शनिवार, 8 जनवरी 2011

हर जनम में पाऊँ कन्या रूप

समुद्र के गर्भ में छिपे सीप की कोख में पलते मोती की नैसर्गिक चमक, बंद कोंपलों में खिलते फूल का मादक यौवन या फिर तपती धरती पर नीले नभ से गिरी बारिश की पहली बूँद की शीतलता ... ये सभी सृजन के रूप हैं ... प्रकृति ने यही वरदान स्त्री को भी दिया है। उसकी कोख से जन्मी बेटियाँ ही इस वरदान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं।

वह दौर बीत गया जब लड़कियों के जन्म पर शोक छा जाता था। आज तो बेटियाँ वो पावन दुआएँ हैं, जो हर क्षेत्र में अपनी सफलता के लिए आदर्श बन रही हैं। आज की नारी इन सभी पुराने अंधविश्वासों व रूढ़ियों पर विजय पाकर अपनी श्रेष्ठता का प्रतिपादन कर रही है। आज हर नारी को अपने कन्या रूप में जन्म लेने पर शर्म नहीं बल्कि गौरव महसूस होता है। हमने महिला सशक्तिकरण के इस दौर में कई महिलाओं से चर्चा की व जाना कि क्या वे अगले जन्म में फिर से लड़की के रूप में जन्म लेना चाहेंगी या नहीं?

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

मैं खुश हँूं और भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि आप भी सुखी रहें। यह पत्र मैं इसलिये लिख रही हँू क्योंकि मैने एक सनसनीखेज खबर सुनी है जिसे सुनकर सिर से पाँव तक काँप उठी।

स्नेहदात्री माँ! आपको मेरे कन्या होने का पता चल गया है और आप मुझ मासूम को जन्म लेने से से रोकने जा रही हैं। यह सुनकर मुझे तो यकी नही नहीं हुआ। भला मेरी प्यारीप्यारी कोमल ह्रदया मां ऐसा कैसे कर सकती है? कोख में पल रही अपनी लाडली के सुकुमार शरीर नश्तरों की चुभन एक मां कैेसे सह सकती है?

पुण्यशीला माँ! बस, आप एक बार कह दीजिये के यह जो कुछ मैने सुना है वह सब झूठ है। दरअसल यह सब सुनकर मै दहल सी गई हँूं। मेरे तो हाथ भी इतने कोमल है कि इनसे डाक्टर की क्लीनिक की तरफ जाते वक्त आपकी चुन्नी ज़ोर से नहीं खींच सकती ताकि आपको रोक लूँ। मेरी बांह भी इतनीपतली और कमजोर है कि इन्हें आपके गले में डालकर लिपट भी नहीं सकती।

मधुमय माँ! मुझे मारने के लिये आप जो दवा लेना चाहती हैं वह मेरे नन्हें से शरीर को बहुत कष्ट देंगी। स्नेहमयी माँ! उससे मुझे दर्द होगा। आप तो देख भी नहीं पायेंगी कि वह दवाई आपके पेट के अन्दर मुझे कितनी बेरहमी से मार डालेगी।
मैं खुश हँूं और भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि आप भी सुखी रहें। यह पत्र मैं इसलिये लिख रही हँू क्योंकि मैने एक सनसनीखेज खबर सुनी है जिसे सुनकर सिर से पाँव तक काँप उठी।

स्नेहदात्री माँ! आपको मेरे कन्या होने का पता चल गया है और आप मुझ मासूम को जन्म लेने से से रोकने जा रही हैं। यह सुनकर मुझे तो यकी नही नहीं हुआ। भला मेरी प्यारीप्यारी कोमल ह्रदया मां ऐसा कैसे कर सकती है? कोख में पल रही अपनी लाडली के सुकुमार शरीर नश्तरों की चुभन एक मां कैेसे सह सकती है?

पुण्यशीला माँ! बस, आप एक बार कह दीजिये के यह जो कुछ मैने सुना है वह सब झूठ है। दरअसल यह सब सुनकर मै दहल सी गई हँूं। मेरे तो हाथ भी इतने कोमल है कि इनसे डाक्टर की क्लीनिक की तरफ जाते वक्त आपकी चुन्नी ज़ोर से नहीं खींच सकती ताकि आपको रोक लूँ। मेरी बांह भी इतनीपतली और कमजोर है कि इन्हें आपके गले में डालकर लिपट भी नहीं सकती।

मधुमय माँ! मुझे मारने के लिये आप जो दवा लेना चाहती हैं वह मेरे नन्हें से शरीर को बहुत कष्ट देंगी। स्नेहमयी माँ! उससे मुझे दर्द होगा। आप तो देख भी नहीं पायेंगी कि वह दवाई आपके पेट के अन्दर मुझे कितनी बेरहमी से मार डालेगी।

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

एक खूबसूरत अहसास है- माँ

एक खूबसूरत अहसास है- माँ
हर मुश्किल में हमारा विश्वास है- माँ

हमारे लिए सारी दुनिया है- माँ

क्यूँकि, बच्चों के लिए खुशियाँ है- माँ

जिसकी गोद हर गम से निजात दिलाती है, वो है- माँ

मेरी हर तकलीफ में याद आती है मुझे- माँ

मेरे सिर पर हाथ रखकर, राहत देती है- माँ

इस मतलबी दुनिया में जिसे कोई मतलब नही , वो है – माँ

धरती पर खुदा का दर्शन है – माँ

दोगली दुनिया में सच्चा दर्पण है – माँ

मंज़िलों के लिए मैं नही जीता, मेरा रास्ता है- माँ

खुदा का भेजा हुआ, एक फरिश्ता है- माँ

सच तो ये है की तुम क्या हो माँ,

मैं लिख नही सकता, बता नही सकता………………….. माँ

रविवार, 2 जनवरी 2011

मेरी कविताओं का संग्रह: यादें "हिन्दी" कविता की दुनियाँ: मैं प्रिय पहचानी नहीं

मेरी कविताओं का संग्रह: यादें "हिन्दी" कविता की दुनियाँ: मैं प्रिय पहचानी नहीं

कश्मीर समस्या और भारतीय मुसलमानों का रुख .... KASHMIR ISSUE & INDIAN MUSLIMS



विभाजन के बाद से ही देश जिन समस्याओं से सर्वाधिक पीड़ित है , कश्मीर उनमें सर्वोपरि है | कश्मीर की समस्या का हल स्वतंत्रता के ६२ वर्षों के बाद भी ना होना हमारी रीढ़विहीन राजनीती को ही दर्शाता है | कश्मीर की समस्या पर राजनीती पिछले छः दशकों से चली आ रही है लेकिन वैश्विक आतंकवाद के इस नए दौर में इसके मायने बदल गए हैं | इस नए दौर में कश्मीर ने भारतीय मुसलमानों की एक कट्टर पीढ़ी को आतंकवादी कृत्यों को न्यायोचित ठहराने में बड़ी मदद की है | आज के कथित सेकुलर विश्लेषक इस बात का दावा बड़े जोर शोर से करते रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों का वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं रहा है बल्कि अब जो आतंकी कार्यवाहियों में लिप्त पाए जाते हैं उनका उभार अयोध्या और गुजरात दंगों जैसी कार्यवाहियों की प्रतिक्रिया मात्र है | वास्तविकता के धरातल पर ऐसे लोग जेहादी कृत्यों को सिर्फ इसलिए जायज़ ठहराने की मांग करते हैं कि भारतीय मुसलमानों का एक कट्टरपंथी तबका न सिर्फ इनके प्रति सहानुभूति रखता है बल्कि मामला वोट बैंक से भी जुड़ा हुआ है | यहाँपर यह कहना मुनासिब होगा कि बहुसंख्यक मुसलमानों के वोट बैंक को कट्टरपंथी तबका ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नियंत्रित करता रहा है |


ऐसे परिप्रेक्ष्य में कश्मीर की समस्या का वैश्विक आतंकवाद से क्या लेना देना रहा है ये जानने के लिए हमें दोबारा , इतिहास को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी | 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में जब कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद ने पैर पसारना शुरू किया तब से लेकर आजतक यह ७०००० हजार मासूमों की हत्या कर चुका है लेकिन छोटे - छोटे फर्जी मुठभेडों के मुद्दे पर मानवाधिकार के आंसू बहाने वाले मुस्लिम संगठनों ने आज तक इसकी निंदा में ना तो कोई कोई प्रस्ताव ही रखा है और ना ही बात बात पर फतवा जारी करने वाले इस पर कोई कारगर पहल ही कर सके हैं |

बदले परिप्रेक्ष्य में भारतीय मुसलमानों की एक बड़ी संख्या कश्मीर को हिन्दू - मुस्लिम समस्या के रूप में देखने से इनकार कर रही है | अब कश्मीर के संघर्ष को एक नया नाम दिया जा रहा है जिसमें कश्मीर की जंग को भारतीय मुसलमानों की नज़र में शोषण और अन्याय के खिलाफ युद्घ की संज्ञा देने का निरर्थक और दण्डनीय प्रयास किया जा रहा है | इस काम में डॉ जाकिर नाइक जैसे अरब देशों के पैसों पर पलने वाले कुप्रचारियों से प्रभावित होकर आजकल पढ़ेलिखे मुस्लिम युवा तेजी से लिप्त हो रहे हैं | जेहाद का यह नवीनतम रूप बेहद खतरनाक है |

कश्मीर समस्या और भारतीय मुसलमानों का रुख .... KASHMIR ISSUE & INDIAN MUSLIMS



विभाजन के बाद से ही देश जिन समस्याओं से सर्वाधिक पीड़ित है , कश्मीर उनमें सर्वोपरि है | कश्मीर की समस्या का हल स्वतंत्रता के ६२ वर्षों के बाद भी ना होना हमारी रीढ़विहीन राजनीती को ही दर्शाता है | कश्मीर की समस्या पर राजनीती पिछले छः दशकों से चली आ रही है लेकिन वैश्विक आतंकवाद के इस नए दौर में इसके मायने बदल गए हैं | इस नए दौर में कश्मीर ने भारतीय मुसलमानों की एक कट्टर पीढ़ी को आतंकवादी कृत्यों को न्यायोचित ठहराने में बड़ी मदद की है | आज के कथित सेकुलर विश्लेषक इस बात का दावा बड़े जोर शोर से करते रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों का वैश्विक आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं रहा है बल्कि अब जो आतंकी कार्यवाहियों में लिप्त पाए जाते हैं उनका उभार अयोध्या और गुजरात दंगों जैसी कार्यवाहियों की प्रतिक्रिया मात्र है | वास्तविकता के धरातल पर ऐसे लोग जेहादी कृत्यों को सिर्फ इसलिए जायज़ ठहराने की मांग करते हैं कि भारतीय मुसलमानों का एक कट्टरपंथी तबका न सिर्फ इनके प्रति सहानुभूति रखता है बल्कि मामला वोट बैंक से भी जुड़ा हुआ है | यहाँपर यह कहना मुनासिब होगा कि बहुसंख्यक मुसलमानों के वोट बैंक को कट्टरपंथी तबका ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नियंत्रित करता रहा है |


ऐसे परिप्रेक्ष्य में कश्मीर की समस्या का वैश्विक आतंकवाद से क्या लेना देना रहा है ये जानने के लिए हमें दोबारा , इतिहास को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी | 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में जब कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद ने पैर पसारना शुरू किया तब से लेकर आजतक यह ७०००० हजार मासूमों की हत्या कर चुका है लेकिन छोटे - छोटे फर्जी मुठभेडों के मुद्दे पर मानवाधिकार के आंसू बहाने वाले मुस्लिम संगठनों ने आज तक इसकी निंदा में ना तो कोई कोई प्रस्ताव ही रखा है और ना ही बात बात पर फतवा जारी करने वाले इस पर कोई कारगर पहल ही कर सके हैं |

बदले परिप्रेक्ष्य में भारतीय मुसलमानों की एक बड़ी संख्या कश्मीर को हिन्दू - मुस्लिम समस्या के रूप में देखने से इनकार कर रही है | अब कश्मीर के संघर्ष को एक नया नाम दिया जा रहा है जिसमें कश्मीर की जंग को भारतीय मुसलमानों की नज़र में शोषण और अन्याय के खिलाफ युद्घ की संज्ञा देने का निरर्थक और दण्डनीय प्रयास किया जा रहा है | इस काम में डॉ जाकिर नाइक जैसे अरब देशों के पैसों पर पलने वाले कुप्रचारियों से प्रभावित होकर आजकल पढ़ेलिखे मुस्लिम युवा तेजी से लिप्त हो रहे हैं | जेहाद का यह नवीनतम रूप बेहद खतरनाक है |

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

All blogger member


मेरे प्यारे  दोस्तों ,
My last message against terrorists brought out a volley of criticism, and thus I withdrew the same. I am amazed to find the number of terrorist sympathisers in this country. I suppose it is natural. We love portraying ourselves as intellectuals who love democracy and freedom even if it means appeasing anti national and anti human elements. We love all this till the blow falls on our own families and friends. Sorry, I cannot love criminals. I am not so broadminded, nor am I a saint. I am a simple human being in whom anger flares up whenever and wherever she sees injustice and violence.

Secondly, as has happened before, my spiritual messages have been questioned and criticised from time to time. Even though I have always taken time out from a busy job and other work to be courteous to everyone, last night, I was accused of being rude and rough in my behaviour. And this has not been the first time. All this is not only killing the spontaneity within me, but is also making me extremely formal while talking to people. If I have to think a hundred times before posting anything to anyone, then there is no point in me being anywhere in any social network. Being a sensitive and emotional person who has throughout life acted spontaneously, all this is actually hampering my mental peace.

I am taking some time away and thus will be away from social networking till Christmas. I may or may not come back. Depends on many factors. I shall also not be available over the phone or through any other medium except the e-mail.

Wishing everyone a very happy winter and a great holiday season. God bless you all.

दिनेश पारीक
 दूरभाष नंबर ९१+९५८२५९८२४४






रविवार, 5 दिसंबर 2010

शोक संदेश

शोक संदेश
हमें अत्यंत दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि प्रो. दिवाकर शास्त्री (अध्यक्ष वनस्थली विध्यापीठ) सुपुत्र स्व. हीरालाल जी शास्त्री (प्रथम मुख्यमंत्री, राजस्थान) का स्वर्गवास दिनांक 5-12-2010 को दोपहर 3:15 बजे जयपुर मे हो गया है, जिनका अंतिम संस्कार दिनांक 6-12-2010 को दिन के 11:00 बजे वनस्थली विध्यापीठ मे किया जायेगा |











शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

मेरी बिटिया की बाई की बाई

मेरी बिटिया की बाई की बाई

छोटी बिटिया की महरी बहुत कुशल है। एक्स्पर्ट या निपुण की कोटि में आती है। दो साल की नौकरी में वह 600 रुपये से 3000 रुपये की पगार व एक बच्चे की 800 रुपये प्रति माह की फ़ीस +पुस्तकें + वर्दी आदि पर पहुँच गयी है। उसका काम इतना अच्छा है कि बिटिया उसे झाड़ू पोछे व बर्तन साफ़ करने से शुरू कर घर की केयरटेकर तक ले गयी। हर कुछ महीने में उसकी पगार बढ़ती गयी और वह कुछ नयी जिम्मेदारी सम्भालती गयी। अब तो यह हाल है कि वह कहती है कि अब मेरी पगार मत बढ़ाना क्योंकि अब आपके घर में मेरे करने लायक और कोई नया काम नहीं बचा है।

बिटिया उसे घर की चाभी देकर जाती है। जब काम से घर लौट कर आती है तो चमचमाता, साफ़ सुथरा घर मिलता है। ऐसा लगता है जैसे उसके जाने के बाद किसी ने जादू से उसका घर चमका दिया हो।

पति द्वारा सताई गयी व छोड़ी गयी सरस्वती को आज इतना खुश व सफल देख बिटिया व मेरा मन बहुत खुश हो जाता है। पिछले साल ही तो जब उसे एक दुर्घटना में चोट लगी थी तो हमने उसकी सेवा की थी। छोटी सी चोट ऐसी बिगड़ी कि उसे औपरेशन कराना पड़ा। हाँ, उसने 800 रुपये देकर महरी रख ली थी।

अब जबकि वह ठीक हो चुकी है तब भी वह उस महरी को निकाल नहीं पायी है। कहती है कि उसे वह निकाल नहीं सकती, कि वह बुढ़िया है, कि उसे उसके बच्चों से मोह हो गया है। कि करने दो उसे भी काम ना! कि आप लोग मुझे इतना देते हो। कि इतना पाने का तो मैने स्वप्न भी कभी नहीं देखा था। अब मैं जितने भी नये घर पकड़ती हूँ केयरटेकर कहकर ही पकड़ती हूँ ना कि महरी कहकर और मेरी कमाई इतनी होती है कि मैं बहुत खुश हूँ।

बिटिया के घर का पुराना सोफ़ा,(उसका सामान कितना पुराना हो सकता है? उसकी उम्र ही क्या हुयी है?) लगभग सारा पुराना फ़र्नीचर उसके ही घर में है। ढेरों बर्तन आदि सब उसके ही घर पहुँचते हैं। किन्तु मुझे जो बात सबसे अधिक मोहित करती है वह है उसके पास भी महरी का होना।

कया बाई की भी बाई होना उन्नति है? जो भी हो मुझे प्रगति लगती है।

मार्केटिंग - कॉमेडी कथाकथन भाग-४/४

उस दुकान से बाहर निकलते वक्त बाहर सामने एक जुते की दुकान दिखी. वहां बोर्ड लगा था "एक के उपर एक फ्री' . अब दायें जुते के उपर बाया जूता फ्री ... या फिर बाये जूते के उपर दाया जुता फ्रि... या फिर एक पेअर के साथ दूसरी पेअर फ्री...ये उस दुकान मालिक को पुछने की मेरी प्रबल इच्छा हूई. लेकिन अभी अभी आये ताजा अनुभवसे मेरी उस दुकान में जानेकी हिम्मत नही बनी.

रस्तेसे जाते हूए अपनी झेंप छीपाने के लिये उस छाते को कभी जेबमें तो कभी कॉलर मे लटकाने की कोशीश करने लगा. गले मे लटकाते हूए एक विचार मेरे मन मे आया ... अरे यह तो जबरदस्ती गले पडा हूवा छाता है इसको और गले मे लटकाने की क्या जरुरत.

अनायास ही एक पतली गलीमें मेरा ध्यान गया. वहां कोने मे उस दिन मिला अंधा, लंगडा भिखारी मस्त खडा होकर सिगार पीता हूवा दिखाई दिया. इसका मतलब वह लंगडा नही था और शायद अंधा भी नही था. मुझे तो विश्वास ही नही हो रहा था. उसने हम सबको उल्लू बनाया था. उल्लू सी सुरत लेकर मै थोडा और आगे निकल गया . वहां रस्तेके किनारे लोगोंकी भीड जमा हूई थी. कभी कभी भीड ऐसे ही जमा हो जाती है. दो लोग जमा हो जाते है. वे दो क्यों जमा हूए ये देखने के लिये और तिन जाते है...और तिन के पिछे और छे... ऐसे मै भी भीड मे घुस गया... देखता हू तो उस दिन मिला दुसरा भिखारी जो "मेरी मां बिमार है' कहकर भिख मांग रहा था .. वह किसी वृध्द महिला का सर अपने गोद में लेकर जोर जोर से रो रहा था. वह महिला मर गई थी ... शायद उसकी मां थी. उस दिन कितनी विवशता से पैसे मांग रहा था बेचारा. उसको कोई समझ नही पाया था ... या फिर वह अपनी जरुरत की ठीक ढंग से मार्केटिंग नही कर पाया था.

इतने मे वह दुसरा झुठा लंगडा अंधा भिखारी लंगडता हूवा वहां आया. उसकी मौके की नजाकत को पहचानने की काबीलीयत तो देखो. झट से उसने एक कॅप उलटी की और लडखडाता हूवा " उसकी मां को जलाने को पैसे दो' करके भीख मांगने लगा ... ही इज अ परफेक्ट मार्केटींग मॅन ... यहां अगर कोई मार्केटिंग के लोग बैठे हो तो माफ कर देना भाई.

मै और मेरी बीवी मार्केटिंग निपटाकर घर लौट रहे थे. उस भिखारी की मां को मरे हूए 7 - 8 दिन हो गए होंगे. तो भी वह चित्र मेरी आंखो के सामनेसे हटते नही हट रहा था. उस झुठे लंगडे अंधे भिखारी ने सबको बेवकुफ बनाया था. जिसे असली जरुरत उसको किसीने भी पैसे नही दिए थे. आज इस भडकीले ऍड्वर्टाइज, भडकिले मार्केटिंग के युग में क्या सचमुछ अपनी समझ खत्म होती जा रही है. मै अपनी सोच में डूबा चला जा रहा था.

" वह कॉफी सेट बहुत ही सुंदर था है न?' मेरी बिवीने मेरी विचारोंकी श्रुंखला को तोडा.

मैभी अपने आप को नॉर्मल बतानेके प्रयास मे मजाक पर उतर आया.

" हां बहुत ही सुंदर था ... लेकिन एक चीज उस कॉफी सेट की सुंदरता बिगाड रही थी...' मैने कहा.

" कौनसी?' मेरी बिवीने पुछा.

" उसपर लगा हुवा प्राईज टॅग' मैने कहा.

थोडी देर अंधेरे मे हम चूपचाप ही चलते रहे.

" उधर देखो ... उधर गलीमें' मेरी पत्नी एक गली की ओर निर्देश करते हूवे बोली.

मैने उत्सुकतावश उस गली मे देखा. जहां उस दिन वह झूठा लंगडा भिखारी मजेसे सिगार पी रहा था. आज वहां दो लोग थे. वह झूठा लंगडा अंधा भिखारी और दूसरा जिसकी मां मरी थी वह. दोनो मजे से मस्त होकर सिगार पी रहे थे. जिसकी मां मर गई थी वह एक हाथ से सिगार पी रहा था और दूसरे हाथ से किसी राजा की तरह पैसे गीन रहा था

.... शायद वह मार्केटिंग सीख गया था.
--- The end---

-- कृपया इस कहानी के बारेमे आपनी प्रतिक्रिया लिखे --

मार्केटिंग को जाना एक सुखद अनुभव है

बीवी के साथ मार्केटिंग को जाना एक सुखद अनुभव है. .. मतलब अपने अपने बिबी के साथ. इस बात से कोई भी इन्कार नही कर सकता ... खासकर अगर उनके बीवी के सामने पुछा जाए तो. 

मै और मेरी बीवी मार्केटिंग के लिए गए थे. जैसे की हमेशा होता है वह आगे चल रही थी और मै पिछे चल रहा था. कुछ लेने लायक है क्या यह मै देख रहा था. एक दुकान पर लगे एक इश्तेहार ने मेरा ध्यान खिंच लिया. 

लिखा था, " लहसून छिलने का यंत्र.... सिर्फ दस रुपए में ' "यंत्र' इस शब्द ने मेरी उत्सुकता बढाई ... वैसेतो आजकल किसी भी बात का यंत्र मील जाता है... दुकानमालीक के पास गया मैने उसे वह "यंत्र' दिखाने के लिए कहा. देखता हूं तो 6 इंच लंबी और 3 इंच परिघ की एक रबड की ट्यूब थी. मै उसे उलट पुलटकर देखने लगा. असल मे मै उस यंत्र को शुरु करने का बटन ढूंढ रहा था.

"अजीब बेवकुफ है ...' इस अविर्भाव मे उस दुकानमालीक ने वह ट्यूब मेरे हाथ से छीन लिया. अब वह दुकानमालीक उस यंत्र का मुझे डेमॉस्ट्रेशन देने लगा. उसने एक लहसुन ट्यूब मे डाला और वह उस ट्यूब को जोर जोर से रगडने लगा. अगर इतने जोर से रगडो तो साला लहसून छीलने के बजाय अपना हाथ ना छील जाये और इतने जोर से उस ट्यूब को रगडने की बजाय अगर डायरेक्ट लहसून को रगडो तो इतनी देर में कम से कम आधा किलो लहसून छील जायेगा अब "अजीब बेवकुफ है ...' इस अविर्भाव मे देखने की मेरी बारी थी. 

इतनेमें " अजी देखिए तो... कान के झुमके ... कैसे लग रहे है ' बाजू के दुकानसे मेरी पत्नीने कहा. मै वहा गया. मै थोडा अलर्ट होगया क्योंकी अब उस दुकानमालीक के मार्केटिंग स्कीलसे मेरी मार्केटिंग स्कीलका सच्चा इम्तेहान था. मैने उस दुकानमालीकसे दाम पुछा 

" दो सौ रुपए... आप है इसलिए देडसोमे देंगे' उसने कहा.

" आप है इसलिए ...' मैने उसे घुरकर देखा. मै उसे नही जानता था. हो सकता है वह मुझे जानता हो...

शायद उसने मेरे मन की बात भांप ली. 

" पिछले बार भी मैने आपसे जादा पैसे नही लिए थे' उसने कहा.

वह मुझे कितना जानता है यह मै समझ गया - क्योंकी मै पहली बार उसके दुकान मे गया था. 

लेकिन उसने वह बात इतने कॉन्फीडंस से कही थी की उसे कुछ कहने की बजाय मैने ही अपने आपको को समझाया की शायद गलतीसे वह मुझे कोई और समझ रहा हो. बात झुमकोंकी बोलू तो वह झुमके खरीदने की मेरी बिलकुल इच्छा नही थी. अब तक के अनुभवसे मै अपनी बीवीकी मानसीकता अच्छी तरह से समझ चुका था. मै अगर झुमकोंको खराब कहूं तो वह उसे जरुर खरीद लेगी. इसलिए मैने कहा " बहुतअच्छे है ... कसमसे आपको बहुत जचेंगे' 

" ठीक है ... मेरी बहन के लिए भी एक पेअर पॅक कर देना' उसने मुझे पैसे चुकाने के लिए इशारा करते हूए कहा. 

अब करने लायक कुछ नही बचा था. चुपचाप पैसे निकालकर मैने दुकानमालीकको दिए. शायद मेरे बिवी की मानसीकता पहचाननेमें मैने देर लगा दी थी. उसकी मानसीकता पहचानके पहले उसनेही मेरी मानसीकता पहचान ली थी. 

... to be contd

रविवार, 28 नवंबर 2010

यादें "हिन्दी" कविता की दुनियाँ: मेरी कविताओं का संग्रह

यादें "हिन्दी" कविता की दुनियाँ: मेरी कविताओं का संग्रह: "इस ब्लॉग के जरिये में अपने दोस्तों को ये बताना चाहता हु की यहाँ पे में कविताओ का sangarh हिन्दी, उर्दू और हिन्दी में अनूदित काव्य के इस विशा..."

साधो यह हिजडों का गाँव-११




७ नवम्बर ऐसी मनहूस तारीख है, जिसे याद कर के आखें भर आती है. यही वह दिन है जिस दिन दिल्ली में गो-भक्तों पर गोलियाँ बरसीं थीं. जिसमे अनेक लोग मारे गए थे. ७ नवम्बर १९६६. देश में गो-वध के प्रतिबन्ध  की मांग  को लेकर प्रदर्शन हुआ था. यह शर्मनाक बात है कि प्रदर्शनकारियो को रोकने के लिए गोलियाँ चला दी गयी. इस देश में प्रतिरोध को रोकने के लिए क्या अब गोलिया ही एक विकल्प रह गयी हैं? शर्म...शर्म...शर्म... ऐसे लोकतंत्र को नाश हो जो हिंसा के बल पर आबाद होता है. क्या भारत जैसे देश में गो वध पर प्रतिबन्ध लगाने कि मांग  गलत है? महावीर, बुद्ध से लेकर गाँधी तक के इस महान देश में हिंसा ही अब स्वाद और व्यापार का जरिया  बनेगी? कायदे से तो इस देश  का राष्ट्रिय पशु  गाय को ही घोषित किया जाना चाहिए. जैसे तिरंगा हमारी पहचान है,  जैसे हिन्दी हमारी शान है, जैसे राष्ट्रगान हमारी आन है, ठीक उसी तरह गाय हमारी जान है.इसको बचाना है. आज कसाई खाने खुल रहे है, गायों का मारा जा रहा है. हिन्दू ही अपनी  बीमार-बूढी गायों को कसाईयों के हाथों बेच देते है (ये और बात है कि-बेचारे- गाय को बेचते वक्त गौ माता की जय भी ज़रूर बोलते हैं...) ऐसे पाखंडी हिन्दुओं के कारण भी गाएँ कट रही है. गो-मांस का निर्यात भी होता है. भारत जैसे देश में अगर गो मांस बेच कर कमाए की जाने की मानसिकता विकसित हो रही है तो बेहतर है कि हम रंडीबाजी की इजाज़त दे दें. कम से कम  हम गो-हत्या के महापाप से तो बचेंगे. पता नहीं कब होगा गो वध पर पूर्ण प्रतिबन्ध. इसकी मांग  करते-करते तो संत विनोबा भावे भी चल बसे. इसी मुद्दे पर वे आमरण अनशन पर बैठ गए थे. उनको धोखा देकर उपवास तुड़वाया गया, लेकिन गो वध पर प्रतिबन्ध नहीं लगा. कुछ दिन बाद ही विनोबा भावे नहीं रहे. ऐसा है मेरा देश. जहाँ एक वर्ग विशेष की संतुष्टि के लिए गायों को काटने की छूट -सी दे दी गयी है. ७ नवंबर को याद इसलिए क्या जाना चाहिए, कि हम यह न भूलें कि गायों  के लिए मरने-मिटने वालों की कमी नहीं है. आज भी गाय हमसे बलिदान मांग रही है. जब तक इस देश के लोग बलिदान के लिए तैयार नहीं होंगे, इस देश में गाय का अपमान होता रहेगा. हिंसा होती रहेगी. अब समय आ गया है को गो-वध पर रोक लगाने वाला कानून पारित हो. मुसलमानों को भी समझाया जाये. वैसे उनमे बहुत-से लोग समझते भी है. अनेक मुस्लमान गो हत्या के खिलाफ है. वे इस दिशा में काम भी कर रहे है. ऐसे मुसलमान  भाईयों की  अगुवाई में आन्दोलन शुरू होना चाहिए. इस देश में गौ माता से जुड़े अर्थशास्त्र  को समझाने की ज़रुरत है. गाय को धर्म से नहीं कर्म से जोड़ा जाए, तभी देश का भला हो सकता है. सरकारे भी संकुचित दायरे से ऊपर उठे, और गाय  को अपनी सगी  माँ समझ कर उसे बचने की कोशिश करे. कानून बनाये. गो संवर्धन के लिए काम करे. गे-हत्या के विरुद्ध मै उपन्यास ही लिख रहा हूँ- देवनार के जंगल.सुधी पाठको को कभी इस उपन्यास का अंश भी पढ़वऊंगा.  देवनार में एशिया का सबसे बड़ा कसाई खाना है, जिसे दुर्भाग्य से क्यों जैन  ही चला रहा है.  अब किसे क्या कहें..? बहरहाल, ७ नवम्बर बलिदान दिवस को याद करते हुए प्रस्तुत है, 
गौ माता पर मेरे तीन पद...  
(1)
साधो गौ-माता कटती है
देख-देख इस करून दृश्य को,  हम-सबकी छाती फटती है.
गौ-पालक की गाय, कसाई के हाथो में क्यों बिकती है?
पूजे गैया को लेकिन माँ, दिन भर कचरे में खटती है.
अजब देश है सरकारों की यहाँ हिंसकों से पटती है?
बूढी हो गयी गाय बेचारी, बस उसकी इज्ज़त लुटती है. 
अरे हिन्दुओ, अरे अधर्मी, शर्म नहीं तुमको लगती है? 
(2) 

नहीं गाय-सा दूजा प्रानी 
मत कहना तुम इसे पशु यह, सबसे ज्यादा है कल्यानी.
जब रंभाती है गौ माता,  लगे उच्चरित, पावन-वानी.
दूध पिलाती यह जीवन भर, नहीं है इस माता का सानी.
गाएँ हैं तो हम हैं जीवित, गाय बिना जीवन बेमानी.
गाय बचाओ देश बचेगा,  इसे खिलाओ चारा-सानी.
गो-धन ही असली धन अपना, इससे ही है दाना-पानी.
(3)
हम पर गायों के उपकार..
नराधम ही इसे भूलते, उनका जीवन  है धिक्कार.
हर स्वादिष्ट मिठाई देखो, दूध से होती है  तैयार.
गो-मूत्र भी उसका पावन, उससे  होता है उपचार. 
गोबर भी है काम का जिसका, शुद्ध करे अपना संसार.
गायों की सेवा करने से, खुलता स्वर्ग-लोक का द्वार.

माँओं की भी है जो माता, देवि जैसा यह अवतार. 

घूम रही सड़कों पर गैया


(मित्र लेखक ब्लोगर भाई शरद कोकस ने मुझे प्रेरित किया कि गायों की बदहाली पर भी कुछ्  लिखू. वैसे इसके पहले भी लिख चुका हूँ, मगर उन्ही भावो को नए सिरे से फिर लिख रहा हूँ. मै सोचता हूँ, कि गाय पर बार-बार लिखा जाना चाहिए. मैंने गो-चालीसा लिखी है, गो आरती भी लिखी है, गीत लिखे, पद भी लिखे. मन नहीं माना तो पूरा उपन्यास ही लिख रहा हूँ-देवनार के जंगल.गाय  की दुरावस्था की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करना लेखको का भी फ़र्ज़ है. इसी कड़ी में एक बार फिर प्रस्तुत है एक गीत- )
घूम रही सड़कों पर गैया...
 घूम रही सड़कों पर  गैया,
शर्म करो गोपालक कुछ तो,  मरी जा रही तेरी मैया.

दूध पी रहे हो रोजाना, अच्छा लगता सेहत पाना...?
लेकिन गायों की भी सोचो, इतना ज्यादा भी मत नोचो.
दूध-मलाई तुम खाते हो, और प्रभु के गुण गाते हो. 
पालीथिन-कचरा खा कर
बीमार पड़ रही तेरी  दैया......

गाय विश्व की माता है, तुझे समझ न आता है.
स्वारथ की चर्बी का मारा, धन के आगे तू तो हारा.
गायों की न सेवा करता, घी पाने की खातिर मरता.
कितना कपटी और कसाई, दुबली होती जाती माई.
माँ कहते हो लेकिन माँ का,
ध्यान नहीं रखते हो भैया..

कहाँ गया पहले का भारत, अब तो बस गारत ही गारत.
बढ़ता गो-माँस का भक्षण, मिलता सरकारी संरक्षण .
रोजाना कटती है माता, चुप क्यों बैठे भाग्यविधाता.
बढ़ते जाते कत्लगाह अब, 
नाच रहे सब  ता-ता थैया.?

गाय हमारी आन बनेगी, भारत की पहचान बनेगी. 
गाय बचेगी देश बचेगा, तब सुन्दर परिवेश बचेगा.
गो पालन करते है आप,  इसकी बदहाली है पाप.
गाय दुखी है गोपालक की,
डूब जायेगी इक दिन  नैया.

घूम रही सड़कों पर गैया.
शर्म करो गोपालक कुछ तो,  मरी जा रही तेरी मैया.

मेरी बिटिया टिप्पणी

 स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की  घिनौनी कोशिश... 
.प्रभाष जोशी जी के निधन पर मैंने एक लिखा जो, मोहल्ला लाइव में भी छपा. उस लेख में एक जगह मैंने जोशी जी द्वारा एक सती काण्ड की प्रशंसा के सन्दर्भ में यह लिखा था कि 'उन्होंने औरत की उस भावना की तारीफ की थी कि वह पति से कितना प्यार करती थी'. इसमे कोई बुराई  नहीं. मैंने जोशी की इस बात का समर्थ करते हुए एक बात कही कि यह घटना  ''उन महिलाओं के लिए एक सबक जैसी है, जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।” इसमे भी मैंने कोई गलत बात नहीं कही. ऐसी बात लिखने के लिए एक लेखक ने प्रतिक्रिया दी कि मुझे शर्म आनी चाहिए क्योंकि यह स्त्री- विरोधी बात है. मित्रो, मै स्त्री-विरोधी नहीं हूँ, वरन उसकी दिशाहीनता का सख्त विरोधी हूँ. शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए, जिन्होंने समकालीन व्यभिचार, नगई, पतन, आदि  तमाम नकारात्मक मूल्यों को हरी झंडी दे दी है, और स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की  घिनौनी कोशिश भी की है कि 'यही है आधुनिकता. देह की आजादी ही असली आजादी है. इसे जो लोग व्यभिचार बोलते है, वे पिछडे लोग है'.
ये है मानसिकता. क्या यही है आधुनिकता..? साहित्य में भी यही सब चल रहा है, और जीवन में भी. इतने सालों से साहित्य और समाज में ये मंजर देख रहा हूँ, और अभी नहीं बहुत पहले से ही शर्मसार हूँ, कि कुछ लेखक समाज को कहाँ से कहाँ ले जाने पर तुले हैं. आदमी तो आदि कल से ही लम्पट रहा है, शातिर रहा है. पतित भी लेकिन औरते बची हुयी थी. अगर औरते भी आदमी बनाने पर तुल  जायेगी तो वो मूल्य कहाँ  जायेंगे, जिसके बल पर हम अपनी परंपरा-संस्कृति पर गर्व करते रहे है? यह सफाई देने की बात नहीं है कि मै प्रगतिशील सोच वाला हूँ लेकिन प्रगतिशीलता और व्यभिचार में अंतर है. प्रभाष जी वाले लेख में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह लेख के सन्दर्भ को आगे बढ़ाने वाली बात है. मैंने लिखा है- ''उन महिलाओं के लिए जो पति से गद्दारी करती हैं, या व्यभिचार करती घूमती रहती हैं।” सबके लिए यह बात नहीं है. हो भी नहीं सकती, अच्छी औरते अभी भी बची हुई  है, जो पति के साथ सती होना पसंद करती है, यह उनकी अपनी भावना है. सती प्रथा का मै समर्थक नहीं हूँ.हो भी नहीं सकता लेकिन मै उस भावना को नमन करता हूँ जो भावना औरत को बड़ा  बनाती है. अगर पत्नी-वियोग में कभी कोई पति भी जान दे दे तो वह भावना भी प्रणम्य  है.
एक-दूसरे के साथ जीने-मरने की कसमे क्या केवल कागजी बातें है...? सब मरे यह ज़रूरी नहीं लेकिन कुछ लोग ऐसे करते है तो उसकी आलोचना नहीं की जानी चाहिए. किसी को चिता में जबरन बिठाने का कोई अग्यानी ही समर्थन करेगा.  जोशी जी ने साथ-साथ जीने-मरने की उसी भावना का सम्मान किया था, जो अब लुप्त होती जा रही है. मै भी इस भावना का सम्मान करता हूँ. भविष्य में भी करता रहूँगा. शर्म तो उन नकली लोगो को आनी चाहिए जो समाज को-प्रगतिशील मूल्यों  के नाम पर-दिशाहीन कर रहे है. औरतो को गलत पाठ पढ़ा रहे है. मै ऐसे लोगो के खिलाफ लिखता रहूँगा और शर्मिंदा होता रहूँगा कि समाज का सत्यानाश करने वाले भी जिंदा है. वे लोग अपने स्टार पर मुझे भी गरियाते रहेंगे  कि 'ये पिछडा -गंवार कहाँ से आ गया, जो अनैतिकता के दौर में नैतिकता का कुपाठ पढा  रहा है? छिः...इसे तो मध्य युग में होना था', लेकिन मै हूँ और अपनी मुहिम में लगा हुआ हूँ. स्त्री-शक्ति पर मेरी अनेक कवितायेँ है जो बताती है कि मेरी सोच क्या है, चिंतन क्या है. मेरा ब्लॉग देख ले, मेरी रचनाये देख ले, तो शायद दृष्टी खुल जाये, लेकिन ऐसे लोगो की दृष्टी कुछ ज्यादा ही खुल जाती है. बहरहाल, स्त्री के प्रति मेरा नजरिया क्या है, इसे समझाने के लिए अपनी ही ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ-
सुन्दर, कोमल कली लडकियां 
होती अकसर भली लडकियां 
कितना मीठा मन रखती हैं
ज्यों मिसरी की डली लडकियां  
मत बंधो पैरो में बंधन 
अन्तरिक्ष को चली लडकियां 
लड़के जब नाकारा निकले 
मान-बाप को फली लडकियां
गिरी हुयी दुनिया दिखलाती 
ससुरालों में जली लडकियां
शर्म तो उन लोगों को आनी चाहिए जिन्होंने समकालीन व्यभिचार, नगई, पतन, आदि  तमाम नकारात्मक मूल्यों को हरी झंडी दे दी है, और स्त्रियों को कु-पाठ पढाने की  घिनौनी कोशिश भी की है कि 'यही है आधुनिकता. देह की आजादी ही असली आजादी है. इसे जो लोग व्यभिचार बोलते है, वे पिछडे लोग है'. ये है मानसिकता. साहित्य में भी यही सब चल रहा है, और जीवन में भी. इतने सालों से साहित्य और समाज में ये मंजर देख रहा हूँ, और अभी नहीं बहुत पहले से ही शर्मसार हूँ, कि कुछ लेखक समाज को कहाँ से कहाँ ले जाने पर तुले हैं. आदमी तो आदि कल से ही लम्पट रहा है, शातिर रहा है. पतित भी लेकिन औरते बची हुयी थी. अगर औरते भी आदमी बनाने पर तुल  जायेगी तो वो मूल्य कहाँ  जायेंगे, जिसके बल पर हम अपनी परंपरा-संस्कृति पर गर्व करते रहे है? मै अच्छी और बुरी औरतों के बारे में लिखता रहता हूँ, जैसे अच्छे-बुरे पुरुषों पर भी कलम चलता रहता हूँ. बीस-तीस साल पहले दिनकर जी की एक कविता कभी पढी थी, कि भूमि पर पैर टिकते नहीं तुम्हारे/ तुम उडी जा रही हो पवन की तरह/ भाईयो की तुमको न होगी कमी/ पर चलना तो सीखो बहन की तरह/  क्या यह कविता स्त्री-विरोधी है..? अच्छी बातों का स्वागत होना चाहिए, संकुचित नज़र से देखने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. हर लेखक का दायित्व है कि वह सच लिखे. जैसे कई लोग मुसलमानों की गलत बातों पर भी सिर्फ इसलिए चुप तरह जाते हैं कि लोग उन्हें सांम्प्रदायिक न करार दें
खैर, स्त्री -अस्मिता पर मै लिखता रहता हूँ. मेरी भावनाओ को वे न समझें तो न समझे. शर्मिन्दा वे लोग होते रहे जो पतन को उत्तर आधुनिकता समझ बैठे है, जो स्त्री के देह -स्वातंत्र्य को ही उसकी आधुनिकता का उत्स मान रहे है. उसे भड़का रहे है. प्रगति होती रहे, लेकिन मूल्य बने रहे, और यह स्त्री-पुरुष दोनों के लिए है. खैर, इस मुद्दे पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है. फिलहाल इतना ही काफी है

मेरी बिटिया

झुकी नहीं वह  तनी हुई है.
किस मिटटी की बनी हुई है.
अपने हक़ को पहचाना है.
देश स्वतंत्र है, यह जाना है.
आजादी बच जाये अपनी,
लोकतंत्र ना हो बर्बाद.
इरोम शर्मिला जिंदाबाद 

 पुलिस के सीमित हो अधिकार.
करती हरदम अत्याचार.
जहां कहीं यह मंज़र है,
लोग कर रहे हाहाकार.
इसीलिए इक औरत निकली, 

लोकतंत्र करने आबाद.
इरोम शर्मिला जिंदाबाद .

 बंदूको का राज ख़त्म हो.
अभी ख़त्म हो, आज ख़त्म हो.
शत्रु नहीं, तुम मित्र बनाओ,
वर्दी का कुछ फ़र्ज़ निभाओ.
करे देश की जनता अपनी-
सरकारों से यह  फरियाद.
इरोम शर्मिला जिंदाबाद..

कैसा है यह अपना देश?
दुखी में डूबा है परिवेश.
मणिपुर में वर्दी का राज.
वहा कोढ़ में दिखता खाज. (यानी पुलिस का विशेषाधिकार)
रोजाना दहशत में रहती, 
सीधीसादी आदमजात.
अत्याचारी  मुर्दाबाद .
इरोम शर्मिला जिंदाबाद 

जागे-जागे पूरा देश.
यही शर्मिला का सन्देश.
लोकतंत्र को याद रखो,
मधुर यहाँ संवाद रखो.

जन-गण-मन खुशहाल रहे,
प्रेम-अहिंसा हो आबाद.
अत्याचारी  मुर्दाबाद . 
इरोम शर्मिला जिंदाबाद ....