामकाजी महिला के नजरिए से मेरा मानना है औरतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती  अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में बैलेंस बनाकर चलना है। अकेली औरत घर को संभालें या ऑफिस को। ऎसे में प्राथमिकताएं तय करना मुश्किल हो जाता है। महंगाई के मौजूदा दौर में घर-गृहस्थी को चलाने के लिए पति-पत्नी दोनों का कमाना जरूरी हो गया है। महिलाएं भाग्यशाली हैं कि कई काम जैसे टीचर, रिसेपशनिस्ट आदि के लिए उन्हें उपयुक्त माना जाता है पर चूंकि पुरूषों की भांति उनकी जिम्मेदारी केवल दफ्तर तक सीमित नहीं है इसीलिए योग्य होते हुए भी वे कॅ रियर के क्षेत्र मे दोहरी जिम्मेदारी के चलते पिछड़ जाती हैं। घर और बाहर के काम में सामंजस्य बैठाना ही बहुत बड़ी चुनौती है।      

अमरप्रीत सब्बरवाल
नेशनल ट्रेनर

खूबसूरती है पैमाना
स्त्री को हमेशा सौंदर्य के मापदंडों पर तोला जाता है। वह कितनी भी अक्लमंद या टैलंटेड क्यों न हो, पुरूष उसके दैहिक सौंदर्य से ही उसे परखते हैं। एक लड़की का खूबसूरत होना उसके विवाह की पक्की गारंटी समझा जाता है। लड़का चाहे कैसा भी हो, पर पत्नी उसे सुंदर ही चाहिए। ऎसे में कितनी लड़कियों के ब्याह नहीं होते या उनमें से ज्यादातर मन मे कंुठाएं पाल लेती हैं या हीनभावना से ग्रसित हो जाती हैं। जबकि बेहद खूबसूरत çस्त्रयों के पति अक्सर असुरक्षित महसूस करते है,ं आत्मकुंठित हो जाते हैं। कार्यस्थलों पर, जहां मापदंड आकर्षक व्यक्तित्व का होता है, वहां अक्सर छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न, अनैतिक संबंध भी इसी मनोदशा के परिचायक हंै। 


महंगाई डायन खाए जात है
एक महिला के समक्ष आज सबसे 
बड़ी चुनौती घर का खर्च चलाने की है। बढ़ती महंगाई ने मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ कर रख दी है। महीने के आखिर तक आते-आते तो एक-एक रूपया सोच समझकर खर्च करना पड़ता है। महीने के आखिरी दिन इसी जद्दोजहद में गुजर जाते हैं कि सीमित आय में घर का खर्च कैसे चलाएं। जरूरतें तो दिन-ब-दिन बढ़ती ही हैं पर कीमतों में इजाफ ा होने से बजट गड़बड़ा रहा है। लिविंग स्टैंडर्ड मेनटेन करना मध्यम वर्ग के लिए मुश्किल हो 
गया है।

शिवांगी जैन
गृहिणी

एक परिघि है
मेरा मानना है कि एक औरत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है अपना कॅरियर बनाना। कॅरियर के लिहाज से आज भी महिला के पास बहुत सीमित विकल्प हैं। कामकाज के सिलसिले में कई बार घर से बाहर आने-जाने और रहने वाली लड़कियों के चरित्र पर उंगली उठाई जाती है। चूंकि स्त्री हर कहीं रह नहीं सकती, जा नहीं सकती, ठहर नहीं सकती, ये सीमाएं उसे कमजोर बना देती हैं और वो अपनी काबिलियत सिद्ध नहीं कर पाती। जब वह पुरूष प्रधान समाज के मापदंडों पर खरा उतरने का प्रयास करती है तो उसे कई समझौतेे करने पड़ते हैं। बराबरी का हक देना तो दूर, समाज के कर्णधार लोग उसे हर क्षेत्र में दबाना चाहते हैं

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

हिन्दी ब्लौगिंग को समृद्ध कीजिये

मसला कोई भी और कितना भी बिगड़ा हुआ क्यों न हो लेकिन वह जब भी सुलझेगा , बातचीत से ही सुलझेगा .
यह एक अहम सूत्र है.
ब्लॉगर्स मीट वीकली का मकसद यही है कि फासले कम हों और गलतफहमियां दूर हों .
आप सभी के विचार अमूल्य हैं , हिन्दी ब्लौगिंग को समृद्ध करने में इनका उपयोग करें.

 ब्लॉगर्स मीट वीकली (11)

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

“इस्लामी आतंकवाद” की फ़र्ज़ी धारणा

Hindi translation of bestseller "Who Killed Karkare?"
Book:
करकरे के हत्यारे कौन ?
भारत में आतंकवाद का असली चेहरा
एस. एम. मुशरिफ़
by S.M. Mushrif
[Former, IG Police, Maharashtra]
368 pages p/b
Price: Rs 250 / US $15 $20
ISBN-10: 81-7221-038-8
ISBN-13: 978-81-7221-038-0
Year: 2010
Publishers: Pharos Media Publishing Pvt Ltd
368 पन्‍नों की यह पुस्तक भारत में “इस्लामी आतंकवाद” की फ़र्ज़ी धारणा को तोड़ती है।

यह उन शक्‍तियों के बारे में पता लगाती है जिनका महाराष्ट्र ए टी एस के प्रमुख हेमंत करकरे ने पर्दाफ़ाश करने की हिम्मत की और आख़िरकार अपने साहस, और सत्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की क़ीमत अपनी जान देकर चुकाई।

एक पुस्तक जो साफ़ तौर पर यह कहती है कि ये “ब्राह्‌मणवादियों” का “ब्राह्‌मणवादी आतंकवाद” है, इस्लामवादियों का “इस्लामी आतंकवाद” नहीं...

See More : http://hbfint.blogspot.com/2011/09/blog-post_689.html

एक स्त्री के बारे में....?

बस यही की सदियों से विवाह नाम के व्यापर से खरीदी हुई वो वस्तु ,जिसे ता उम्र अपनी तमाम
ज़िन्दगी का किस्त धीरे धीरे और भी रिस्तो में बंध कर चुकाना पड़ता है ,
जिसका कुछ ब्याज बिस्तर पर वसूल होता है,,,,,,,,,,
कुछ रसोई में ......आज भी .अधिकांश पुरुषों के लिए नारी को बस यही तक
का उपयोग माना जाता है ..........

सोमवार, 5 सितंबर 2011

“मर्ज़ी का प्यार बनाम मज़बूरी का प्यार

दोस्तों प्यार क्या है ? हरेक प्रेमी और विचारक अपनी २ समझ + रूचि और स्वभाव के अनुसार इसकी अलग -२ व्याख्या करता है ….. लेकिन एक बात तो तय है की हरेक युग में प्यार में स्वार्थीपन और त्याग + बलिदान में संघर्ष चलता रहा है …… युग के प्रभाव के अनुसार ही इसमें स्वार्थ और त्याग तथा बलिदान की मात्रा अलग -२ रही है ……
प्रेम सिर्फ देने तथा त्याग का ही दूसरा नाम है , इस बात को मानने वाले आजकल न के बराबर रह गए है ….. आजकल तो प्यार सिर्फ और सिर्फ पाने का ही नाम रह गया है ….. रूह की गहराइयों से कोसो दूर आकर्षण युक्त सिर्फ सतही प्यार ….. ऐसे प्यार का भूत दिलो दिमाग से बहुत ही जल्दी उतर जाया करता है …… ऐसे भी पति – पत्नी के जोड़ें है जिनकी की सारी की सारी उम्र साथ रहते हुए तो बीत जाती है , दर्जनों बच्चे भी हो जाते है , लेकिन अगर उनसे यह पूछा जाए की उन्होंने अपने –२ जीवनसाथी से क्या वास्तव में प्यार किया ? और अगर किया तो कितना ? …… ज्यादातर का जवाब शायद नहीं में होगा …… जब भीतर में उमंग और चाहत ही नही होगी तो प्यार कहाँ से उपजेगा ?….. हम लोग नियति के बनाए हुए रिश्तों में मजबूरी का फर्ज रूपी प्यार करते नही बल्कि उस मज़बूरी के प्यार को भी अपनी जिंदगी मान कर ढोते रहते है …..
इसका मतलब यह नहीं की मैं इस बात के हक में हूँ की सभी को प्रेम विवाह कर लेना चाहिए …… प्रेम विवाह करने वालो का तो और भी बुरा हाल है …… उनकी सफलता का प्रतिशत तो अरेंज्ड मैरिज वालो की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरता …… मेरे कहने का मतलब बस इतना भर है की आप विवाह चाहे प्रेम – विवाह करिए या फिर अपने बड़े बजुर्गो की मर्जी से ….. जिससे भी आपका नाता एक बार जुड़ जाए बस फिर उसी को अपना सब कुछ मान कर उसी में डूबकर अपने तन मन और रूह की गहराइयों से प्यार कीजिये … किसी और से सम्बन्ध रखना तो दूर की बात , किसी गैर के बारे में कोई ख्याल लाना भी आपके लिए पाप होना चाहिए ……..
मेरे कालेज के समय में जो साथी लड़के मुझसे किसी लड़की का पीछा करने और उसका घर देख आने में सहायता मांगते थे तो मैं उनसे पहले उनके इष्टदेव के नाम पर यह वचन ले लेता था की अगर उस लड़की से बात बनी तो फिर वोह शादी भी उसी से करेगा …… मैं यह देख कर हैरान रह जाता था की वोह एक सेकंड से पहले शपथ उठा लेते इश्वर के नाम की ……. वोह ज्यादातर समय मेरे साथ ही गुजारते थे , फिर भी पता नही मन के किसी कोने से यह आवाज आती थी की यह अपने वादे पर पूरा नही उतरेंगे ….. मुझको अचरज होता है की जब मुझको उनको साथी होने पर उन पर पूरा विश्वाश नही था तो आजकल की लड़किया लड़को पर किस बिनाह पर विश्वाश कर लेती है ……
शायद इसके दो ही कारण हो सकते है मेरी नजर में …. पहली बात जो जेहन में आती है की यह सच ही कहा गया है की प्यार अंधा होता है ….. जिसमे पड़कर प्रेमी अपना विवेक और सोचने समझने की शक्ति खो देते है ….. दूसरा कारण यह हो सकता है की वोह कहावत जोकि हम लोग अपने बड़े बजुर्गो से सुनते और किताबों में भी पढ़ते आये है की सुन्दर औरते मुर्ख होती है , उनकी अक्ल घुटनों में या फिर उनकी जुल्फों में निवास करती है ….. और यह बात आप सभी भली न्हंती जानते है की आजकल की छोरियों की जुल्फे रही ही कहाँ ….. तो उनकी उसी जन्मजात कमजोरी का फायदा लम्पट पुरुष अक्सर उठाया करते है , और अपना उल्लू सीधा किया करते है …… इस मामले में तो बेचारी कुदरत भी अपनी हार मान लेती है …… उस पराशक्ति ने नारी को इसी कमजोरी पर काबू पाने के लिए और दुनिया का सामना करने के लिए उसको छठी इंद्री रूपी सजगता से नवाजा है जिसको की आजकल हम सिक्स्थ सैंस के नाम से भी जानते है ……
लेकिन आजकल के जमाने में नारियों का यह गुण दब गया है , मुझको तो यही डर है की कम होते -२ कहीं यह एक दिन बिलकुल ही खत्म ना हो जाए …… चाहे हम कितना भी तरक्की क्यों न कर ले , आदमी कितना भी क्यों न गिर जाए , नारी कितनी भी पतित क्यों न हो जाए , लेकिन फिर भी मेरे मन में यह आस और विश्वाश है की वोह दीन कभी नहीं आएगा , जब नारी प्रकर्ति द्वारा अपने इस गुण रूपी हथियार से वंचित हो जायेगी…

रविवार, 4 सितंबर 2011

शिक्षक दिवस पर एक ख़ास रिपोर्ट ; ब्लॉगर्स मीट वीकली (7) Earn Money online


हाजी अब्दुल रहीम अंसारी साहब
कागज़ी समाजसेवी सबक़ लें ... 

 समाचार पत्रों में आप अक्सर समाजसेवियों के बारे में पढ़ते रहते है. किन्तु जो समाजसेवी समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते है उसके पीछे कितनी सतनी सच्चाई होती है. शायद हर पत्रकार जानता है. ऐसे समाजसेवियों को आईना दिखने के लिए हैं.  हाजी अब्दुल रहीम अंसारी, एक ऐसा नाम जो उन लोंगो के लिए के लिए प्रेरणा श्रोत है जो खुद को समाजसेवी कहलाने के लिए परेशान रहते है किन्तु समाजसेवा का कोई कार्य नहीं करते. 

मूलतः संत रविदासनगर भदोही जनपद के काजीपुर मुहल्ले के रहने वाले अब्दुल रहीम अंसारी नगर के अयोध्यापुरी प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कई वर्षो तक  कार्यरत रहे. २००७ में वे इसी विद्यालय से अवकाश प्राप्त किये, दो दिन घर पर रहने के बाद उन्हें एहसास हुआ की वे घर पर खाली नहीं रह सकते. लिहाजा फिर पहुँच गए उसी स्कूल जहाँ बच्चो को पढ़ाते थे, उन्हें देखते ही बच्चे चहक उठे. उन्होंने विद्यालय के प्रधानाचार्य से पढ़ाने की इच्छा जाहिर की और नियमित रूप से विद्यालय आकर पढ़ाने लगे. यही नहीं विद्यालय का लेखा जोखा पहले उन्ही के पास रहता था, दुबारा यह जिम्मेदारी उन्हें फिर सौंप दी गयी.  २००९ में उन्होंने हज भी किया. पांच वक़्त के नमाज़ी अब्दुल रहीम अभी तक नियमित रूप से विद्यालय  आकर बच्चो को शिक्षा देते रहते है. उन्हीं के दिशा निर्देश पर पूरा विद्यालय परिवार चलता है. एक बार विद्यालय के प्रधानाद्यापक और सहायक अध्यापक राजीव श्रीवास्तव ने उन्हें अपने वेतन से कुछ पारिश्रमिक देने की बात कही तो वे  भड़क उठे.  कहा आज भी सरकार उन्हें आधी तनख्वाह देती है. हराम का लेना उन्हें पसंद नहीं जब तक शरीर साथ देगा वे बच्चों को नियमित शिक्षा देंगे. यही नहीं वे होमियोपैथिक के अच्छे जानकर भी है. विद्यालय के बच्चे जब बीमार होते हैं तो वही दवा देते हैं.. यही नहीं जो भी उनके पास इलाज के लिए पहुँचता है. उसे भी दवा देते है. और इस दवा का वे कभी एक पैसा तक नहीं लेते. आज वे अपने मुहल्ले में वे सम्मान की दृष्टि से देखे जाते है.  आज जहा लोग पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते है. ऐसे में वे सम्मान जनक पात्र ही नहीं वरन पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत  है.
सच इंसानियत, समाजसेवा का जज्बा हर इन्सान में होना चाहिए चाहे वह किसी भी धर्म का हो. ऐसे महान व्यक्तित्व को मैं सलाम करता हूँ. यदि ऐसे लोंगो का अनुसरण लोग करें तो जरा सोचिये समाज का क्या स्वरूप होगा. 

हाजी अब्दुल रहीम साहब के बारे में हमें यह सारी जानकारी हमारे मित्र हरीश सिंह जी ने दी है जो कि ख़ुद भदोही में ही रहते हैं। यह जानकर अच्छा लगता है कि हमारे बीच  अभी ऐसे  लोग मौजूद हैं जो कि अपने फ़र्ज़ पहचानते हैं और उसे अदा करते हैं और यह तो सोने पर सुहागे जैसा सुखद है कि यह सब करने वाला एक मुसलमान है।
हमारी दुआ है कि मुसलमानों को विशेष रूप से हाजी जी के अमल से प्रेरणा मिले और यूं तो वह हरेक के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं ही।
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आज सबसे पहले हाजी अब्दुल रहीम साहब का ही ज़िक्र किया गया है। जिसे आप इस लिंक पर देख सकते हैं- 

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

एक स्त्री के बारे में....? part 2

मैं देख रहा हूँ कि जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है

चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित और तमगों से लैस
सीना फुलाए हुए सिपाही महाराज की जय बोल रहे हैं.

वे महाराज जो मर चुके हैं
महारानियाँ जो अपने सती होने का इंतजाम कर रही हैं
और जब महारानियाँ नहीं रहेंगी तो नौकरियाँ क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियाँ कर रही हैं.

मुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता नौकरानियों की होती है
जिनके पति ज़िंदा हैं और रो रहे हैं

कितना ख़राब लगता है एक औरत को अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना
जबकि मर्दों को रोती हुई स्त्री को मारना भी बुरा नहीं लगता

औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं
औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं
औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं
मरद इतनी जोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूँगा.

रविवार, 21 अगस्त 2011

ब्लॉगर्स मीट वीकली (5) Happy Janmashtami

Saleem Khan & Anwer Jamal Khan
प्रेरणा अर्गल जी और डॉ.अनवर जमाल जी की ये संयुक्त प्रस्तुति बहुत ही सार्थक पहल है और जिस शालीन ढंग से यहाँ ब्लोग्स की पोस्ट की चर्चा की जाती है वह सारे ब्लॉग जगत में सराहनीय है.सही कहा कि जब त्यौहार साथ साथ हो सकते हैं तो हम उन्हें साथ साथ मनाने से गुरेज़ क्यों करें.हम तो अपने बचपन से ही सारे त्यौहार साथ साथ मनाते रहे हैं और यदि ईश्वर की और इस धरती पर बसे सत्पुरुषों की कृपा दृष्टि यूँ ही बनी रही तो सारी जिंदगी हम मिल जुल कर ही अपने जीवन को हंसी ख़ुशी बिताना चाहेंगे.

ब्लॉगर्स मीट वीकली (5) Happy Janmashtami & Happy Ramazan

बुधवार, 27 जुलाई 2011

एक स्त्री के बारे में....?

क्या तुम जानते हो

क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत?

घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी
जमीन के बारे में बता सकते हो तुम?

बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता?

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में किस तरह एक ही समय में
स्वयं को स्थापित और निर्वासित करती है एक स्त्री?

सपनों में भागती एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में अपने-आपसे लड़ते?

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के मन की गाँठ खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने उसके भीतर का खेलता इतिहास?
पढ़ा है कभी उसकी चुप्पी की दहलीज पर बैठ
शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को?

उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर?

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण?

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

अगर नहीं!
तो फिर क्या जानते हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में....?

शुक्रवार, 20 मई 2011

कभी भी हो सकता है भारत-पाक युद्ध

इस्लामाबाद। भारत और पाकिस्तान की सैन्य सरगर्मियों को देखकर ऐसा लगता है कि दोनों देश युद्ध की तैयारी में जुटे हैं। दोनों देशों के नेताओं और सैन्न अधिकारियों के बयान भी युद्ध भड़काने वाले हैं। आईएसआई चीफ शुजा पाशा के भारत पर हमले की तैयारियों की धमकी के एक दिन बाद सोमवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों से बैठक की। लादेन की मौत के बाद गिलानी ने पहली बार सेना प्रमुखों के साथ बैठक की। इसमें भारत के साथ युद्ध होने पर हमले और बचाव के मुद्दे पर तमाम बातें हुईं। इधर, भारत ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी है। पाकिस्तान सीमा के पास उत्तरी राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में भारत ने थलसेना और वायुसेना के तालमेल से एक वृहद अभ्यास किया है। कहने को यह थलसेना का नियमित सालाना अभ्यास है, लेकिन मौजूदा माहौल में इस सैन्य अभ्यास का विशेष रणनीतिक महत्व है। इतना ही नहीं कई कट्टरपंथी संगठन भी भारत के खिलाफ युद्ध या कहें आतंकी दहशत फैलाने की तैयारी कर रहे हैं। सोमवार को ही जमात-उद-दावा ने भी रैली की। जमात के प्रमुख और मुंबई में हुए 26/11 हमले का मुख्य आरोपी हाफिज सईद ने एक बड़ी रैली कर भारत के खिलाफ जहर उगला। हाफिज सईद ने कहा कि भारत या अमेरिका ने फिर ऐबटाबाद जैसी कार्रवाई की, तो इन देशों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया जाएगा। लादेन की मौत के बाद लगता है कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान युद्ध की तैयारी कर रहा है। लादेन की मौत के बाद पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी ने सेना के तीनों अंगों के प्रमुख के साथ बैठक की। सुत्रों के मुताबिक, बैठक में सबसे ज्यादा आईएसआई चीफ शुजा पाशा के बयान पर चर्चा की गई। पाशा ने रविवार को कहा था कि भारत के खिलाफ हमले की तैयारी पूरी है और सारी योजना बना ली गई है। हालांकि, सोमवार की शाम ही भारत ने पाशा के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया जताई। भारत सरकार ने पाशा के इस बयान पर हैरत जताई। हमारे सहयोगी चैनल टाइम्स नाउ के सूत्रों के मुताबिक भारत सरकार ने पूछा कि आखिर शुजा पाशा ऐसा बयान देने वाले होते कौन हैं। गौरतलब है कि भारत के सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने हाल ही में कहा था कि भारत भी सीमा पार मौजूद आतंकवादियों की पनाहगाहों को नेस्तनाबूद करने के लिए अमेरिका सरीखे ऑपरेशन करने की क्षमता रखता है। क्यों इतना आक्रमक हो गया है पाकिस्तान अल कायदा सरगना लादेन के खिलाफ की गई अमेरिकी कार्रवाई के बाद पाकिस्तान घबरा गया है। इसका कारण है कि उसे यह डर सता रहा है कि भारत भी इस तरह की कार्रवाई कर सकता है। गौरतलब है कि भारत में कत्लेआम मचाने वाले कई आतंकी अब भी पाकिस्तानी सरजमीं पर मौजूद हैं। इसीकरण पाकिस्तान गिदड़ भभकी देकर भारत को इस तरह के कार्रवाई करने से रोक रहा है। कहीं पिद्दी पाकिस्तान के पीछे अमेरिका तो नहीं पाकिस्तान अपनी ताकत जानता है। फिर भी लगातार भारत को धमकी दे रहा है। कहीं इसके पीछे अमेरिका तो नहीं? विदेश मामलों के कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि हो सकता है लादेन की सूचना देने में पाकिस्तान का भी हाथ हो। वह कार्रवाई में भाग नहीं लिया हो, लेकिन लादेन को मरवाने में उसका हाथ जरूर रहा होगा। ऐसा संभव है कि लादेन के बदले पाकिस्तान ने अमेरिका से गुप्त समझौता कर लिया हो और कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी मिल गया हो। मौका परस्त पाकिस्तान ऐसा कर भी सकता है। अब लादेन पाकिस्तान के लिए किसी काम का नहीं रह गया था। वह उसे अमेरिका को सौंप कर कश्मीर मामले पर अमेरिकी सहयोग हासिल कर लिया हो। इन सब परिस्थितियों में भारत को सतर्क रहने की जरूरत है।

रविवार, 15 मई 2011

अमेरिका का दोगलापन,कहा 9/11 और 26/11 में कोई तुलना नहीं

9/11 and 26/11 attackओसामा बिन लादेन के मौत के बाद कई राज बेपर्दे हो गये। पाकिस्‍तान द्वारा आतंकवा‍दियों को शरण देने बात सामने आ गई तो अमेरिका ने यह साबित कर दिया कि वह अपने दुश्‍मनों से बदला लेने में कभी पीछे नहीं हटता। मगर इन सब बातों के बाद भी एक बात और समाने आ गई है और वह है अमेरिका का दोगलापन और दोहरा चरित्र। अमेरिका ने पाकिस्‍तान के अंदर घुसकर इकतरफा और मनमर्जी कार्रवाई करते हुए 9/11 को अपने देश पर हुए हमले का बदला ले लिया। अगर ऐसी ही कार्रवाई 26/11 के दोषियों के लिये भारत करता है तो अमेरिका उसका साथ नहीं देगा।
यह बात सिर्फ दिमागी उपज नहीं है बल्कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने खुद स्‍वीकार किया है। उनसे पूछा गया कि क्या भारत या दूसरे देश ऐसी कोई कार्रवाई करें तो अमेरिका उनका समर्थन करेगा ? विदेश मंत्रालय प्रवक्ता मार्क टोन ने इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया। इस प्रकार के सवालों के मद्देनजर ही अमेरिका अपने देश पर हुए 9/11 हमले और मुंबई पर हुए 26/11 हमले के बीच कोई भी समानता बताने से बच रहा है।

सोमवार, 9 मई 2011

एफबीआई की नई सूची के मुताबिक ये हैं दुनिया के बड़े आतंकवादी

एडम
याहिए गदाहन:
उम्र 32 साल, ओरेगन में जन्‍मा और कैलिफोर्निया में पला-बढ़ा। 17
साल की उम्र में इस्‍लाम धर्म कबूल किया। गदाहन पर देशद्रोह और अल कायदा के नेटवर्क
को साजो सामान मुहैया कराने के आरोप। अल कायदा के लिए कई आतंकी गतिविधियों को अंजाम
देने के आरोप। गिरफ्तारी पर 10 लाख डॉलर का ईनाम।

डेनियल एंड्रियस सैन
डिएगो:
उम्र 33 साल, अमेरिकी नागरिक और कम्‍प्‍यूटर नेटवर्क संचालित करने में
माहिर। सैन डिएगो पर 2003 में सैन फ्रांसिस्‍को में दो इमारतों में बम धमाके का
आरोप। एफबीआई के मुताबिक डिएगो ने जानवरों के अधिकार के लिए लड़ रहे अतिवादी
संगठनों से जुड़ाव। गिरफ्तारी पर ढाई लाख डॉलर का ईनाम।

अयमान अल
जवाहिरी
:
उम्र 59 साल। मिस्र मूल के नागरिक अल जवाहिरी पर तंजानिया और के‍न्‍या
में अमेरिकी दूतावासों में 7 अगस्‍त 1998 को हुए बम धमाकों की साजिश का आरोप है।
पेशे से डॉक्‍टर अल जवाहिरी इजीप्टियन इस्‍लामिक जिहाद का संस्‍थापक है और अब यह अल
कायदा से जुड़ा है। अल जवाहिरी को अल कायदा का ऑपरेशनल कमांडर माना जाता है और अब
बिन लादेन की मौत के बाद इसे ही अल कायदा का सर्वेसर्वा माना जा रहा है। अमेरिकी
सरकार ने इसकी गिरफ्तारी पर ढाई करोड़ डॉलर का ईनाम रखा है।

फहद मोहम्‍मद
अहमद अल कुसो:
उम्र 36 साल, यमन का ना‍गरिक अल कुसो 12 अक्‍टूबर 2000 को अदन
में अमेरिकी नौसेना के पोत यूएसएस कोल पर विस्‍फोट मामले का आरोपी है जिसमें 17
अमेरिकी नाविकों की मौत हो गई थी। इसकी गिरफ्तारी पर 50 लाख डॉलर का ईनाम
है।

जमीन अहमद मोहम्‍मद अली अल बदावी: उम्र-50 के करीब, अल बदावी पर
भी 12 अक्‍टूबर 2000 को अमेरिकी पोत पर हुए धमाकों का आरोप है। अल बदावी को यमन के
अधिकारियों ने उस वक्‍त पकड़ लिया था जब वह अप्रैल 2003 से जेल से भाग रहा था। उसे
मार्च 2004 में फिर से पकड़ा गया लेकिन 3 फरवरी 2006 को फिर से भाग निकला। उसकी
गिरफ्तारी पर 50 लाख डॉलर का ईनाम है।

मोहम्‍मद अली हमीदी: उम्र 46 साल, हिजबुल्‍ला का सदस्‍य। विमान अपहरण और
अमेरिकी नौसैनिक की हत्‍या के आरोप। ईनाम 50 लाख डॉलर।

अली अतवा: उम्र 50 साल, यह भी हिजबुल्‍ला से जुड़ा। अली अतवा पर भी हमीदी
जैसे आरोप। ईनाम 50 लाख डॉलर।

हसन इज्‍ज-अल-दीन: उम्र 47 साल, हसन भी हिजबुल्‍ला का सदस्‍य और इस पर भी
हमीदी और अल अतवा के साथ आरोपी। ईनाम 50 लाख डॉलर।

अब्‍दुल्‍ला अहमद अब्‍दुल्‍ला: उम्र 47 साल, मिस्र मूल के अब्‍दुल्‍ला पर
तंजानिया और केन्‍या में अमेरिकी दूतावासों पर हुए बम धमाके के आरोप। ईनाम 50 लाख
डॉलर।


रविवार, 8 मई 2011

लादेन को दफनाने की जगह का नाम किया 'शहीद' सागर

ओसामा बिन लादेन को उत्तरी अरब सागर में जिस स्थान पर दफनाया गया है, उसे कट्टरपंथियों ने ‘शहीद सागर’ नाम दे दिया है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के मुस्लिम धर्मगुरु अब्दल हकीम मुराद ने कहा कि अमेरिका की सुपुर्द-ए-आब (समुद्र में दफनाने) की नीति से वह खुद ही विवादों में फंस गया है।

रेडियो 4 के एक कार्यक्रम में मुराद ने कहा कि स्मारक बनने से बचाने के लिए लादेन को समुद्र में दफनाया गया, लेकिन अब कट्टरपंथियों ने उसे ही शहीद सागर नाम दे दिया है। अमेरिका उन्हें नहीं रोक सकता। दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी से जुड़े वकीलों ने गुरुवार को पेशावर उच्च न्यायालय में अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के लिए ‘नमाज-ए-जनाजा’ पढ़ा।

‘इस्लामिक लॉयर्स मूवमेंट’ ने उच्च न्यायालय की लॉन में गुलाम नबी की अगुवाई में ‘गायबाना नमाज-ए-जनाजा’ पढ़ा। जमात-ए-इस्लामी से जुड़े करीब 120 वकीलों ने इसमें भाग लिया। इस दौरान वकीलों ने ‘अमेरिका के लिए मौत’ और ‘ओसामा जिंदाबाद’ जैसे नारे भी लगाए। नमाज-ए-जनाजा के बाद लादेन के लिए फातेहा भी पढ़ा गया।